जोरहाट, गुवाहाटी: असम के जोरहाट स्थित होलोंगापार गिब्बन सैंक्चुरी के घने और हरे जंगलों में ओस से ढकी शांत सुबह तेज और तीखी आवाजों से फूट पड़ती है. भारत में पाए जाने वाले एकमात्र गैर-मानव वानर, पश्चिमी हूलॉक गिब्बन, ऊंचे पेड़ों की शाखाओं के बीच झूलते हुए शोर करते हैं.
इससे इलाके में उनकी बड़ी मौजूदगी का एहसास हो सकता है, लेकिन हकीकत में वेस्टर्न हूलॉक गिब्बंस खतरे में हैं.
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि पिछले दो दशकों में उनकी संख्या करीब एक लाख से घटकर लगभग पांच हजार रह गई है. हालांकि, भारत में पश्चिमी हूलॉक गिब्बन की अब तक कोई आधिकारिक जनगणना नहीं हुई है.
दिल्ली के कंजर्वेशन ऑर्गनाइज़ेशन, द हैबिटेट्स ट्रस्ट (THAT) द्वारा चलाया जा रहा एक कंजर्वेशन प्रोजेक्ट भारतीय कंजर्वेशन का ध्यान खींच रहा है.
द हैबिटेट्स ट्रस्ट के डायरेक्टर ऋषिकेश चव्हाण ने कहा, “फिलहाल, ज़्यादातर वाइल्डलाइफ़ कंजर्वेशन प्रोग्राम बाघों और हाथियों जैसे बड़े जानवरों पर फोकस करते हैं. पश्चिमी हुलॉक गिब्बन को इस हद तक नज़रअंदाज़ किया गया है कि हमें यह भी नहीं पता कि अभी भारत में ऐसे कितने जानवर हैं.”

पूर्वोत्तर भारत में चल रही यह परियोजना न केवल देश में गिब्बन की संख्या की स्टडी करेगा, बल्कि उनके जेनेटिक्स, आवाज के पैटर्न और उनके संकट में होने के कारणों की भी जांच करेगी. यह दुनिया में इस प्रजाति के लिए अपनी तरह का पहला अध्ययन है.
इस स्टडी का मकसद पश्चिमी हूलॉक गिब्बन के लिए एक पूरी तरह से संरक्षण योजना बनाना है.
गिब्बन को बचाना क्यों जरूरी है
जोरहाट की गिब्बन सैंक्चुरी देश के अन्य वाइल्डलाइफ सैंक्चुरी से अलग है. यहां न भीड़ होती है, न टिकट काउंटर, और न ही सफारी जीपों की लंबी कतारें.
यह सैंक्चुरी बहुत कम लोगों को आकर्षित करता है. यहां आमतौर पर सिर्फ रिसर्चर्स और वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर ही आते हैं. यहां का इलाका भी पर्यटकों के लिए अनुकूल नहीं है. ऊंचे होलोंग पेड़ों से घिरा यह क्षेत्र कांटेदार घास और जोंकों से भरा हुआ है.
बेंगलुरु स्थित संरक्षण वैज्ञानिक संतोष पावगड़ा, जो द हैबिटेट ट्रस्ट की टेक फॉर कंजर्वेशन परियोजना के कार्यक्रम प्रमुख भी हैं, कहते हैं कि गिब्बन को देखने का तरीका पेड़ों की शाखाओं के जाल पर नजर बनाए रखना है.

पावगड़ा ने कहा, “अगर वे आवाज़ नहीं कर रहे हैं, तो उन्हें ढूंढना बहुत मुश्किल होता है,” वह एक गिब्बन परिवार को ढूंढने की कोशिश में अपनी दूरबीन से देख रहे थे.
पश्चिमी हूलॉक गिब्बन एशिया में पाया जाने वाला एक संकटग्रस्त लघु वानर है. इसकी दुनिया भर की कुल आबादी का लगभग 80 प्रतिशत पूर्वोत्तर भारत में पाया जाता है. भारत के बाद इसकी छोटी आबादी बांग्लादेश और म्यांमार में मिलती है.
पश्चिमी हूलॉक गिब्बन को अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ की संकटग्रस्त प्रजातियों की सूची में भी शामिल किया गया है.
एशिया में पूर्वी हूलॉक गिब्बन भी पाए जाते हैं, लेकिन वे आमतौर पर म्यांमार और दक्षिणी चीन में मिलते हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि चूंकि पश्चिमी हूलॉक गिब्बन सीमित क्षेत्र में पाए जाने वाली प्रजाति है और मुख्य रूप से भारत में केंद्रित है, इसलिए अधिकारियों, गैर-सरकारी संगठनों और शोध संस्थानों को वैश्विक स्तर पर इसके संरक्षण को सुनिश्चित करना होगा.

चव्हाण ने कहा, “अगर उन्हें अभी प्रोटेक्ट नहीं किया गया और वे भारतीय जंगलों से खत्म हो गए, तो हम एक संभावित ग्लोबल रिस्क का सामना करेंगे.”
करीब तीन फीट लंबे इस प्रजाति के नर काले रंग के होते हैं, जबकि मादा भूरे रंग की होती हैं. दोनों की भौंहें मोटी और सफेद होती हैं. ये प्राइमेट आमतौर पर पेड़ों पर रहने वाले और शांत स्वभाव के होते हैं और अपनी मौजूदगी सिर्फ अपनी आवाजों के जरिए दर्ज कराते हैं.
इनकी तेज और लंबी आवाज जंगल में उनकी मौजूदगी का संकेत देती है, लेकिन इनकी सही संख्या का पता लगाना अब भी मुश्किल है.
गुवाहाटी स्थित गैर-लाभकारी संगठन कंजर्वेशन इनिशिएटिव्स की वरिष्ठ वैज्ञानिक और सह-संस्थापक दिव्या वासुदेव ने कहा कि पिछले कुछ दशकों में वैज्ञानिकों का अनुमान है कि लगभग दस में से नौ गिब्बन मुख्य रूप से जंगलों के नुकसान, उनके टुकड़ों में बंटने और शिकार के कारण मारे गए हैं.
वासुदेव ने बताया, “गिब्बंस जंगल पर निर्भर रहने वाली प्रजाति हैं, जो ज़्यादातर ऊंचे पेड़ों की चोटियों पर पाए जाते हैं. वे शायद ही कभी नीचे आते हैं, और अगर वे नीचे आते भी हैं, तो इसकी वजह जंगल का खत्म होना होता है.”

गिब्बन का पारिवारिक ढांचा एकनिष्ठ होता है. इसमें एक वयस्क नर, एक वयस्क मादा और उनके बच्चे होते हैं. इस वजह से वे उन प्रजातियों की तुलना में ज्यादा असुरक्षित होते हैं, जिनका पारिवारिक ढांचा बहुपत्नी होता है और जिनकी प्रजनन दर अधिक और तेज होती है.
कंजर्वेशन इनिशिएटिव्स के वरिष्ठ वैज्ञानिक और सह-संस्थापक वरुण गोस्वामी ने कहा कि पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्सों में शिकार के कारण गिब्बन की आबादी लगभग खत्म हो चुकी है. चूंकि उनकी आवाज अलग होती है, इसलिए शिकारी उन्हें आसानी से ढूंढ लेते हैं.
संरक्षणवादियों ने यह भी कहा कि पश्चिमी हूलॉक गिब्बन का शिकार उनकी खाल या अंगों के लिए नहीं, बल्कि उनके मांस के लिए किया जाता है. कई इलाकों में उन्हें पालतू जानवर के रूप में भी पकड़ा जाता है.
कंजर्वेशन के लिए तकनीक और जेनेटिक स्टडी
पिछले एक साल में पावगड़ा ने असम के जंगलों में लैपटॉप और ध्वनि रिकॉर्ड करने वाले उपकरणों के साथ समय बिताया, ताकि रहस्यमय पश्चिमी हूलॉक गिब्बन का अध्ययन किया जा सके.
वह अपने सहयोगी किशोर पनगंटी के साथ मिलकर बायो-अकूस्टिक्स और थर्मल ड्रोन जैसे उपकरण विकसित कर रहे हैं, ताकि इन प्राइमेट्स की मौजूदगी और उनकी आबादी का सही अनुमान लगाया जा सके.
पावगड़ा ने कहा, “कैमरा ट्रैप जैसे पारंपरिक तरीके गिब्बन जैसे जानवरों के लिए ज़्यादा काम नहीं करते, क्योंकि वे जंगल की ऊंची डालियों पर रहते हैं. जो चीज़ उनकी पहचान बताती है, वह है उनकी आवाज़. वे ज़ोर से आवाज़ निकालते हैं.”
उन्होंने बताया कि इसी वजह से वैज्ञानिक उन्हें देखने के बजाय उनकी आवाज के आधार पर पहचानते हैं.
उन्होंने आगे कहा, “रिसर्चर जंगल में ऑडियो रिकॉर्डर लगाते हैं और उनसे रिकॉर्ड हुई आवाज़ों का एनालिसिस करते हैं. समय बचाने के लिए, हमने एक मशीन-लर्निंग टूल बनाया है जो हमें घंटों की रिकॉर्डिंग में से गिब्बन की आवाज़ों को जल्दी पहचानने में मदद करता है. हम अलग-अलग गिब्बन को उनकी आवाज़ से पहचानने के तरीकों पर भी एक्सपेरिमेंट कर रहे हैं और जंगल में आवाज़ कहां से आ रही है, यह समझने के लिए एक डिवाइस बना रहे हैं.”

टीम दुर्गम इलाकों में थर्मल ड्रोन का भी परीक्षण कर रही है. ये ड्रोन गिब्बन की गर्मी के संकेत पहचान लेते हैं, जिससे जंगल की छतरी के नीचे भी उन्हें देखा जा सकता है.
पनगंटी ने बड़े जंगलों में गिब्बन के अध्ययन की चुनौती को दोहराया.
पनगंटी ने कहा, “हमने एक प्रोटोटाइप सिस्टम टेस्ट किया है जो विज़ुअली दिखाता है कि आवाज कहां से आ रही है. जब कोई गिबन आवाज़ करता है, तो आप इसे रियल टाइम में जलते हुए देख सकते हैं,” उन्होंने एक लाइव विज़ुअलाइज़र दिखाते हुए कहा जो गिबन की आवाज़ डिटेक्ट होने पर जल रहा था.
THT के वैज्ञानिक गिब्बन आबादी की जेनेटिक्स का अध्ययन करने के लिए गुवाहाटी स्थित एक और कंजर्वेशन NGO, आरण्यक के साथ भी सहयोग कर रहे हैं, जिसे विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) द्वारा मान्यता प्राप्त है. वे गिब्बन के लिए जेनेटिक डेटा इकट्ठा कर रहे हैं, लैंडस्केप-लेवल जेनेटिक स्ट्रक्चर की जांच कर रहे हैं, और इनब्रीडिंग के पैटर्न और प्रजातियों के विकास और स्वास्थ्य पर इसके प्रभाव का अध्ययन कर रहे हैं.

मल के सैंपल का इस्तेमाल करके, रिसर्चर जानवरों के हार्मोन लेवल का भी पता लगा रहे हैं ताकि यह तय किया जा सके कि इंसानी आबादी के ज़्यादा करीब होने या दूसरे इंसानी दखल की वजह से उनके स्ट्रेस का लेवल बढ़ा है या नहीं.
वाइल्डलाइफ जेनेटिक्स लेबोरेटरी के डायरेक्टर और हेड उदय बोरठाकुर ने कहा, “अगर आप सच में कंजर्वेशन जेनेटिक्स की असली क्षमता को जानना चाहते हैं, तो हमें यह देखना होगा कि जानवरों की प्रजातियों की आबादी कैसे जुड़ी हुई है, न सिर्फ आज के समय में बल्कि ऐतिहासिक रूप से भी. इसी तरह हम यह पता लगा पाएंगे कि वे जेनेटिक रूप से कैसे जुड़े हुए हैं.”
बोरठाकुर, जो एक शौकीन वाइल्डलाइफ़ फ़ोटोग्राफ़र हैं, गिबन कंजर्वेशन प्रोजेक्ट को इन अक्सर नज़रअंदाज़ किए जाने वाले प्राइमेट्स को सुर्खियों में लाने के एक मौके के तौर पर देखते हैं. असल में, उन्होंने इसकी शुरुआत अपने घर से ही की है. वीकेंड और स्कूल की छुट्टियों के दौरान, वह यह पक्का करते हैं कि उनके बच्चे गिबन को काम करते हुए देख सकें.
वह कहते हैं, “संरक्षण की शुरुआत शिक्षा से होती है.”
समुदाय के साथ संरक्षण
हालांकि, ये अध्ययन अकेले नहीं किए जा रहे हैं. परियोजना से जुड़े शोधकर्ता जानते हैं कि अगर गिब्बन को बचाना है, तो स्थानीय समुदायों और जनजातियों को साथ लेना जरूरी है. कई मामलों में ये समुदाय शिकारी और रक्षक दोनों की भूमिका निभाते हैं.
पूर्वोत्तर भारत में मेघालय और नागालैंड के कई हिस्सों में समुदाय पारंपरिक रूप से जंगलों के मालिक और प्रबंधक हैं.
इसका मतलब यह है कि कई इलाकों में जंगल सामुदायिक संपत्ति हैं, जहां राज्य वन विभाग का अधिकार सीमित होता है. जंगलों के स्वामित्व की यह अनोखी व्यवस्था वन्यजीव संरक्षण में समुदाय की भागीदारी को और भी जरूरी बनाती है.
गोस्वामी, जो कई वर्षों से इन समुदायों के साथ काम कर रहे हैं, कहते हैं कि कई जनजातियों के लोकगीतों और कथाओं में गिब्बन और उनके गीतों का जिक्र मिलता है. यह दिखाता है कि इन समुदायों का गिब्बन से पारंपरिक जुड़ाव रहा है. उनका काम सिर्फ तकनीक और आनुवंशिक विज्ञान के जरिए इन प्राइमेट्स की रक्षा करना नहीं है, बल्कि लोगों को इसके लिए शिक्षित करना भी है. और वे धीरे-धीरे उनका भरोसा जीत रहे हैं.
उन्होंने कहा, “कई समुदायों में, गिबन्स के साथ बहुत गहरा सांस्कृतिक जुड़ाव है. हमारे बातचीत में हमने पाया है कि कई जनजातियों ने उन्हें बचाने के लिए खुद ही शिकार पर बैन लगा दिया है.”
पश्चिमी हूलॉक गिब्बन पूर्वोत्तर की लोककथाओं में गहराई से जुड़े हुए हैं. अरुणाचल प्रदेश में इदु मिश्मी जनजाति के बीच गिब्बन का धार्मिक संबंध है. मान्यता है कि पौराणिक देवी इदु के जुड़वां पुत्रों में से एक एंजाओ ने गिब्बन पर एक अमृत का परीक्षण किया था, जिससे वे चीखने और नाचने लगे. यह व्यवहार आज भी उनमें देखा जाता है.

जनजाति का मानना है कि जो कोई गिब्बन को नुकसान पहुंचाता है, उसे दुर्भाग्य झेलना पड़ता है. इससे मुक्ति केवल पांच दिन के एक अनुष्ठान से मिलती है, जिसे स्थानीय भाषा में जेनना कहा जाता है. इस अनुष्ठान में घर में प्रवेश और महिलाओं द्वारा बनाए गए भोजन को खाने पर सख्त प्रतिबंध होते हैं.
अरुणाचल की एक अन्य जनजाति मिजू मिश्मी में मान्यता है कि गिब्बन का शिकार करने या उसका मांस खाने के छह से बारह महीने के भीतर शिकारी को ‘नंगाई’ नाम की बीमारी हो जाती है, जिसमें वह गिब्बन जैसा व्यवहार करने लगता है. स्थानीय विश्वास के अनुसार यह श्राप तभी खत्म होता है, जब शिकारी एक कठिन प्रायश्चित अनुष्ठान ‘नगैतामत’ करता है.
लेकिन संरक्षण से जुड़े लोग कहते हैं कि ये लोककथाएं लोगों को नियम में रखने और जानवरों और उनके रहने की जगह को नुकसान से बचाने के लिए बनाई गई थीं.
वैज्ञानिक जानते हैं कि गिब्बन का संरक्षण सिर्फ इस प्रजाति के लिए ही नहीं, बल्कि जंगलों के लिए भी फायदेमंद होगा.
चव्हाण ने कहा कि गिब्बन जंगलों के असली संरक्षक हैं. अगर आप उन्हें बचाते हैं, तो जंगल अपने आप सुरक्षित हो जाते हैं. यह दोनों के लिए फायदेमंद है.
ठीक इसी वक्त गिब्बन अपनी आवाज लगाते हैं. जंगल और वन्यजीवों की रक्षा की एक पुकार.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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