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Thursday, 8 October, 2026
होमफीचरसोशल मीडिया और ‘हनुमान अंश’ से चमका कैंची धाम, अब बढ़ती भीड़ संभालना चुनौती

सोशल मीडिया और ‘हनुमान अंश’ से चमका कैंची धाम, अब बढ़ती भीड़ संभालना चुनौती

पिछले छह महीनों में नीम करोली बाबा के कैंची धाम में 24.34 लाख लोग पहुंचे. यहां की सड़कें, कारोबार और पहाड़ों का नाजुक पर्यावरण इस भीड़ का दबाव झेलने में संघर्ष कर रहे हैं.

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नैनीताल: उत्तराखंड के नैनीताल में स्थित मशहूर कैंची धाम से कुछ ही कदम की दूरी पर बने अपने रेस्टोरेंट की रसोई से कुंदन नेगी ने गांधी जयंती से शुरू हुए वीकेंड में भीड़ बढ़ते हुए देखी. एक समय उनकी रसोई का आधा हिस्सा कचरे से भर गया था, जबकि शेफ बाकी बची जगह में खाना बनाते रहे और लगातार आने वाले ग्राहकों को संभालने की कोशिश करते रहे.

सड़ रहे कचरे की बदबू रसोई में बन रहे खाने की खुशबू में मिल गई थी. रसोई का स्टाफ उन कचरे के बैग के बीच काम कर रहा था, जिन्हें रखने के लिए दूसरी कोई जगह नहीं थी.

यह तस्वीर नेगी के दिमाग में रह गई है. 1974 में स्टीव जॉब्स के दौरे की वजह से प्रोफेशनल्स और टेक्नोलॉजी से जुड़े लोगों के बीच चर्चा में रहने वाला यह शहर अब नीम करोली बाबा की ज़िंदगी पर बनी हिंदी फिल्म हनुमान अंश की सफलता से पैदा हुई अभूतपूर्व भीड़ से परेशान है. इस वीकेंड में हालात ऐसे थे कि पूरा शहर लगभग ठप हो गया. एक छोटे आश्रम वाले शहर से लेकर इस सीज़न के भारत के सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले तीर्थस्थलों में शामिल होने तक, कैंची धाम इतनी बड़ी भीड़ के लिए तैयार नहीं था.

नेगी ने कहा, “कैंची धाम की वजह से ही यहां हम सभी का कारोबार चलता है, लेकिन हमारे लिए यह बहुत खराब अनुभव था. दूध और खाना बनाने वाली गैस से लेकर कचरा उठाने तक, सभी ज़रूरी चीज़ों की सप्लाई प्रभावित हो गई. कुछ भी ठीक से नहीं चल रहा था. कैंची धाम ने पहले कभी इस तरह की भीड़ नहीं देखी थी और इससे पूरी तरह अफरा-तफरी मच गई.”

नेगी करीब पांच साल पहले मंदिर के पास खुलने वाले शुरुआती रेस्टोरेंट्स में से एक अनुपम रेस्तरां चलाते हैं.

कैंची धाम से सटे अपने रेस्टोरेंट में कुंदन नेगी | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
कैंची धाम से सटे अपने रेस्टोरेंट में कुंदन नेगी | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

नेगी के लिए गांधी जयंती के आसपास का लंबा वीकेंड यह देखने की परीक्षा था कि कैंची धाम कितनी भीड़ संभाल सकता है. यहां का कमजोर बुनियादी ढांचा भी एक सीमा तक ही इतनी भीड़ का दबाव झेल सकता है. उनके जैसे स्थानीय कारोबारियों के लिए तीर्थयात्रियों की बढ़ती संख्या आमतौर पर अच्छी खबर होती है. ज्यादा श्रद्धालु मतलब ज्यादा ग्राहक, ज्यादा खाना बिकना और मंदिर के आसपास बसे इस छोटे पहाड़ी शहर में ज्यादा पैसा आना.

लेकिन इस बार संख्या इतनी ज्यादा थी कि भीड़ से फायदा पाने वाले कारोबार भी इससे परेशान हो गए.

शांत आश्रम से वायरल तीर्थस्थल तक

नीम करोली बाबा, कुमाऊं की पहाड़ियों में सादगी से रहने वाले दाढ़ी वाले संत थे. वह एक ऐसे आध्यात्मिक व्यक्ति बन गए, जिनकी पहचान भारत से बहुत दूर तक पहुंची. दुनिया भर से लोग उनके भक्त बने, जिनमें मशहूर स्टीव जॉब्स भी शामिल थे. जॉब्स ने बाबा से मुलाकात नहीं की थी, लेकिन उन्होंने आश्रम में समय बिताया था. बाद में उन्होंने बताया था कि भारत में उनके अनुभव ने उनकी सोच को प्रभावित किया.

उत्तराखंड की कुमाऊं पहाड़ियों में छिपा हुआ एक शांत आध्यात्मिक स्थान रहा कैंची धाम अब तेज़ी से बढ़ता तीर्थ और पर्यटन केंद्र बन गया है. सोशल मीडिया पर वायरल होने, मशहूर लोगों के यहां आने और 400 करोड़ रुपये से ज्यादा कमाई करने वाली हनुमान अंश फिल्म की सफलता ने इसकी लोकप्रियता बढ़ाई है, लेकिन यह भीड़ जाम सड़कों, पार्किंग की कमी, बहुत कम शौचालयों और ज़रूरी सामान की सप्लाई में रुकावट के साथ टकरा गई. वहीं सरकार भीड़ को संभालने के लिए पुल, पार्किंग की जगह और बाईपास बनाने की तेजी से कोशिश कर रही है.

गांधी जयंती के वीकेंड ने कैंची धाम की तेज़ी से बढ़ती लोकप्रियता का दूसरा पहलू दिखाया. जब एक साथ हज़ारों लोग पहुंचते हैं, तो तीर्थ से जुड़े कारोबार को चलाने वाली बुनियादी व्यवस्थाएं—सड़कें, ज़रूरी सामान की सप्लाई, कचरा उठाना और पार्किंग भी दबाव में आने लगती हैं. इससे स्थानीय पर्यावरण और व्यवस्था पर भी बहुत दबाव पड़ा.

कैंची धाम जाने वाली संकरी पहाड़ी सड़क पर आश्रम दिखाई देने से काफी पहले ही तीर्थ यात्रा शुरू हो जाती है. दिल्ली, यूपी, पंजाब और हरियाणा नंबर प्लेट वाली गाड़ियां पहाड़ की घुमावदार सड़कों पर धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थीं. ट्रैफिक रुकने पर युवा लड़के-लड़कियां एसयूवी से उतरकर आखिरी रास्ता पैदल तय कर रहे थे. कुछ के हाथ में फूल और प्रसाद थे, जबकि कुछ लोग फोन निकालकर पहाड़ों की वीडियो बना रहे थे और रील्स रिकॉर्ड कर रहे थे. भीड़ के बीच “नीम करोली बाबा की जय” और “जय श्री राम” के नारे सुनाई दे रहे थे.

कैंची धाम के सामने ट्रैफिक | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
कैंची धाम के सामने ट्रैफिक | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

जिस पीढ़ी ने नीम करोली बाबा को इंस्टाग्राम, मशहूर लोगों की कहानियों और हाल में हनुमान अंश की सफलता के जरिए जाना है, उसके लिए कैंची धाम अब सिर्फ कुमाऊं की पहाड़ियों में छिपा हुआ एक आश्रम नहीं है. यह ऐसी जगह बन गया है, जहां युवा भारतीय खुद जाकर अनुभव करना चाहते हैं.

यह बढ़ती लोकप्रियता भारत में धार्मिक पर्यटन के बड़े विस्तार का हिस्सा है. इसमें काशी विश्वनाथ और महाकाल कॉरिडोर से लेकर अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर, राजस्थान में खाटू श्याम, मिर्जापुर में विंध्य कॉरिडोर, केदारनाथ के पुनर्विकास और वृंदावन में बन रहे बांके बिहारी कॉरिडोर तक कई परियोजनाएं और तीर्थस्थल शामिल हैं.

61 साल की चाय की दुकान चलाने वाली राधा ने कहा, “पांच साल पहले तक कैंची धाम में तीर्थयात्रियों की संख्या अभी भी काफी हद तक नियंत्रित थी. भक्तों के बीच यह जाना-पहचाना था, लेकिन कुमाऊं की पहाड़ियों में यह एक छिपी हुई खास जगह थी. फिर सोशल मीडिया, युवा यात्रियों और मशहूर लोगों के आने से इसके बारे में तेजी से जानकारी फैलने लगी. हनुमान अंश ने इसे और हवा दी और नीम करोली बाबा की कहानी को बिल्कुल नए दर्शकों तक पहुंचाया.”

राधा उन बहुत कम ज़िंदा लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने नीम करोली बाबा को देखा था.

शांत कैंची को याद रखने वाले लोग

राधा देवी को वह कैंची धाम आज भी याद है, जब यहां न लंबी लाइनें होती थीं, न बैरिकेड और न ही पहाड़ी सड़क पर ऊपर की ओर जाती गाड़ियों की लंबी कतारें. जब वह पहली बार नीम करोली बाबा से मिली थीं, तब वह बच्ची थीं. उन्होंने बताया कि 10 साल पहले तक भी आश्रम में सिर्फ कुछ सौ लोग ही आते थे, जिनमें ज्यादातर परिवार होते थे. कोविड-19 महामारी के बाद यहां आने वाले लोगों का स्वरूप बदल गया और अब ज्यादा से ज्यादा युवा यहां पहुंचने लगे हैं.

कई दशकों से मंदिर के आसपास रहने वाली राधा ने कहा, “बाबा को शांति पसंद थी. वह बहुत ही साधारण और आम ज़िंदगी जीते थे.” उन्होंने कहा कि आज वह शांत कैंची, जिसे वह याद करती हैं, उसे पहचानना मुश्किल है.

कैंची धाम के पास अपनी चाय की दुकान पर राधा देवी | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
कैंची धाम के पास अपनी चाय की दुकान पर राधा देवी | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

उनके लिए सबसे बड़ा बदलाव सिर्फ आने वाले लोगों की संख्या नहीं है, बल्कि यह भी है कि कौन लोग आ रहे हैं—वे ज्यादा युवा हैं, उनमें से कई ने आश्रम के बारे में ऑनलाइन जाना है और अब पहाड़ों की छोटी यात्रा के हिस्से के रूप में यहां पहुंचते हैं.

यहां के आंकड़े इंस्टाग्राम की किसी रील या सोशल मीडिया पर वायरल हुई लंबी कतारों की वीडियो से ज्यादा अच्छी तरह पूरी कहानी बताते हैं.

जिला प्रशासन के मुताबिक, 2026 के पहले छह महीनों में कैंची धाम में 24.34 लाख लोग पहुंचे. यह संख्या लगभग 8 लाख लोगों की तुलना में तीन गुना से ज्यादा है, जो पहले पूरे एक साल में इस मंदिर में आते थे. भारत की युवा आबादी का फायदा अब मंदिर की लाइन तक भी पहुंचता दिख रहा है: कैंची धाम आने वाले करीब दो-तिहाई लोगों की उम्र 15 से 30 साल के बीच है.

वीकेंड के आसपास बना तीर्थस्थल

कैंची के आसपास बड़े हुए लोगों के लिए यह बदलाव सिर्फ मंदिर के गेट तक सीमित नहीं है.

कैंची, भवाली, भीमताल और यहां तक कि नैनीताल में भी इस आर्थिक बढ़ोतरी का असर अब दिखाई दे रहा है. होटल, होमस्टे, रेस्टोरेंट, टैक्सी, पार्किंग और सड़क किनारे की दुकानों में इसका असर दिख रहा है.

आश्रम के आसपास करीब 100 मीटर का रास्ता टूटा हुआ है और जगह-जगह गड्ढे हैं. हर गुजरती गाड़ी के साथ धूल उड़ती है और सड़क किनारे की दुकानों और तीर्थयात्रियों पर जम जाती है.

फिर भी आश्रम तक पहुंचने के लिए ज्यादातर लोगों को इसी रास्ते से गुजरना पड़ता है.

राधा आश्रम के पास चाय की दुकान चलाती हैं. उन्होंने कहा, “पहले ऐसा नहीं था. अब ऐसा लगता है जैसे हर दिन कोई त्योहार हो.”

यह बदलाव रातों-रात नहीं आया.

लक्ष्मण दास के नाम से जन्मे नीम करोली बाबा ने 1960 के दशक में कैंची आश्रम की स्थापना की थी. हनुमान मंदिर में 15 जून 1964 को प्राण-प्रतिष्ठा हुई थी और बाद में कैंची उनके जीवन के आखिरी वर्षों से जुड़े मुख्य आश्रम के रूप में जाना जाने लगा. कई दशकों तक इस मंदिर की प्रसिद्धि ज्यादातर लोगों की बातों और भक्तों की कहानियों के जरिए फैलती रही. फिर इंटरनेट आया.

इसके साथ ही नीम करोली बाबा को जानने का एक नया तरीका भी आया. अब सिर्फ पारंपरिक भक्त ही नहीं, बल्कि सिलिकॉन वैली के संस्थापक, मशहूर हस्तियां, सोशल मीडिया इन्फलुएंसर्स और अलग तरह की आध्यात्मिकता की तलाश करने वाले युवा भारतीय भी उनके बारे में जानने लगे.

शायद वह कहानी, जिसने कैंची धाम को दुनिया भर में पहचान दिलाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई, स्टीव जॉब्स से जुड़ी है.

2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैलिफोर्निया में फेसबुक के मुख्यालय की यात्रा के दौरान मार्क ज़करबर्ग ने अपनी ज़िंदगी के एक मुश्किल दौर को याद किया था. उन्होंने बताया था कि जॉब्स ने उन्हें भारत में नीम करोली बाबा के आश्रम जाने की सलाह दी थी.

यह कहानी टेक्नोलॉजी की दुनिया से बहुत आगे तक पहुंच गई. इससे कैंची धाम की एक अलग तरह की पहचान बनी: हिमालय का एक ऐसा मंदिर, जिसका दुनिया के सबसे पहचाने जाने वाले टेक्नोलॉजी उद्यमियों से किसी न किसी तरह संबंध जुड़ गया.

इसके बाद मशहूर लोगों का यहां आना शुरू हुआ. विराट कोहली और अनुष्का शर्मा 2022 में अपनी बेटी के साथ कैंची धाम पहुंचे थे.

राधा ने कहा, “उस यात्रा के बाद मंदिर की लोकप्रियता में एक और बड़ा बदलाव आया.”

हालांकि, युवा लोगों के लिए यह ज़रूरी नहीं है कि मशहूर लोगों की कहानी ही सबसे ज्यादा मायने रखती हो. उनके लिए रील ज्यादा मायने रखती है. अब आस्था का रास्ता भी डिजिटल हो गया है. 2021 में बेंगलुरु की अपनी इवेंट्स की नौकरी छोड़कर रेस्टोरेंट शुरू करने वाले नेगी ने कहा, “आस्था ने अर्थव्यवस्था के साथ अव्यवस्था का रूप ले लिया है.”

सरकार बढ़ती भीड़ के हिसाब से सुविधाएं बनाने की कोशिश कर रही है

कैंची में निवेश करने का नेगी का फैसला एक समय पर जल्दबाजी जैसा लगा था. उन्हें याद है कि जब उन्होंने अपना कारोबार शुरू करने की योजना बनाई थी, तो लोग हंसते थे और पूछते थे कि वह वहां निवेश क्यों कर रहे हैं और वहां कौन आएगा.

उन्होंने कहा, “लेकिन सब गलत साबित हुए, लेकिन यह इस जगह के लिए टिकाऊ स्थिति नहीं है. इतनी बड़ी भीड़ को संभालने के लिए यहां बहुत कम सुविधाएं हैं.” उन्होंने बताया कि सामान्य दिनों में 20-25 हजार लोग मंदिर आते हैं, लेकिन हाल के लंबे वीकेंड में यह संख्या दोगुने से भी ज्यादा हो गई.

कैंची के आसपास अब जो सुविधाएं बनाई जा रही हैं, उनसे पता चलता है कि यह स्थिति कितनी तेजी से बदली है.

श्रद्धालुओं की आवाजाही शिप्रा नदी के ऊपर बने एक पुल से होती है, जो फिलहाल आश्रम में आने-जाने का एकमात्र रास्ता है. एक ही संकरे पुल से आने और जाने का काम होने के कारण पैदल लोगों की भीड़ बढ़ते ही आवाजाही जल्दी धीमी हो सकती है.

मानसखंड मंदिर माला मिशन के तहत कैंची धाम के लिए करीब 40 करोड़ रुपये का एक पैकेज है. इसमें कई मंजिल वाली पार्किंग, ध्यान केंद्र और रास्ते शामिल हैं. नई पार्किंग में करीब 400 गाड़ियों को खड़ा करने की व्यवस्था की जाएगी.

यातायात से जुड़ा बड़ा काम 18.15 किलोमीटर लंबा कैंची धाम बाईपास है. यह इलाके को रति घाट और अल्मोड़ा हाईवे की ओर जोड़ेगा. इसमें 74.15 मीटर लंबा मोटर पुल भी शामिल है, जिसके लिए 9.63 करोड़ रुपये मंजूर किए गए थे. जनवरी 2026 में राज्य सरकार ने कहा था कि बाईपास का 8 किलोमीटर हिस्सा पूरा हो चुका है, जबकि 10.15 किलोमीटर का काम चल रहा था. इसके इस साल के अंत तक पूरा होने की उम्मीद है.

लेकिन सवाल यह है कि क्या ये नई सुविधाएं कैंची की बढ़ती लोकप्रियता की रफ्तार के साथ चल पाएंगी.

मंगलवार को जिला मजिस्ट्रेट, एसपी और एसएसपी समेत वरिष्ठ अधिकारी कुमाऊं कमिश्नर दीपक रावत की ओर से बुलाई गई एक जरूरी बैठक में शामिल हुए. बैठक में बढ़ती भीड़ और ट्रैफिक जाम से निपटने पर चर्चा हुई. इस स्थिति से निपटने में शामिल एक जिला अधिकारी ने बताया कि उन्हें वरिष्ठ अधिकारियों के कई फोन आए और उनसे भीड़ को संभालने की योजना मांगी गई.

प्रशासन ने रोज आने वाले लोगों की संख्या पर नज़र रखने के लिए पर्यटन विभाग के UTDB पोर्टल के जरिए पहले से बुकिंग और रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था शुरू करने का प्रस्ताव दिया है.

अधिकारी ने कहा कि सबसे बड़ा काम 18.15 किलोमीटर लंबा बाईपास है. इसका उद्देश्य ट्रैफिक को कैंची धाम से दूर ले जाना और अल्मोड़ा की तरफ जाने के लिए एक दूसरा रास्ता देना है.

अधिकारी ने कहा, “इस परियोजना में शिप्रा नदी के ऊपर एक पुल भी शामिल है और इसे लंबे समय के समाधान के तौर पर आगे बढ़ाया गया है, ताकि मंदिर के आसपास अब जो जाम अक्सर लगते हैं, उन्हें कम किया जा सके.”

दबाव सिर्फ ट्रैफिक तक सीमित नहीं है. भीड़ भरे गेट से थोड़ा आगे जाते ही पहाड़ फिर शांत हो जाते हैं, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि श्रद्धालुओं और गाड़ियों की बढ़ती संख्या आसपास के पर्यावरण को प्रभावित करने लगी है.

स्थानीय निवासी दिनेश गोस्वामी ने कहा, “भीड़ और बड़ी संख्या में गाड़ियों ने इस जगह के लिए पर्यावरण से जुड़ी चिंता पैदा कर दी है. ये पहाड़ बहुत नाजुक हैं और लगातार शोर और आवाजाही आसपास के वातावरण को प्रभावित कर रही है.”

नई पीढ़ी के लिए तीर्थयात्रा एक फिल्म से शुरू होती है

21 साल के मनोज कुमार के लिए कैंची धाम की शुरुआत परिवार की किसी परंपरा या धार्मिक यात्रा से नहीं, बल्कि सिनेमा स्क्रीन से हुई.

हरिद्वार में एक फार्मा कंपनी में काम करने वाले कुमार अपने दोस्त शुभम पटेल के साथ ट्रेन से हरिद्वार से काठगोदाम पहुंचे और फिर शेयर कैब लेकर कैंची धाम आए. दोनों लखीमपुर खीरी के रहने वाले हैं. उनके पास बैग के अलावा ज्यादा सामान नहीं था और उन्होंने इस यात्रा के लिए करीब 500-500 रुपये का बजट रखा था.

‘हनुमान अंश’ एक धार्मिक बायोग्राफिकल ड्रामा फिल्म है, जो नीम करोली बाबा के जीवन और उनकी आध्यात्मिक यात्रा से प्रेरित है. इसमें युवा लक्ष्मीनारायण की कहानी दिखाई गई है. वह भगवान की खोज और दुख और मौत से जुड़े सवालों के जवाब पाने के लिए घर छोड़ देते हैं. इसके बाद वह मंदिरों, जंगलों, नदियों और गांवों से गुजरते हैं और आगे चलकर भक्ति और सेवा की ओर बढ़ते हैं.

आश्रम के पास दीवारों पर लगी ‘हनुमान अंश’ फिल्म के पोस्टर | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
आश्रम के पास दीवारों पर लगी ‘हनुमान अंश’ फिल्म के पोस्टर | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

फिल्म में उस युवा साधु की कहानी को भी दिखाया गया है, जिसे बिना टिकट यात्रा करने के कारण ब्रिटिश दौर की एक ट्रेन से नीचे उतार दिया गया था. बताया जाता है कि उसके ट्रेन से उतरने के बाद ट्रेन आगे नहीं बढ़ी. इसके बाद वह अधिकारियों के माफी मांगने पर ही वापस ट्रेन में बैठने के लिए तैयार हुआ. यह कहानी नीम करोली रेलवे स्टेशन की शुरुआत से जुड़ी हुई है.

पिछले महीने फिल्म देखने के बाद कुमार की नीम करोली बाबा और उनसे जुड़ी चमत्कारों की कहानियों में रुचि बढ़ गई. वह फिल्म में देखी गई जगह पर जाने के बारे में सोचते रहे. इसलिए सोमवार को उन्होंने अपने दोस्त शुभम पटेल के साथ कैंची धाम जाने का सफर शुरू किया.

उन जैसे युवा यात्रियों के लिए कैंची धाम अभी भी कम खर्च में घूमने की जगह है. ट्रेन से सफर, साधारण खाना और मंदिर में कुछ घंटे बिताना इस यात्रा के लिए काफी हो सकता है. लेकिन कुमार के लिए यह सफर सिर्फ कम खर्च में घूमने के बारे में नहीं था.

उन्होंने मंदिर के सामने हाथ जोड़कर कहा, “फिल्म मुझे यहां लेकर आई. इसमें दिखाए गए चमत्कारों का मुझ पर बहुत असर हुआ. फिल्म देखने के बाद मैंने यहां आने की योजना बनानी शुरू कर दी. यहां बहुत शांति है और मुझे बहुत अच्छा लग रहा है.” कुमार ने कहा कि यह जगह धार्मिक पर्यटन और पहाड़ी पर्यटन, दोनों के लिए अच्छी है.

इसके बाद वह श्रद्धालुओं की बढ़ती आवाज में शामिल हो गए और सरल तरीके से बोले, “बाबा की जय.”

कुमार उन लोगों में शामिल हैं, जिनका प्रोफाइल उत्तराखंड पर्यटन विभाग की पर्यटकों की क्षमता पर की गई स्टडी में साफ दिखाई देता है. सर्वे में शामिल करीब 59% लोग पहली बार यहां आए थे, करीब 67% लोगों की उम्र 15 से 30 साल के बीच थी और 82.4% लोग उत्तराखंड के बाहर से आए थे.

यह जरूरी नहीं है कि यह कई दिनों तक किसी धार्मिक जगह पर रुकने वाली पारंपरिक तीर्थयात्रा हो. सर्वे में शामिल करीब 64% श्रद्धालु दर्शन के लिए आए और उसी दिन वापस लौट गए.

कैंची अब धीरे-धीरे वीकेंड के सफर का हिस्सा बनता जा रहा है: दर्शन, खाना, एक फोटो, कुछ रील और फिर शहर वापस.

भीड़ में हर तरह के लोग थे. कुछ अपने परिवार के साथ आए थे और कुछ कपल के रूप में, लेकिन ज्यादातर लोगों की उम्र 40 साल से कम थी. गाड़ियों की नंबर प्लेट से भी तीर्थयात्रा के बदलते स्वरूप का पता चला. कई गाड़ियां उत्तर प्रदेश, दिल्ली और हरियाणा की थीं.

इंस्टाग्राम पर रीलों में आश्रम के वीडियो के साथ भक्ति संगीत और ऐसे कैप्शन लगाए जा रहे हैं, “एक बार आपको चमत्कारों पर विश्वास होने लगे, तो आप यहां पहुंच ही जाएंगे.”

कुछ यूजर्स ने ‘हनुमान अंश’ के गानों के साथ नीम करोली बाबा के साथ अपनी AI से बनाई गई तस्वीरें भी बनानी शुरू कर दी हैं.

ब्रांड और कारोबार बनता: एक तीर्थस्थल

नीम करोली बाबा को लेकर एक नई तरह की विजुअल इकॉनमी भी बन रही है.

श्रद्धा ने सामान बेचने के एक बड़े कारोबार को जन्म दिया है. इसमें सजावट का सामान, यादगार चीजें, की-चेन, बैज, स्टिकर और तस्वीरें शामिल हैं. उनकी तस्वीर कैलेंडर, पोस्टर, कपड़ों और धार्मिक सामान पर दिखाई देती है. उनसे जुड़ा चेक वाला कंबल भी अब एक पहचान वाला प्रतीक बन गया है.

कैंची धाम में नीम करोली बाबा से जुड़ा सामान | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
कैंची धाम में नीम करोली बाबा से जुड़ा सामान | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

उनकी तस्वीरें, कहानियां और कही गई बातें ट्रैवल वीडियो और भक्ति संगीत के साथ सोशल मीडिया पर फैल रही हैं. इसका विजुअल अंदाज़ काफी आधुनिक है. जींस और स्नीकर्स पहने युवा आश्रम के सामने खड़े दिखाई देते हैं, इन्फ्लुएंसर अपनी यात्रा रिकॉर्ड करते हैं और रील्स हिमालय के एक अपेक्षाकृत दूर के मंदिर को इंटरनेट पर पहचानी जाने वाली जगह बना रही हैं.

नीम करोली बाबा पर बनी 2026 की फिल्म ‘हनुमान अंश’ का अपना भक्ति संगीत भी है. इसमें ‘मैंने तेरे ही भरोसे’, ‘जय हनुमान’, ‘राम भजन की ओर’ और ‘हृदय में जिनके सीताराम’ जैसे गाने शामिल हैं.

कुछ कलाकारों ने भी बाबा को लेकर भक्ति संगीत जारी करना शुरू कर दिया है. 2025 के नौ गानों वाले एक एल्बम ‘नीम करोली बाबा कैंची धाम’ में ‘नीम करोली बाबा की महिमा’, ‘बाबा नीम करोली मेरे दिल में’ और ‘राम राम बाबा नाम’ जैसे गाने शामिल हैं.

आश्रम के अंदर यह बदलाव ज्यादा नियंत्रित है. कुछ जगहों पर पर्यटकों के जाने पर अब भी रोक है. श्रद्धालु उन कमरों के बाहर कतार में खड़े होते हैं, जिनके बारे में माना जाता है कि उनका इस्तेमाल नीम करोली बाबा करते थे. वहां संत की एक मूर्ति रखी गई है. लोगों को वहां ज्यादा देर रुकने की अनुमति नहीं है और उन्हें बाहर जाने के लिए कहा जाता है. बाहर मंदिर प्रशासन काले चने का प्रसाद बांटता है. दीवारों पर बाबा की पुरानी तस्वीरें लगी हुई हैं.

इसका नतीजा एक अलग तरह का मेल है: आश्रम के अंदर एक बहुत नियंत्रित आध्यात्मिक जगह और गेट के बाहर तेज़ी से बढ़ता तीर्थ कारोबार.

कारोबार के लिए तेज़ी अच्छी है

ज्यादातर श्रद्धालु रुकते नहीं मंदिर से दूर जाने वाली सड़क पर चलें तो आर्थिक बदलाव और साफ दिखाई देता है. कैंची, भवाली और भीमताल के आसपास होटल और होमस्टे तेज़ी से बढ़े हैं. यहां कुछ घंटों के लिए आने वाले यात्रियों के लिए रेस्टोरेंट भी हैं. नेगी ने जून में ‘अनुकंपा’ नाम से एक होटल शुरू किया. इसमें VIP पर्यटकों के लिए सुपर डीलक्स से लेकर सुइट कैटेगरी तक के कमरे हैं.

पिछले दो साल में कैंची धाम में करीब एक दर्जन होटल खुले हैं. हाल के सबसे ज्यादा भीड़ वाले समय में जिन कमरों का सामान्य किराया 2,000-3,000 रुपये प्रति रात था, वे 7,000 रुपये तक में दिए जा रहे थे.

स्थानीय कारोबार भी इसका असर महसूस कर रहे हैं. लोगों की संख्या बढ़ने के साथ श्रद्धालुओं की बढ़ती आवाजाही से कैंची, भवाली, भीमताल और नैनीताल में होटल, रेस्टोरेंट, होमस्टे और टैक्सी चलाने वालों के लिए रोजगार और कारोबार बढ़ रहा है.

लेकिन इसमें एक समस्या है. ज्यादातर श्रद्धालु रात में यहां नहीं रुकते.

रेस्टोरेंट के पास होटल शुरू करने वाले नेगी ने कहा, “इसका मतलब है कि कैंची को किसी बड़े पर्यटन स्थल जैसा दबाव झेलना पड़ रहा है, लेकिन लंबे समय तक रुकने वाले पर्यटकों से होने वाला आर्थिक फायदा जरूरी नहीं कि यहां मिल रहा हो.”

वहीं, स्थानीय लोगों के लिए इस तेज़ी की कीमत छोटी-छोटी परेशानियों के रूप में सामने आ रही है.

हाल के लंबे वीकेंड के दौरान जो दूध आमतौर पर सुबह राधा के घर पहुंच जाता था, वह दोपहर में पहुंचा. मंदिर के आसपास सड़कों पर लगे जाम के कारण दूध की सप्लाई रुक गई थी.

राधा ने कहा कि स्थानीय लोगों की परेशानी सिर्फ सामान देर से पहुंचने तक सीमित नहीं है. कैंची धाम में खुद चिकित्सा की सुविधाएं बहुत कम हैं. ऐसे में जब किसी को मेडिकल जांच या इलाज की जरूरत होती है, तो गांव के लोगों को 8-10 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है.

उन्होंने कहा, “अगर इसी स्तर पर भीड़ आती रही, तो स्थानीय लोगों की परेशानी दिन-ब-दिन बढ़ेगी. सरकार को तुरंत दखल देना चाहिए.” उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को बहुत ज्यादा भीड़ वाले समय में लोगों का रजिस्ट्रेशन करने और श्रद्धालुओं की संख्या सीमित करने जैसे तरीकों पर विचार करना चाहिए.

इस बीच, मंदिर प्रशासन का कहना है कि उसे पता है कि हाल की भीड़ आने वाले समय में पैदा होने वाली स्थिति की चेतावनी है.

मंदिर के एक सेवादार ने दिप्रिंट को बताया कि कैंची के आसपास रहने वाले लोगों की ज़िंदगी प्रभावित किए बिना बढ़ती श्रद्धालुओं की संख्या को संभालने के तरीके खोजने के लिए प्रशासन लगातार जिला अधिकारियों से बात कर रहा है.

सेवादार ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “हमें वीकेंड के दौरान इतनी बड़ी भीड़ आने की उम्मीद नहीं थी. हम हैरान थे, लेकिन इसके कई कारण थे—लंबा वीकेंड और ‘हनुमान अंश’ फिल्म का असर. हम श्रद्धालुओं के लिए लंबे समय की और टिकाऊ योजना बनाने के लिए जिला प्रशासन से बात कर रहे हैं.”

हालांकि, हर नया आने वाला व्यक्ति यहां से प्रभावित होकर नहीं लौटता.

25 साल के बिमल कुमार, जो लखनऊ के छात्र हैं, ‘हनुमान अंश’ देखने के बाद बाइक से कैंची धाम आए थे. उन्हें उम्मीद थी कि उन्हें खाटू श्याम और वृंदावन जैसा आध्यात्मिक अनुभव मिलेगा, लेकिन वह निराश होकर लौटे.

उन्होंने कहा, “कैंची धाम में अभी भी वह माहौल नहीं है, जो मुझे खाटू श्याम और वृंदावन में मिला था.”

कुमार ने कहा कि उनके लिए सबसे बड़ा आकर्षण नैनीताल और अल्मोड़ा के पास इसकी जगह है. दर्शन के बाद उन्होंने अल्मोड़ा जाने और पहाड़ों में रुकने की योजना बनाई थी. वह एक खास इच्छा लेकर भी आए थे: नौकरी के लिए प्रार्थना करने.

शायद यही कैंची धाम में हो रहे बदलाव का सबसे बड़ा विरोधाभास है. यहां ऐसे लोग आ रहे हैं, जो चमत्कार, पहाड़ों का अनुभव, सेलिब्रिटी की कहानियां और फिल्मों से मिली प्रेरणा की तलाश में आते हैं, और कई बार ये सभी चीजें एक साथ चाहते हैं.

अब सवाल यह है कि क्या यहां का बुनियादी ढांचा, स्थानीय अर्थव्यवस्था और पहाड़ों का नाजुक पर्यावरण उस तीर्थयात्रा का दबाव झेल पाएगा, जिसे सोशल मीडिया और फिल्मों ने बनाया है.

कैंची धाम की प्रसिद्धि उस रफ्तार से बढ़ी है, जितनी तेजी से उसकी सड़कें यहां आने वाले लोगों को नहीं ले जा सकतीं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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