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Friday, 26 June, 2026
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दबाव में दिल्ली की फायर सर्विस: सिर्फ 71 फायर स्टेशन, 1,030 पद खाली और पुराने टूल्स

दिल्ली फायर सर्विस (डीएफएस) में कुल 3,633 स्वीकृत पद हैं, जिनमें से 1,030 खाली हैं. सबसे अहम 2,367 ऑपरेशनल पदों में 552 रिक्तियां हैं.

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नई दिल्ली: मालवीय नगर में होटल में लगी भीषण आग की घटना स्थल से महज़ 500 मीटर की दूरी पर गीतांजलि फायर स्टेशन स्थित है—यह दूरी पैदल दस मिनट से भी कम समय में तय की जा सकती है, लेकिन 3 जून को जब आग लगी, तो स्थानीय निवासियों का आरोप है कि दमकलकर्मी समय पर नहीं पहुंच सके.

उस समय गीतांजलि फायर स्टेशन की टीम लगभग 10 किलोमीटर दूर जौनपुर में लगी कूड़े की आग बुझाने में व्यस्त थी.

गीतांजलि फायर स्टेशन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “हौज रानी से आई कॉल पर जवाबी कार्रवाई करने के लिए हमारे पास पर्याप्त कर्मचारी नहीं थे. अगर हमारी टीम उपलब्ध होती, तो स्थिति काफी अलग हो सकती थी.”

3 जून को हौज रानी में लगी आग की सूचना मिलने पर लगभग 7-8 किलोमीटर दूर स्थित भीकाजी कामा प्लेस और 6 किलोमीटर दूर स्थित नेहरू प्लेस फायर स्टेशन की इकाइयों को मौके पर भेजा गया. दमकल की पर्याप्त गाड़ियां पहुंचने से पहले स्थानीय लोगों ने खुद राहत और बचाव कार्य शुरू कर दिया था. इस हादसे में कई विदेशी नागरिकों समेत कम से कम 22 लोगों की जान चली गई.

दिल्ली फायर सर्विस (डीएफएस) की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, विभाग के पास मुख्यालय और प्रशिक्षण केंद्रों सहित लगभग 71 फायर स्टेशन हैं, जिनमें से चार केवल दिन के समय संचालित होते हैं. ये स्टेशन प्रतिदिन औसतन 98 आपातकालीन कॉलों का जवाब देते हैं और हर साल हज़ारों अग्निशमन एवं बचाव अभियानों को अंजाम देते हैं.

डीएफएस में कुल स्वीकृत पदों की संख्या 3,633 है. हालांकि, वर्ष 2026 में सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार, प्रशासनिक पदों सहित लगभग 1,030 पद खाली पड़े हैं.

कर्मचारियों की कमी और लंबी ड्यूटी

डीएफएस के उप मुख्य अग्निशमन अधिकारी ए.के. मलिक ने बताया कि विभाग को कुल मिलाकर 9,223 अतिरिक्त पदों की आवश्यकता है.

उन्होंने कहा, “पिछले वर्ष दिसंबर में अतिरिक्त ह्यूमन वर्कफोर्स की मांग का प्रस्ताव सरकार को भेजा गया था, लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं मिला है.”

डीएफएस में एक दशक से अधिक समय से कार्यरत एक स्टेशन अधिकारी ने बताया, “स्टेशन अधिकारियों के 90 स्वीकृत पद हैं, लेकिन वर्तमान में केवल 29 पद भरे हुए हैं. हाल ही में 11 नियुक्तियां हुई हैं, जबकि मौजूदा अधिकारियों में से चार अगले तीन महीनों में सेवानिवृत्त होने वाले हैं. ऐसे में संख्या घटकर 25 रह सकती है.”

उन्होंने कहा कि स्टेशन अधिकारी किसी भी फायर स्टेशन की रीढ़ होते हैं और उसके सुचारू संचालन की जिम्मेदारी उन्हीं पर होती है. हालांकि, वर्तमान में सभी फायर स्टेशनों पर स्टेशन अधिकारी तैनात नहीं हैं.

इस पर मलिक ने कहा, “दमकल सेवा एक इकाई के रूप में काम करती है. अगर किसी स्टेशन पर अधिकारी नहीं होता, तो वरिष्ठ कर्मचारी उसकी जिम्मेदारियां संभालते हैं.”

कुछ फायर स्टेशन ऐसे भी हैं जिनका संचालन फायरमैनों द्वारा किया जा रहा है.

हौज रानी में आग लगने वाली जगह से 500 मीटर दूर स्थित गीतांजलि फायर स्टेशन की टीम 3 जून को जौनपुर में लगी कूड़े की आग बुझाने में लगी हुई थी.

गीतांजलि फायर स्टेशन, जो हौज रानी में लगी आग की जगह से 500 मीटर दूर है. 3 जून को, टीम जौनपुर में कूड़े में लगी आग पर काबू पा रही थी | फोटो: हिमांशी अग्रवाल/दिप्रिंट
गीतांजलि फायर स्टेशन, जो हौज रानी में लगी आग की जगह से 500 मीटर दूर है. 3 जून को, टीम जौनपुर में कूड़े में लगी आग पर काबू पा रही थी | फोटो: हिमांशी अग्रवाल/दिप्रिंट

एक स्टेशन अधिकारी को लगातार 72 घंटे की ड्यूटी करनी होती है और इस दौरान उसे स्टेशन परिसर में ही रहना पड़ता है. वह स्टेशन का प्रभारी होता है, प्रशासनिक रिकॉर्ड संभालता है, आपात स्थितियों में टीम का नेतृत्व करता है, कंट्रोल रूम से समन्वय बनाए रखता है और स्टेशन की तैयारी तथा अनुशासन सुनिश्चित करता है. उसकी अनुपस्थिति में लीडिंग फायरमैन या सब-ऑफिसर जिम्मेदारी संभालते हैं, हालांकि नियमों के अनुसार स्टेशन अधिकारी का होना अनिवार्य है. वहीं फायरमैन, लीडिंग फायरमैन और सब-ऑफिसर 24 घंटे की ड्यूटी चक्र में काम करते हैं.

रिपोर्टों के अनुसार, फायर ऑपरेटर के 552 पद अभी भी खाली हैं और कई पद संविदा कर्मचारियों के माध्यम से भरे जा रहे हैं.

वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “किसी भी आपात स्थिति में प्रतिक्रिया देने के लिए कम से कम पांच लोगों की टीम चाहिए—एक ड्राइवर, एक वरिष्ठ अधिकारी और तीन अन्य कर्मचारी, लेकिन एक शिफ्ट में हमारे पास केवल छह से सात कर्मचारी उपलब्ध होते हैं. व्यक्तिगत अवकाश के दौरान यह संख्या और कम हो जाती है.”

उनका दावा है कि गीतांजलि फायर स्टेशन का निर्माण 2018 में हुआ था, लेकिन कर्मचारियों की कमी के कारण यहां 24 घंटे संचालन दिसंबर 2025 में ही शुरू हो पाया. आनंद पर्वत, द्वारका सेक्टर-3, रोहिणी सेक्टर-3, महिपालपुर और आईएफसी गाजीपुर जैसे इलाकों में नए फायर स्टेशनों के लिए भूमि आवंटित हो चुकी है, लेकिन वहां अभी संचालन शुरू नहीं हुआ है.

डीएफएस ने आठ घंटे की शिफ्ट व्यवस्था लागू करने और वर्तमान 24 घंटे की ड्यूटी से होने वाली थकान कम करने के लिए 6,600 से अधिक अतिरिक्त कर्मचारियों की मांग की है. यह मांग कुल 9,123 अतिरिक्त पदों के प्रस्ताव का हिस्सा है.

एक और दमकल गाड़ी, लेकिन कर्मचारी वही

स्टैंडिंग फायर एडवाइजरी काउंसिल (एसएफएसी) और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) के दिशा-निर्देश मानवबल, प्रतिक्रिया समय और उपकरणों के लिए स्पष्ट मानक निर्धारित करते हैं. शहरी क्षेत्रों में आदर्श प्रतिक्रिया समय तीन से पांच मिनट माना जाता है. मानकों के अनुसार प्रत्येक फायर टेंडर पर कम से कम एक लीडिंग फायरमैन और छह फायरमैन होने चाहिए, साथ ही निरंतर संचालन के लिए अतिरिक्त कर्मियों की व्यवस्था भी होनी चाहिए. हालांकि, अधिकांश स्थानों पर इन मानकों का पालन नहीं हो पा रहा है.

गीतांजलि जैसे छोटे फायर स्टेशनों में कर्मचारियों की कमी के कारण फायरमैनों को अतिरिक्त जिम्मेदारियां निभानी पड़ती हैं.

भीकाजी कामा प्लेस फायर स्टेशन उन यूनिट्स में से एक था जिन्होंने हौज रानी कॉल पर रिस्पॉन्ड किया. ट्रैफिक और तंग गलियों की वजह से रिस्पॉन्स टाइम बढ़ गया | फोटो: हिमांशी अग्रवाल/दिप्रिंट
भीकाजी कामा प्लेस फायर स्टेशन उन यूनिट्स में से एक था जिन्होंने हौज रानी कॉल पर रिस्पॉन्ड किया. ट्रैफिक और तंग गलियों की वजह से रिस्पॉन्स टाइम बढ़ गया | फोटो: हिमांशी अग्रवाल/दिप्रिंट

भीकाजी कामा प्लेस फायर स्टेशन भी उन इकाइयों में शामिल था जिन्हें हौज रानी की घटना पर भेजा गया था. यातायात और संकरी गलियों ने प्रतिक्रिया समय को और बढ़ा दिया.

मलिक का कहना है कि गीतांजलि फायर स्टेशन में हमेशा दो दमकल गाड़ियां रही हैं, लेकिन हौज रानी की घटना के समय उनमें से एक अन्य स्टेशन पर तैनात थी.

स्टेशन के अधिकारी ने कहा, “हालिया आग की घटना के बाद हमें एक और गाड़ी मिली है. अब हमारे पास दो गाड़ियां हैं—एक की क्षमता 4,500 लीटर और दूसरी की 12,500 लीटर है, लेकिन कर्मचारियों की संख्या पहले जैसी ही है. दूसरी गाड़ी सहायता के लिए इस्तेमाल की जा सकती है, लेकिन उससे स्वतंत्र अभियान नहीं चलाया जा सकता.”

दिल्ली के 71 फायर स्टेशन उस संख्या से काफी कम हैं जिसे अक्सर आदर्श रूप से 120 बताया जाता है. हालिया रिपोर्टों और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की पुरानी ऑडिट रिपोर्टों में संचार उपकरणों की पुरानी स्थिति, आधुनिक वाहनों की कमी, रखरखाव संबंधी समस्याओं और बुनियादी ढांचे के धीमे विस्तार पर बार-बार चिंता जताई गई है. पूरे शहर में डीएफएस के पास लगभग 249 से 265 वाहन हैं, लेकिन एक ही समय में कई कॉल आने पर प्रति स्टेशन उपलब्ध संसाधन सीमित पड़ जाते हैं.

असहयोगी जनता भी बड़ी चुनौती

गीतांजलि फायर स्टेशन में कर्मियों की अनुपलब्धता के कारण कॉल को नेहरू प्लेस और भीकाजी कामा प्लेस फायर स्टेशनों की ओर मोड़ दिया गया. डीएफएस अधिकारियों का कहना है कि सात इकाइयों को तुरंत रवाना किया गया था और कुछ वाहन 19 मिनट के भीतर पहुंच गए थे. हालांकि, प्रत्यक्षदर्शियों और विपक्षी नेताओं ने एक घंटे तक की देरी का आरोप लगाया, जिससे त्रासदी और गंभीर हो गई. यातायात और संकरी गलियों ने भी राहत कार्य में बाधा डाली.

भीकाजी कामा प्लेस फायर स्टेशन के एक दमकलकर्मी ने बताया, “हमारे पास तीन गाड़ियां हैं, जिनमें से एक फिलहाल मरम्मत के लिए वर्कशॉप में है. कुछ कर्मचारियों के लिए आवासीय सुविधा भी उपलब्ध है.”

उन्होंने बताया कि बुनियादी ढांचे से जुड़ी समस्याएं भी समय बढ़ाती हैं. “पहले फायर स्टेशन के बाहर सड़क के डिवाइडर में एक कट था, लेकिन अब उसे बंद कर दिया गया है. किसी भी दिशा में जाने के लिए लंबा यू-टर्न लेना पड़ता है, जिससे काफी समय लग जाता है. इस काम में हर सेकंड महत्वपूर्ण होता है.”

उन्होंने यातायात और लोगों में जागरूकता की कमी को भी बड़ी समस्या बताया.

उन्होंने कहा, “सड़कों पर बहुत ज्यादा ट्रैफिक रहता है और लोगों में जागरूकता की कमी है. अधिकतर लोग दमकल गाड़ियों या एम्बुलेंस को रास्ता नहीं देते.”

ऑडिट रिपोर्टों और आंतरिक प्रस्तावों में वर्षों से इन समस्याओं को रेखांकित किया जाता रहा है. दिल्ली के तेजी से फैलते शहरीकरण, अतिक्रमण और बढ़ती आपातकालीन कॉलों ने स्थिति को और जटिल बना दिया है.

डीएफएस का कहना है कि उपलब्ध संसाधनों के साथ टीमों को तुरंत रवाना किया गया था. विभाग का दावा है कि आधुनिकीकरण की प्रक्रिया जारी है, जिसमें नई दमकल गाड़ियों की खरीद और प्रशिक्षण कार्यक्रम शामिल हैं. दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड (डीएसएसएसबी) के माध्यम से भर्ती अभियान चलाए जा रहे हैं या प्रस्तावित हैं, जबकि कुछ नियुक्तियां संविदा आधार पर भी की जा रही हैं.

मालवीय नगर की इस त्रासदी के बाद रिक्त पदों को जल्द भरने, भवन सुरक्षा निरीक्षणों को सख्त बनाने और राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप पूरी व्यवस्था विकसित करने की मांग तेज हो गई है.

जब तक इन संरचनात्मक कमियों को दूर नहीं किया जाता, दिल्ली के दमकलकर्मी भारी दबाव में काम करते रहेंगे और उच्च जोखिम वाले इलाकों में रहने वाले लोगों के मन में यह डर बना रहेगा कि नक्शे पर नजदीकी होने का मतलब जमीन पर त्वरित मदद मिलना नहीं है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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