नई दिल्ली: विदेश मंत्रालय (MEA) ने इस हफ्ते यह स्पष्ट किया कि पासपोर्ट नागरिकता का अंतिम या पक्का सबूत नहीं है. इसके बाद पहचान और नागरिकता के सबूत को लेकर बहस और भ्रम बढ़ गया है.
मंत्रालय ने बुधवार को कहा कि भारतीय पासपोर्ट, भले ही भारत सरकार द्वारा पूरी जांच के बाद जारी किया जाता है, लेकिन यह मूल रूप से एक यात्रा दस्तावेज है, न कि नागरिकता का पक्का सबूत.
यह स्पष्टीकरण तब आया जब कई राज्यों में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) के दौरान वोटर लिस्ट से बाहर किए गए पासपोर्ट धारकों ने सवाल उठाया कि क्या वे अपनी नागरिकता साबित करने के लिए पासपोर्ट का इस्तेमाल कर सकते हैं.
दशकों से पासपोर्ट को देश का सबसे भरोसेमंद पहचान दस्तावेज माना जाता रहा है. इसे दुनिया भर की सरकारें स्वीकार करती हैं और यह पुलिस व कई स्तर की जांच के बाद जारी किया जाता है. कई नागरिकों के लिए यह कहना कि यह नागरिकता का अंतिम सबूत नहीं है, विरोधाभासी लगता है.
लेकिन कानूनी रूप से सरकार का यह रुख सही है. अंतर केवल इस बात में है कि भारतीय कानून नागरिकता और यात्रा दस्तावेज को अलग-अलग कैसे देखता है.
भारत में पासपोर्ट पासपोर्ट एक्ट 1967 के तहत जारी किया जाता है. जबकि नागरिकता का नियम सिटिजनशिप एक्ट 1955 के तहत तय होता है. पासपोर्ट किसी को नागरिकता नहीं देता और अगर अदालत में किसी की नागरिकता पर सवाल उठता है तो पासपोर्ट उसे अंतिम रूप से साबित नहीं करता. ऐसे मामलों में जज सिटिजनशिप एक्ट के नियमों और जन्म रिकॉर्ड, माता-पिता की जानकारी, निवास और अन्य दस्तावेजों को देखते हैं.
“पासपोर्ट नागरिकता को बनाता नहीं है. और न ही यह वह कानूनी दस्तावेज है जो नागरिकता विवाद की स्थिति में अंतिम रूप से इसे तय करता है. कई लोकतंत्रों की तरह भारत भी नागरिकता कानून और पासपोर्ट कानून में फर्क करता है. कुछ दुर्लभ मामलों में जैसे धोखाधड़ी, विवादित माता-पिता या अवैध तरीके से दस्तावेज लेने की स्थिति में नागरिकता को सिटिजनशिप एक्ट और अन्य सबूतों के आधार पर साबित करना पड़ता है. इसलिए कानून में पासपोर्ट को हर स्थिति में नागरिकता का पक्का सबूत नहीं माना जाता,” पूर्व विदेश सचिव निरुपमा मेनन राव ने X पर लिखा.
भारत सरकार द्वारा जांच के बाद ही जारी किया जाने वाला पासपोर्ट ज्यादातर नागरिकों के लिए भारतीय राष्ट्रीयता का सबसे मजबूत आधिकारिक सबूत है. लेकिन केवल सामान्य परिस्थितियों में.
नागरिक या नहीं?
विदेशी इमिग्रेशन अधिकारी हर भारतीय पासपोर्ट धारक की नागरिकता की अलग से जांच नहीं करते. वे यह मानकर दस्तावेज स्वीकार करते हैं कि भारतीय सरकार ने पासपोर्ट जारी करने से पहले राष्ट्रीयता की जांच कर ली है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय पासपोर्ट इस बात की आधिकारिक गारंटी माना जाता है कि यात्री भारतीय नागरिक है.
पासपोर्ट यह दिखाता है कि व्यक्ति किसी देश की सुरक्षा और राष्ट्रीयता के तहत यात्रा कर रहा है, लेकिन नागरिकता एक कानूनी स्थिति है जो जन्म, वंश, रजिस्ट्रेशन या प्राकृतिककरण से घरेलू कानून के तहत मिलती है.
अगर फर्जी दस्तावेज, विवादित माता-पिता, गलत आवेदन या रिकॉर्ड में गड़बड़ी जैसे मामले हों, तो अदालत यह तय करती है कि कोई व्यक्ति नागरिक है या नहीं. यह निर्णय पासपोर्ट के आधार पर नहीं, बल्कि सिटिजनशिप एक्ट के तहत रिकॉर्ड देखकर किया जाता है.
कानूनी रूप से पासपोर्ट एक्ट की धारा 6 सरकार को यह अधिकार देती है कि वह गैर-नागरिकों को पासपोर्ट देने से इनकार कर सकती है. इससे यह साबित होता है कि सामान्य तौर पर केवल भारतीय नागरिक ही भारतीय पासपोर्ट रख सकते हैं. लेकिन इसी एक्ट की धारा 20 सरकार को यह भी अधिकार देती है कि वह विशेष परिस्थितियों में और सार्वजनिक हित में गैर-भारतीयों को भी ट्रैवल डॉक्यूमेंट जारी कर सकती है.
“ऊपर दिए गए प्रावधानों के बावजूद, पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज जारी करने के संबंध में, केंद्र सरकार किसी ऐसे व्यक्ति को भी पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज जारी कर सकती है जो भारत का नागरिक नहीं है, यदि सरकार की राय में यह सार्वजनिक हित में आवश्यक हो,” पासपोर्ट एक्ट की धारा 20 कहती है.
2023 में मद्रास हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि वह पासपोर्ट एक्ट 1967 की धारा 20 के तहत एक कानूनी रूप से स्टेटलेस महिला को भारतीय पासपोर्ट जारी करने पर विचार करे. वह महिला श्रीलंकाई शरणार्थी माता-पिता के घर भारत में जन्मी थी.
अदालत ने कहा कि केंद्र के पास “सार्वजनिक हित” में गैर-नागरिकों को भी पासपोर्ट या ट्रैवल डॉक्यूमेंट जारी करने का अधिकार है, और यह नोट किया कि याचिकाकर्ता के माता-पिता श्रीलंका में उत्पीड़न से भागकर आए थे और तमिलनाडु के शरणार्थी शिविर में रह रहे थे.
चूंकि कानून में दुर्लभ परिस्थितियों में गैर-भारतीयों को भी पासपोर्ट देने की अनुमति है, इसलिए पासपोर्ट नागरिकता का सबूत नहीं माना जा सकता.
लोगों की चिंता क्यों?
मंत्रालय का बयान भारतीय पासपोर्ट के महत्व को कम नहीं करता. यह सिर्फ पासपोर्ट कानून और नागरिकता कानून के बीच पुराने कानूनी फर्क को दोहराता है. ज्यादातर भारतीयों के लिए यह फर्क कभी मायने नहीं रखता.
असल समस्या यह है कि भारत में कई देशों की तरह एक एकल नागरिकता प्रमाणपत्र प्रणाली नहीं है. नागरिकता कई दस्तावेजों जैसे जन्म प्रमाणपत्र, स्कूल रिकॉर्ड और वोटर आईडी आदि से साबित होती है. नागरिकता संशोधन कानून 2019, NRC और अब SIR जैसी प्रक्रियाओं के बीच नागरिकता दस्तावेजों को लेकर लोगों में चिंता बढ़ी है.
भारत की नागरिक पंजीकरण प्रणाली कई दशकों में असमान रूप से विकसित हुई है. लाखों पुराने भारतीयों के जन्म के समय रजिस्ट्रेशन ठीक से नहीं हुआ था, और नाम, जन्म तिथि और परिवार रिकॉर्ड में भी कई असमानताएं हैं.
असम में NRC प्रक्रिया ने दिखाया कि दस्तावेजों की कमी के कारण लंबे समय से रह रहे लोग भी नागरिकता साबित करने में मुश्किल में पड़ सकते हैं, जैसा कि राव ने अपने पोस्ट में कहा.
इसी पृष्ठभूमि में, यह कहना कि पासपोर्ट नागरिकता का अंतिम सबूत नहीं है, लोगों में चिंता पैदा करता है, भले ही कानूनी सिद्धांत दशकों से यही रहा हो.
“सीख यह नहीं है कि पासपोर्ट का मूल्य कम हो गया है. बल्कि यह है कि भारत को मजबूत और व्यापक नागरिक पंजीकरण, सार्वभौमिक जन्म पंजीकरण और भरोसेमंद रिकॉर्ड सिस्टम की जरूरत है ताकि नागरिकता कभी भी अधूरे या गायब दस्तावेजों पर निर्भर न रहे,” राव ने कहा.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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