24 साल की स्नेहा ने अपनी सहेली का इंतिज़ार करते हुए कहा, “मुझसे क्लॉक टावर पर मिलना.”
लेकिन यह चेन्नई के एमजीआर सेंट्रल रेलवे स्टेशन, श्रीनगर के लाल चौक या लखनऊ के हुसैनाबाद क्लॉक टॉवर जैसा कोई मशहूर घंटाघर नहीं था. यह नोएडा का नया लैंडमार्क था—सेक्टर-18 में ग्रेट इंडिया प्लेस (जीआईपी) मॉल के बाहर हाल ही में बनाया गया 75 फीट ऊंचा क्लॉक टॉवर.
नोएडा में शहर को सुंदर बनाने की मुहिम अब सिर्फ दीवारों पर चित्रकारी, पार्क और हरियाली तक सीमित नहीं रही. पिछले दो वर्षों में शहर के अलग-अलग हिस्सों में आकर्षक डिज़ाइन वाले क्लॉक टॉवर और पिलर टॉवर बनाए गए हैं, जो सार्वजनिक जगहों को नई पहचान देने के साथ-साथ लोगों के लिए नए लैंडमार्क भी बन रहे हैं. फिलहाल नोएडा में अलग-अलग डिज़ाइन और आकार के छह से अधिक क्लॉक टॉवर हैं, जिन पर करीब 30 लाख रुपये से लेकर दो करोड़ रुपये तक खर्च किए गए हैं.
स्नेहा कहती हैं, “यह अब मिलने की जगह, कुछ देर आराम करने का ठिकाना और सेल्फी लेने का पसंदीदा स्पॉट बन गया है.” वह सेक्टर-18 के क्लॉक टॉवर के पास अपनी दोस्त का इंतिज़ार कर रही थीं.
इस साल जनवरी में नोएडा प्राधिकरण ने सेक्टर-128 के हाजीपुर अंडरपास के पास शहर का पहला लाल ईंट और ग्रेनाइट से बना 25 फीट ऊंचा क्लॉक टॉवर शुरू किया. हालांकि, यह शहर में लगाया गया पहला सार्वजनिक क्लॉक नहीं था. इससे पहले 2024 में सेक्टर-91 स्थित बायोडायवर्सिटी पार्क के भीतर एक पिलर क्लॉक लगाया जा चुका था.
नोएडा प्राधिकरण के उप निदेशक (उद्यान) आनंद मोहन सिंह कहते हैं, “ये क्लॉक टॉवर लोगों को कुछ पल रुककर अपने आसपास के माहौल को महसूस करने का मौका देते हैं. घंटाघर हमेशा किसी शहर की पहचान रहे हैं और उनका आकर्षण कभी कम नहीं होता. इसलिए इन्हें शहर की सौंदर्यीकरण योजना का अगला कदम बनाया गया.”

घंटाघरों का फिर से बनना सिर्फ़ नोएडा तक सीमित नहीं है. पूरे भारत में शहरों ने ऐतिहासिक क्लॉक टावरों को ठीक करना शुरू कर दिया है और साथ ही पारंपरिक आर्किटेक्चर से प्रेरित नए क्लॉक टावर भी बनाए जा रहे हैं.
हाल ही में वाराणसी नगर निगम ने नदेसर स्थित मिंट हाउस चौराहे पर विरासत शैली में बना ‘मिंट हाउस क्लॉक’ स्थापित किया. यह संरचना शहर की ऐतिहासिक विरासत को आधुनिक शहरी विकास के साथ जोड़ने का प्रयास है.
इसी तरह दिसंबर 2025 में ग्रेटर हैदराबाद म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन (जीएचएमसी) ने मसाब टैंक में विरासत शैली से प्रेरित ‘बुर्ज (क्लॉक टॉवर)’ का उद्घाटन किया. डेक्कन टेरेन हेरिटेज द्वारा तैयार की गई यह 20 फीट ऊंची षट्भुजाकार संरचना नगर प्रशासन के 157 वर्ष पूरे होने की याद में बनाई गई है और इसमें पारंपरिक दक्कनी वास्तुकला की झलक दिखाई देती है.
आनंद मोहन सिंह कहते हैं, “इतिहास में क्लॉक टॉवर नागरिक गौरव और सामुदायिक पहचान के प्रतीक रहे हैं. इनकी वापसी सिर्फ वास्तुकला की पहल नहीं है, बल्कि इतिहास को फिर से समझने, उससे सीखने और उस विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का प्रयास भी है.”
एक जुड़ाव
पिछले 11 वर्षों से गौरव यादव रोज़ नोएडा के अलग-अलग सेक्टरों से होकर गुजरते हैं. सेक्टर-51 के निवासी और पेशे से कैब चालक गौरव ने अपनी आंखों के सामने शहर के सबसे व्यस्त कारोबारी इलाके सेक्टर-18 और उसके आसपास को बदलते देखा है.
वह याद करते हैं, “पहले यहां सिर्फ पुलिस चौकी और मॉल हुआ करता था. लोग बस यहां से निकल जाते थे.”
अब उनके लिए और रोज़ इस चौराहे से गुजरने वाले हजारों लोगों के लिए यहां एक नई पहचान खड़ी हो गई है.
नोएडा के सबसे व्यस्त चौराहों में से एक पर बना 75 फीट ऊंचा सेक्टर-18 क्लॉक टॉवर दूर से ही दिखाई देने लगता है. यह नोएडा प्राधिकरण द्वारा बनाया गया अब तक का सबसे ऊंचा और सबसे महंगा क्लॉक टॉवर है. करीब दो करोड़ रुपये की लागत से बने इस टॉवर का उद्घाटन मई 2026 में हुआ. पहले इसे अप्रैल में शहर के स्थापना दिवस पर शुरू किया जाना था, लेकिन काम में देरी के कारण उद्घाटन बाद में हुआ.
चटक लाल रंग में रंगा यह क्लॉक टॉवर श्रीनगर के प्रसिद्ध लाल चौक क्लॉक टॉवर से प्रेरित है. इसके चारों ओर बड़ी-बड़ी घड़ियां लगी हैं, जिनके मोटे अंक काफी दूर से भी साफ दिखाई देते हैं. यह घड़ी सौर ऊर्जा से चलती है, जिससे इसे पूरी तरह शहर की बिजली पर निर्भर नहीं रहना पड़ता.
इसकी जगह भी उतनी ही अहम है जितनी इसकी बनावट. एक ओर सेक्टर-18 और अट्टा मार्केट की रौनक है, तो दूसरी ओर जीआईपी मॉल समेत नोएडा के कई बड़े मॉल और व्यावसायिक परिसर हैं, जहां दिनभर लोगों की आवाजाही रहती है.
दिल्ली-नोएडा बॉर्डर, डीएनडी फ्लाईवे, सेक्टर-27, फिल्म सिटी और नोएडा एक्सप्रेसवे से आने वाली सड़कें इसी चौराहे पर मिलती हैं. यही वजह है कि हर दिशा से आने वाले वाहन चालकों को यह क्लॉक टॉवर सैकड़ों मीटर पहले से दिखाई देने लगता है.
आनंद मोहन सिंह कहते हैं, “हमारी कोशिश रही कि क्लॉक टॉवर ऐसी जगह लगाए जाएं, जहां सबसे ज़्यादा लोग उन्हें देखें और उनसे जुड़ाव महसूस करें. मकसद ऐसे लैंडमार्क बनाना था जो लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन जाएं.”
क्लॉक टॉवर के चारों ओर नोएडा प्राधिकरण ने लोगों के बैठने की भी व्यवस्था की है. गोलाकार परिसर के किनारे काले संगमरमर की बैठने की जगह बनाई गई है, जिसके सामने हरा-भरा लॉन है.
गौरव यादव कहते हैं, “पहले सवारी का इंतज़ार कैब के अंदर बैठकर करता था. अब अगर यात्री को आने में देर हो रही हो तो बाहर निकलकर यहीं बैठ जाता हूं.” वह क्लॉक टॉवर के चारों ओर बनी संगमरमर की सीटों की ओर इशारा करते हैं.
धीरे-धीरे यह क्लॉक टॉवर शहर के सबसे व्यस्त इंतिज़ार स्थलों में से एक बन गया है.

हालांकि, हर कोई इन क्लॉक टॉवरों से जुड़ाव महसूस नहीं करता.
39 वर्षीय तरुण तिवारी, जो सेक्टर-128 के क्लॉक टॉवर के पास से बाइक पर गुजर रहे थे, कहते हैं, “ये इतने व्यस्त रास्तों पर बनाए गए हैं. पहले ट्रैफिक और चौराहों की भीड़ संभालें या रुककर क्लॉक टॉवर देखें?”
क्लॉक टॉवरों के उद्घाटन के बाद सोशल मीडिया पर भी इन्हें लेकर बहस शुरू हो गई.
एक एक्स (पूर्व में ट्विटर) यूज़र ने लिखा, “यह बेहद भद्दा दिखता है. आंखों को चुभने वाला है. माफ़ करो भी @CeoNoida @noida_authority. आपके आर्किटेक्ट ने कहां से कॉपी-पेस्ट करके सड़क के बीचों-बीच यह बेकार सा क्लॉक टॉवर खड़ा कर दिया? इतने ट्रैफिक में लोग यहां घड़ी देखने रुकेंगे? इसकी क्या तुक है? बिल्कुल बेमतलब.”
एक अन्य यूज़र ने इसकी तुलना जोधपुर के क्लॉक टॉवर की वास्तुकला से करते हुए नोएडा की इस संरचना को “कब्र जैसी बनावट” वाला बताया.
अनदेखे रह गए क्लॉक टॉवर
सेक्टर-78 का क्लॉक टॉवर किसी व्यस्त चौराहे या गोलचक्कर पर नहीं, बल्कि एक कॉलोनी के पार्क के भीतर लगाया गया है. मुख्य सड़क से दूर होने और ऊंचे टॉवर जैसी संरचना न होने के कारण यह दूर से दिखाई भी नहीं देता. जहां सेक्टर-18 और सेक्टर-128 के क्लॉक टॉवर शहर की पहचान बन चुके हैं, वहीं सेक्टर-78, 91, 29 और 39 में लगे दूसरे क्लॉक लोगों की नजरों से लगभग ओझल हैं.
नोएडा के सेक्टर-78 स्थित वेद वन पार्क के गेट नंबर-2 के पास काले और सफेद रंग का स्टील से बना एक कलात्मक क्लॉक लगाया गया है. इसमें सजावटी हैंगिंग प्लांटर लगाए गए थे. इस स्थापना पर तीन लाख रुपये से अधिक खर्च हुआ था.
हालांकि, इसका रखरखाव वैसा नहीं हो पा रहा है जैसा सोचा गया था. कई सजावटी गमले गायब हो चुके हैं और घड़ी अक्सर गलत समय दिखाती है. पार्क में आने वाले बच्चे इसके आसपास फोटो खिंचवाते हैं और कई बार घड़ी की सुइयां भी घुमा देते हैं.

पार्क के गेट नंबर-2 पर तैनात एक सुरक्षा गार्ड ने कहा, “मैं बार-बार समय ठीक करते-करते और लोगों को इसे छूने से रोकते-रोकते थक गया हूं, लेकिन कोई सुनता ही नहीं. मैं समय ठीक करता हूं और थोड़ी देर बाद कोई आकर फिर सुइयां घुमा देता है.”
ऐसा ही एक और क्लॉक सेक्टर-91 स्थित बायोडायवर्सिटी पार्क के अंदर लगाया गया है. फूलों और हरियाली के बीच ज़मीन के स्तर पर बनाया गया यह ग्रीन क्लॉक कभी पार्क की खास आकर्षणों में गिना जाता था, लेकिन अब यह काफी हद तक उपेक्षित है और इसका रखरखाव भी कम ही होता है.
गार्ड का कहना है, “इन घड़ियों को किसी सुरक्षा ढांचे के भीतर रखना चाहिए या इनके चारों ओर बैरियर बना देना चाहिए ताकि लोग इन्हें छू न सकें. वरना लोग इन्हें नुकसान पहुंचाते रहेंगे और ये ज़्यादा दिन नहीं टिक पाएंगी.”
वित्त वर्ष 2026-27 के लिए नोएडा प्राधिकरण ने 10,290 करोड़ रुपये का व्यापक आधारभूत ढांचा और शहरी विकास बजट मंजूर किया है. इसमें बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के साथ-साथ शहर के सौंदर्यीकरण, चौराहों के पुनर्विकास और बागवानी के रखरखाव के लिए भी राशि निर्धारित की गई है.
इससे पहले वर्ष 2024-25 में प्राधिकरण ने करीब 7,000 करोड़ रुपये का बजट मंजूर किया था. इसमें से 100 करोड़ रुपये विशेष रूप से उद्यान विभाग के लिए रखे गए थे, ताकि पूरे शहर में हरियाली बढ़ाने, पार्कों का कायाकल्प करने और उनके रखरखाव का काम किया जा सके.

क्लॉक टॉवर की वापसी के पीछे कौन?
पारंपरिक घंटाघरों से लेकर आधुनिक जीपीएस से संचालित क्लॉक तक, इन सभी परियोजनाओं को एक ही कंपनी ने तैयार किया है मेडीवल इंडिया. यही कंपनी श्रीनगर के प्रसिद्ध लाल चौक क्लॉक टॉवर के पुनरुद्धार और देश के कई महत्वपूर्ण सार्वजनिक क्लॉक प्रोजेक्ट्स पर काम कर चुकी है. दिल्ली में भी इसके कई प्रस्ताव मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं.
‘मेडीवल इंडिया – द आर्किटेक्ट्स ऑफ टाइम’ की स्थापना वर्ष 2008 में हुई थी. शुरुआत में कंपनी किसी इंफ्रास्ट्रक्चर ठेकेदार के रूप में नहीं, बल्कि नई दिल्ली के प्रोमेनेड मॉल में बड़े सजावटी क्लॉक बेचने वाले एक रिटेल स्टोर के रूप में शुरू हुई थी.
समीर बख्शी, अंबिका बख्शी और विशाल बख्शी द्वारा शुरू किए गए इस पारिवारिक कारोबार ने धीरे-धीरे उत्तर भारत में अपनी पहचान बनाई. वर्ष 2010 तक कंपनी के स्टोर डीएलएफ प्लेस साकेत, डीएलएफ मॉल ऑफ इंडिया, एंबिएंस मॉल गुरुग्राम, एलांटे मॉल चंडीगढ़ और पवेलियन मॉल लुधियाना जैसे बड़े मॉल में खुल चुके थे.
वर्ष 2019 कंपनी के लिए बड़ा मोड़ साबित हुआ. इसी दौरान उसने रक्षा प्रतिष्ठानों और शैक्षणिक संस्थानों की परियोजनाओं में काम शुरू किया. इनमें भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए), राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए), आईआईटी रुड़की, बिट्स पिलानी और नौसेना के कई ठिकाने शामिल हैं.
साल 2020 में राष्ट्रपति भवन में क्लॉक लगाने की परियोजना ने कंपनी को देशभर में नई पहचान दिलाई. यह उसके सबसे प्रतिष्ठित सरकारी प्रोजेक्ट्स में से एक था, जिसके तहत तीन क्लॉक लगाए गए.
इसके बाद 2023 में श्रीनगर के लाल चौक क्लॉक टॉवर के पुनरुद्धार ने कंपनी को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई. इसी के बाद 2024 में नोएडा प्राधिकरण के साथ उसका जुड़ाव हुआ, जो आज देश के सबसे बड़े एकल-शहर सार्वजनिक क्लॉक कार्यक्रमों में गिना जाता है.
इसके अलावा कंपनी नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, थाईलैंड, सिंगापुर, ओमान, दुबई और सऊदी अरब समेत कई देशों में भी परियोजनाएं पूरी कर चुकी है.
अब तक कंपनी 28 राज्यों में 4,000 से अधिक क्लॉक इंस्टॉलेशन कर चुकी है.
कंपनी के संस्थापक समीर बख्शी कहते हैं, “स्मार्टफोन आपको सिर्फ समय बताता है, लेकिन क्लॉक टॉवर आपको उस शहर के बारे में भी कुछ बताते हैं, जहां आप रहते हैं. वे यह एहसास कराते हैं कि इस शहर की अपनी पहचान, अपना केंद्र और स्थायित्व है. स्मार्टफोन और क्लॉक टॉवर एक-दूसरे के विकल्प नहीं हैं. दोनों की भूमिका अलग है. एक व्यक्तिगत जरूरत पूरी करता है, जबकि दूसरा शहर की पहचान और उसके प्रतीक का काम करता है.”

कंपनी इस समय नई दिल्ली नगर परिषद (एनडीएमसी) के साथ भी कई प्रस्तावों पर काम कर रही है. इनमें सूर्य प्रभा अवधारणा और देवनागरी अंकों पर आधारित तालकटोरा क्लॉक टॉवर डायल डिज़ाइन परियोजना शामिल है, जिसे अंतिम मंजूरी मिलनी बाकी है.
पिछले कुछ वर्षों में देशभर की नगर निकायों, स्मार्ट सिटी परियोजनाओं और संस्थागत ग्राहकों से कंपनी को ऐसे क्लॉक प्रोजेक्ट्स की मांग लगातार बढ़ती हुई मिली है. यह सार्वजनिक क्लॉक वास्तुकला के प्रति बढ़ती रुचि का संकेत माना जा रहा है.
समीर बख्शी कहते हैं, “स्मार्ट सिटीज़ मिशन ने डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, परिवहन और प्रशासनिक व्यवस्था पर सही ध्यान दिया है. लेकिन किसी शहर में स्थायी बदलाव तभी आता है, जब आधुनिक तकनीक और स्थायी विरासत दोनों साथ चलें. जीपीएस से संचालित ऐसा क्लॉक टॉवर, जो सार्वजनिक कला का भी हिस्सा हो, विरोधाभास नहीं बल्कि आदर्श उदाहरण है जहां तकनीक मानवीय बनती है और बुनियादी ढांचा खूबसूरत दिखता है.”
नोएडा में बने ये क्लॉक टॉवर शहर के सौंदर्यीकरण की अंतिम कड़ी नहीं हैं. प्राधिकरण इनकी खूबसूरती और बढ़ाने तथा लोगों को आकर्षित करने के लिए कई नई योजनाओं पर काम कर रहा है.
आनंद मोहन सिंह बताते हैं, “हम इन क्लॉक टॉवरों पर रात के समय आकर्षक रोशनी और लाइट शो शुरू करने की योजना बना रहे हैं.”
उन्होंने बताया कि क्लॉक टॉवरों के आसपास हरियाली बढ़ाने का भी प्रस्ताव है. अपने मोबाइल फोन में प्रस्तावित लैंडस्केपिंग की तस्वीरें दिखाते हुए उन्होंने कहा कि इस पर प्राधिकरण के भीतर चर्चा चल रही है और जल्द ही इन योजनाओं को अमल में लाया जाएगा.
प्रस्तावित बदलावों में सेक्टर-18 के क्लॉक टॉवर को और आकर्षक सेल्फी प्वाइंट तथा सार्वजनिक मिलन स्थल के रूप में विकसित करना भी शामिल है. इसके लिए टॉवर के दोनों ओर सजावटी पंखनुमा संरचनाएं लगाने की योजना बनाई गई है.
ब्यूटीफिकेशन बनाम क्लॉक टॉवर
नोएडा प्राधिकरण के लिए क्लॉक टॉवर सिर्फ अलग-अलग जगहों पर लगाए गए ढांचे नहीं हैं. प्राधिकरण इन्हें शहर के सौंदर्यीकरण (ब्यूटीफिकेशन) की योजना का अहम हिस्सा मानता है, जिनका उद्देश्य तेजी से विकसित हो रहे इलाकों को एक नई दृश्य पहचान देना है.
हालांकि, इतिहासकार और इंडोलॉजिस्ट नीता दुबे इस सोच से सहमत नहीं हैं. उनका मानना है कि क्लॉक टॉवरों की अवधारणा का इतिहास कुछ और कहता है. उनके अनुसार, जिस उद्देश्य से पहले शहरों और कस्बों में घंटाघर बनाए जाते थे, नोएडा के क्लॉक टॉवर न तो उस परंपरा को निभा पा रहे हैं और न ही शहर के ब्यूटीफिकेशन में कोई खास योगदान दे रहे हैं. वे इन्हें केवल राजनीतिक शक्ति के प्रदर्शन का प्रतीक मानती हैं.
नीता दुबे कहती हैं, “परंपरागत रूप से ऐसे ढांचे शहरों और कस्बों की योजना का जरूरी हिस्सा होते थे. सड़कों का जाल एक केंद्रीय बिंदु से फैलता था और वही स्थान पूरे इलाके की पहचान बन जाता था. ये सिर्फ समय बताने वाली घड़ियां नहीं थीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक गतिविधियों के केंद्र भी थीं. लोग वहां मिलते थे, बातचीत करते थे और कई बार राजनीतिक गतिविधियां भी वहीं से संचालित होती थीं.”
उनका कहना है कि आज के नोएडा में यह मूल अवधारणा पूरी तरह खत्म हो चुकी है. उनके मुताबिक, ये संरचनाएं न तो अपने उद्देश्य को पूरा करती हैं और न ही ऐसी हैं कि लोग रुककर इन्हें देखने की इच्छा करें.
दुबे का मानना है कि नोएडा में तेजी से बनी ऊंची-ऊंची इमारतों के बीच क्लॉक टॉवरों का महत्व काफी कम हो गया है.
वह कहती हैं, “जब किसी इलाके में चारों तरफ 20 से 25 मंजिला इमारतें खड़ी हों, तब क्लॉक टॉवर किसी केंद्रीय पहचान के रूप में नहीं उभर सकता. उसकी दूर से दिखाई देने और लोगों को दिशा बताने वाली मूल भूमिका ही खत्म हो जाती है. आज ये ऐतिहासिक या स्थापत्य पहचान बनने के बजाय सिर्फ मिलने-जुलने की जगह बनकर रह गए हैं.”
दुबे नोएडा के क्लॉक टॉवरों को शहर के ब्यूटीफिकेशन का उदाहरण मानने से भी इनकार करती हैं. उनका कहना है कि भारत के पुराने शहरों में बने घंटाघर अपने आसपास के माहौल का स्वाभाविक हिस्सा होते थे.
वह उदाहरण देते हुए चेन्नई सेंट्रल रेलवे स्टेशन के क्लॉक टॉवर और जोधपुर जैसे शहरों के ऐतिहासिक घंटाघरों का जिक्र करती हैं. उनके अनुसार, इन संरचनाओं की वास्तुकला आसपास के बाज़ारों, सार्वजनिक स्थानों और परिवहन केंद्रों के साथ इस तरह घुल-मिल जाती है कि पूरा इलाका एक साझा पहचान और दृश्य रूप ले लेता है.
नीता दुबे कहती हैं, “किसी शहर में सिर्फ कुछ ढांचे खड़े कर देने से वह खूबसूरत नहीं बन जाता. शहर तब सुंदर बनता है, जब उसकी इमारतें और सार्वजनिक संरचनाएं अपने आसपास के माहौल के साथ सहज रूप से जुड़ जाएं और शहर की जीवन-धारा का हिस्सा बन जाएं. अगर कोई क्लॉक टॉवर उस लय में शामिल नहीं हो पाता, तो वह सिर्फ एक अलग-थलग खड़ा ढांचा रह जाता है, शहर की पहचान का हिस्सा नहीं बन पाता.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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