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Monday, 6 July, 2026
होमदेशदिल्ली हाई कोर्ट बच्चे के भरण-पोषण से बचने वाले OCI के खिलाफ इंटरपोल रेड नोटिस क्यों चाहता है

दिल्ली हाई कोर्ट बच्चे के भरण-पोषण से बचने वाले OCI के खिलाफ इंटरपोल रेड नोटिस क्यों चाहता है

उनकी पूर्व पत्नी की अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए, HC ने उनकी गैरहाजिरी में उन्हें छह महीने की जेल की सज़ा सुनाई और 2,000 रुपये का जुर्माना भरने को कहा.

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नई दिल्ली: एक दुर्लभ मामले में, दिल्ली हाई कोर्ट ने पिछले हफ्ते अंतरराष्ट्रीय कानून प्रवर्तन का सहारा लिया. यह मामला यूके आधारित ओवरसीज सिटिजन ऑफ इंडिया (OCI) कार्ड धारक व्यक्ति से जुड़ा था. कोर्ट ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को आदेश दिया कि वह इंटरपोल से उसके खिलाफ रेड नोटिस जारी करने का अनुरोध करे. हाई कोर्ट ने पाया कि उस व्यक्ति ने अपनी संपत्ति छिपाई और अपनी नाबालिग बेटी के भरण-पोषण के लिए कोर्ट के आदेशों का पालन करने से इनकार किया.

कोर्ट एक अवमानना याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसे उसकी पूर्व पत्नी ने दायर किया था. कोर्ट ने उसे अदालत की अवमानना अधिनियम 1971 के तहत दोषी माना और उसकी गैरमौजूदगी में उसे 6 महीने की साधारण जेल की सजा सुनाई. साथ ही उसे 2000 रुपये का जुर्माना भरने का आदेश दिया.

इंटरपोल का रेड कॉर्नर नोटिस दुनिया भर की पुलिस एजेंसियों को किसी व्यक्ति को ढूंढने और अस्थायी रूप से गिरफ्तार करने का अनुरोध होता है, ताकि उसे प्रत्यर्पण या सौंपने की प्रक्रिया हो सके.

CBI इंटरपोल के नियमों के तहत “डिफ्यूजन” भी जारी करेगा ताकि उसे जल्दी पकड़ा जा सके. इसके अलावा, विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय (FRRO) को आदेश दिया गया है कि अगर वह व्यक्ति भारत में प्रवेश करता है तो तुरंत उसे गिरफ्तार किया जाए.

हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसे सख्त कदम जरूरी थे, क्योंकि अगर लोग अदालत के आदेशों को अपनी मर्जी से नजरअंदाज करेंगे तो इससे अराजकता फैल जाएगी और कानून का शासन खत्म हो जाएगा.

मामला

यह व्यक्ति और महिला ने 2005 में नई दिल्ली में शादी की थी, जब दोनों भारतीय नागरिक थे. बाद में वह व्यक्ति यूनाइटेड किंगडम (UK) का नागरिक बन गया और अब उसके पास ओवरसीज सिटिजन ऑफ इंडिया कार्ड है. महिला अभी भी भारतीय नागरिक है. उनकी नाबालिग बेटी 2013 में पैदा हुई थी और अभी पूरी तरह अपनी मां की देखरेख में है.

कोर्ट के आदेश के अनुसार, मां और बेटी जुलाई 2019 के बाद से यूके नहीं गई हैं, जबकि पिता जनवरी 2020 के बाद भारत नहीं आए हैं ताकि वे उनसे मिल सकें.

जनवरी 2022 में उस व्यक्ति ने हर महीने दिए जाने वाले 1,40,000 रुपये के भरण-पोषण को बंद कर दिया, जो कोर्ट के आदेश के अनुसार दिया जा रहा था. महिला ने अप्रैल में उसी साल अभिभावकत्व की याचिका दायर की, जिसमें उसने बेटी की पूरी कस्टडी मांगी. लेकिन कई कोर्ट आदेशों के बावजूद, जिसमें 2023 का फैमिली कोर्ट आदेश और बाद में डिवीजन बेंच का आदेश भी शामिल है, व्यक्ति ने बकाया राशि नहीं चुकाई और नियमित भुगतान नहीं किया.

भरण-पोषण मामले में, व्यक्ति ने “आर्थिक असमर्थता” और पैसे की कमी का दावा किया, जबकि महिला ने ऐसे सबूत दिए जिनसे पता चलता है कि उसने अपनी संपत्ति छिपाई है.

हाई कोर्ट ने कहा कि जब भारत में उनकी मध्यस्थता चल रही थी, तभी उस व्यक्ति ने चुपचाप अपनी यूके की दो कंपनियों को “स्वैच्छिक” तरीके से बंद करने की प्रक्रिया शुरू कर दी. इन कंपनियों के नाम जीएसएम ट्रेडर्स लिमिटेड और जीएसएम ट्रेडर्स प्रॉपर्टी कंपनी लिमिटेड हैं.

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि इन कंपनियों में से एक के पास 2020 में 5 लाख पाउंड से ज्यादा की संपत्ति थी. और बंद होने के बाद भी जुलाई 2023 तक लगभग 1,44,029 पाउंड का सरप्लस बचा था, जो लगभग 1.51 करोड़ रुपये होता है.

इसके अलावा, महिला को छिपाए गए बैंक खातों और क्रिप्टोकरेंसी में बड़े निवेश का पता चला, जो उस व्यक्ति ने अपनी अनिवार्य आय घोषणा में नहीं बताया था. यह निवेश ‘Binance’ के जरिए किया गया था.

इसी आधार पर महिला ने 2024 में हाई कोर्ट में अवमानना याचिका दायर की, जिसमें उसने व्यक्ति पर जानबूझकर आदेशों का पालन न करने और अवज्ञा का आरोप लगाया. उसी साल उसने तलाक की याचिका भी दायर की, जिसमें उसने छोड़ने और क्रूरता के आधार पर तलाक मांगा. उसे नवंबर 2025 में साकेत कोर्ट से तलाक का आदेश मिल गया.

‘न्याय प्रक्रिया का मजाक’

नवंबर 2024 में उस व्यक्ति ने अपने वकील को ईमेल भेजा, जिसमें लिखा था, “मैं भारतीय अदालतों के अधिकार क्षेत्र से बाहर जा रहा हूं, और अब इस केस में हिस्सा नहीं लूंगा.” कोर्ट ने उसके इस रवैये को बहुत गंभीरता से लिया और इसे भारतीय कानून से बचने की कोशिश माना.

जस्टिस सचिन दत्ता ने उसके व्यवहार को “अदालत का अपमान” और “पूरी तरह से प्रक्रिया के प्रति तिरस्कार” बताया. उन्होंने कहा कि उसने आय छिपाने और कई मौकों पर सजा सुनाने के बावजूद पेश न होकर “चालाकी दिखाने की कोशिश” की.

जज ने कहा कि उसका व्यवहार साफ दिखाता है कि उसने जानबूझकर और सोची-समझी योजना के तहत आदेशों का उल्लंघन किया है. उन्होंने कहा कि कई अवसर देने के बावजूद उसने अदालत के निर्देशों का पालन नहीं किया.

जज ने यह भी कहा कि उसका व्यवहार न्यायिक अधिकारों की पूरी तरह अवहेलना दिखाता है और इससे अदालत की अवमानना की कार्रवाई उचित बनती है.

यह मामला 27 जुलाई को आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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