मेरठ: लगभग 35 साल पहले जो ज़मीन खाली झाड़ियों से भरी थी, वह धीरे-धीरे बढ़कर शास्त्री नगर सेंट्रल मार्केट बन गई. लोगों ने इसे मेरठ का कनॉट प्लेस कहना शुरू कर दिया, लेकिन यह मार्केट आवास विकास परिषद की सस्ती आवास वाली ज़मीन पर बना था और कुछ लोगों के लिए यह हमेशा परेशानी का कारण रहा. कई सालों तक नोटिस, आदेशों की अनदेखी और अदालतों में मामले चलते रहे, और आखिरकार योगी आदित्यनाथ सरकार के बुलडोज़र आ ही गए.
25 अक्टूबर की सुबह आवास विकास परिषद के बुलडोज़र पहुंचे. दो दिनों में उन्होंने 22 दुकानें तोड़ दीं — चाय की दुकानें, शादी के कपड़ों की दुकानें, मेडिकल क्लीनिक और यह सब देखते हुए भीड़ जमा थी और दुकानदार चुपचाप रो रहे थे. ऐसा लग रहा था कि एक ऐसे बाज़ार का अंत शुरू हो गया है जिसने मेरठ की आर्थिक रफ्तार को चलाए रखा था. कुल मिलाकर 1,400 से ज़्यादा दुकानों पर गिराने का निशान लगाया गया था. यह कार्रवाई उस केस के बाद हुई जो सालों तक स्थानीय अदालतों में चलता रहा और 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि 7,000 वर्ग मीटर ज़मीन को वापस लिया जाए क्योंकि यह “आवासीय ज़मीन का अवैध व्यावसायिक उपयोग” है.
अगले दिन मलबे के पास अपनी पोती को पकड़े हुए 66 साल के आनंद कुमार ने कहा, “सब कुछ कुछ ही मिनटों में मिट्टी बन गया.” 1986 से यहां रहने वाले आनंद ने इस मोहल्ले को शांत इलाके से भीड़भाड़ वाले बाज़ार में बदलते देखा था, जहां मेरठ ही नहीं, आसपास के कस्बों से भी लोग आते थे. उन्होंने याद किया, “पूरी इमारत कांप रही थी. दीवारों में दरारें पड़ीं और कुछ ही मिनटों में सब पत्थर और धूल के ढेर में बदल गया.”
दुकानदारों की पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से की गई अपीलें खारिज कर दी गई थीं, लेकिन विरोध के बाद अब अधिकारी एक अस्थायी उपाय सुझा रहे हैं — दुकानदारों को उसी जगह पर अस्थायी स्टॉल लगाने की अनुमति दी जाए. खबर है कि शास्त्री नगर सेंट्रल मार्केट को ‘मार्केट स्ट्रीट’ घोषित करने का प्रस्ताव तैयार हो रहा है, जिसे अब मेरठ विकास प्राधिकरण के सामने रखा जाएगा.

यह कहानी नई नहीं है. पिछले हफ्ते वाराणसी के दलमंडी बाज़ार में सड़क चौड़ीकरण के नाम पर 180 से ज़्यादा दुकानें जिनमें 6 मस्जिदें भी थीं, तोड़ दी गईं. दिल्ली के सरोजिनी नगर में भी इस साल सैकड़ों ‘अवैध’ दुकानों को गिराया गया. यह शहरों में होने वाली एक परिचित रस्म है — बुलडोज़र उन गलतियों को ठीक करते हैं जो योजनाकारों ने दशकों पहले की थीं. अधिकारी बाज़ारों और अतिक्रमण को बढ़ने देते हैं और फिर एक दिन अदालतों या राजनीतिक दबाव के कारण उन्हें अचानक गिरा देते हैं.
शास्त्री मार्केट के मामले में मुख्य मुद्दा था — ज़मीन का उपयोग.
अर्बन प्लानर टिकेंद्र पंवार (पूर्व उप-महापौर, शिमला और केरल अर्बन कमीशन सदस्य) ने कहा, “दुनिया के कई शहरों में ‘मिक्स्ड लैंड यूज़’ को स्थानीय अर्थव्यवस्था चलाने का तरीका माना जाता है. इससे रोज़गार पैदा होता है, मज़दूरों को दूर नहीं जाना पड़ता और मोहल्ले की अर्थव्यवस्था चलती है. लोग अपनी ज़िंदगी चलाने के लिए जगहों को बदलते हैं, लेकिन योजना बनाने वाली संस्थाएं समय के साथ नहीं बदलीं. अगर कोई मार्केट 20-30 साल तक चलता रहा है, तो इसका मतलब है कि यह किसी के लिए काम कर रहा है. सवाल यह है: क्या हम रोज़गार की रक्षा कर रहे हैं?”
किसने शिकायत की?
शास्त्री नगर के निवासी लोकेश खुराना घबराए हुए हैं. उन्हें पता है कि कई व्यापारी जो हुआ उसके लिए उन्हें दोष दे रहे हैं.
लोकेश खुराना एक सोशल वर्कर और आरटीआई एक्टिविस्ट हैं. उन्होंने सालों तक देखा कि कैसे आवास विकास परिषद (उत्तर प्रदेश हाउसिंग एंड डेवलपमेंट बोर्ड) की ज़मीन, जो मकानों के लिए थी, धीरे-धीरे अवैध तरीके से बाज़ार और दुकानों में बदलती गई. 2013 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इन्हें गिराने का आदेश दिया था, लेकिन उसे नज़रअंदाज़ कर दिया गया. तभी लगभग दस साल पहले खुराना ने सोचा कि अब कुछ करना चाहिए.
पहले उन्होंने 2014 में डिविजनल कमिश्नर को आवेदन दिया. फिर दो साल बाद डीएम ने क्रिमिनल प्रोसीजर कोड की धारा 133 के तहत बाज़ार को जनहित में परेशानी मानते हुए कार्रवाई के आदेश दिए, लेकिन तब भी कुछ नहीं हुआ. इसके बाद खुराना ने सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर की. तभी पिछले साल आदेश आया.
खुराना ने कहा, “मुझे अपनी जान का डर है.” उन्होंने कहा कि उन्हें इसलिए कार्रवाई करनी पड़ी क्योंकि उनका मोहल्ला धूल, प्रदूषण और अव्यवस्था के कारण रहने लायक नहीं रह गया था, लेकिन वे साफ कहते हैं कि वे व्यापारियों को दोष नहीं देते — वे खुद उन्हीं दुकानों से राशन, बर्तन और कपड़े खरीदते रहे हैं. उनका गुस्सा इस बात पर है कि आवास विकास परिषद, पुलिस और प्रशासन सालों तक आंख बंद कर सोते रहे.
उन्होंने कहा, “अब अचानक सबको कानून याद आ गया, लेकिन जब यह बाज़ार बन रहा था तब ये सब कहां थे?”
दिसंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा जिसमें अवैध दुकानों और निर्माणों को गिराने का आदेश था. व्यापारियों की अपील भी खारिज कर दी गई. इसके बाद मेरठ प्रशासन ने शास्त्री नगर की 1,478 ऐसी जगहों की पहचान की, और पास की कॉलोनियों जैसे जागृति विहार और माधव पुरम में भी.
आज के समय में मिक्स्ड लैंड यूज़ (रहने और बाज़ार दोनों एक साथ) की जरूरत है. अगर आप इसकी योजना नहीं बनाएंगे, तो लोग खुद बना लेंगे. यह उनके जीविका के अधिकार से जुड़ा है. अब फैसले प्रशासन लेता है, विशेषज्ञ नहीं
— अनिल देवाण, पूर्व डीन (रिसर्च), स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर
व्यापारियों के पास कोई रास्ता नहीं बचा. उन्होंने मुख्य सचिव से लेकर आवास विकास के अधिकारियों और यहां तक कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी मुलाकात की. सभी ने एक ही बात कही — “सुप्रीम कोर्ट का ऑर्डर है.”
जिस शनिवार सुबह जेसीबी आई, तब तक बाज़ार वालों को पता था कि अब क्या होने वाला है. कुर्सियां, मेजें, दिवाली का बचा माल, शादी के सीज़न के लिए रखे ब्राइडल कपड़े—सभी को निकाल लिया गया. फिर बिजली काटी गई और मशीनों ने इमारतों को तोड़ना शुरू किया. शटर हिलने लगे, टिन की छत टूट-टूटकर गिरने लगी.

मेरठ एसएसपी विपिन ताडा ने कहा, “यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत की गई. सुरक्षित और शांतिपूर्ण कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए पुलिस और फायर टीम तैनात की गई थी.”
करीब 250 पुलिसकर्मी (सिविल लाइन, पीएसी और ट्रैफिक) मौके पर मौजूद थे, लेकिन किसी ने कार्रवाई रोकने की कोशिश नहीं की.
दोपहर तक चहल-पहल वाली दुकानों की जगह सिर्फ ढेर सारा मलबा था. बस फटे हुए बोर्ड और इधर-उधर पड़े टूटे कैश काउंटर ही दिखाई दे रहे थे.
30 साल बाद ‘लोहे की तरह सख्ती’
तोड़फोड़ का खतरा बहुत समय से मंडरा रहा था. यह विवाद लगभग 40 साल पुराना है, जब राज्य आवास विभाग ने 1986 में शास्त्री नगर में आवास के लिए जमीन आवंटित की थी.
1989 में ज़मीन का कब्ज़ा दे दिया गया, लेकिन थोड़े समय बाद ही इस जगह पर बिना किसी मंजूरी या प्लान के दुकानें बना दी गईं.
जो 22 दुकानों का कॉम्प्लेक्स अब गिराया गया, वह मूल रूप से 288 वर्गमीटर का एक रिहायशी प्लॉट था, जो 1980 के दशक के अंत में वीर सिंह नाम के एक डेयरी किसान को मिला था. 1990 में, इसे पावर ऑफ अटॉर्नी से विनोद अरोड़ा को सौंप दिया गया, जिन्होंने इसे छोटे से कॉमर्शियल ब्लॉक में बदल दिया. फिर दूसरे लोगों ने भी वही किया, और धीरे-धीरे यह फैलते-फैलते शास्त्री नगर सेंट्रल मार्केट बन गया.

1990 से 2013 के बीच, हाउसिंग बोर्ड ने कई बार अवैध निर्माण पर नोटिस जारी किए, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई. मार्च 2005 में पहली बार तोड़फोड़ का आदेश साइन हुआ, लेकिन लागू नहीं हुआ. स्थानीय अफसरों ने ज्यादातर आंखें मूंद लीं.
लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले, जो जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और आर. महादेवन ने दिया, ने अब ज्यादा गुंजाइश नहीं छोड़ी.
कोर्ट ने कहा: “कोई भी अवैध काम, खासकर जब जानबूझकर किया जाए, सिर्फ समय बीत जाने से कानूनी नहीं हो जाता.”
कोर्ट ने अधिकारियों को भी कड़ी टिप्पणी की— “राज्य सरकारें अक्सर रेगुलराइजेशन की प्रक्रिया से खुद को फायदा पहुंचाने की कोशिश करती हैं…अधिकारी, जिन्हें प्लान्ड डेवलपमेंट सुनिश्चित करना चाहिए, वही भूमि माफियाओं के साथ मिल जाते हैं.”
यह बाज़ार हमने खुद बनाया. हर दुकान ने लोगों का पेट पाला. हम कमर्शियल टैक्स भरते हैं, बिजली 14 रुपये यूनिट पर देते हैं. फिर इसे रिहायशी कैसे कह रहे हैं?
— किशोर वाधवा, शास्त्री नगर मार्केट के व्यापारी
जजों ने रेगुलराइजेशन की मांग ठुकरा दी और कहा कि किसी भी अवैध बिल्डिंग को — चाहे कॉमर्शियल हो या रिहायशी — व्यापार लाइसेंस नहीं दिया जाना चाहिए. उन्होंने राज्य को उन अधिकारियों को सज़ा देने के निर्देश भी दिए जो इस अवैध निर्माण में शामिल थे. कोर्ट ने कहा कि मास्टर प्लान से किसी भी तरह का उल्लंघन “सख्ती से, न कि नरमी से” निपटाया जाना चाहिए.
फैसले के बाद हुई एक सर्वे में बड़ी तस्वीर सामने आई— शास्त्री नगर के 13 सेक्टरों में 5,409 रिहायशी प्लॉट देखे गए, जिनमें से 860 का कॉमर्शियल इस्तेमाल हो रहा था और सिर्फ 230 ही आधिकारिक तौर पर मंजूर थे.

इसके बाद तेज़ी से कदम उठे. अक्टूबर में नौचंदी थाने में कम से कम तीन नए एफआईआईर दर्ज हुई.
पहली एफआईआर में 45 आवास विकास अधिकारियों को भारतीय न्याय संहिता की धारा 217 और 218 के तहत लापरवाही और गलत कर्तव्य पालन में आरोपी बनाया गया. विभागीय जांच में 53 कर्मचारी अवैध निर्माण की अनदेखी/अनुमति देने के दोषी मिले.
दूसरी एफआईआर में 22 व्यापारियों पर तोड़फोड़ रोकने, जान जोखिम में डालने और कर्मचारियों पर हमला करने का आरोप लगाया गया. इनमें वीर सिंह, राजकुमार बजाज और राजीव गुप्ता शामिल थे जिनके परिवार इस बाज़ार का हिस्सा रहे थे.
तीसरी एफआईआर, 17 अक्टूबर की, में 22 हाउसिंग बोर्ड अधिकारियों को बार-बार कोर्ट के आदेश के बावजूद अवैध निर्माण न रोकने का आरोपी बनाया गया.
इस महीने लगभग 90-95 दुकानदारों को नोटिस मिले हैं.
जिन संपत्तियों में उल्लंघन है, उन पर नोटिस जारी किए गए हैं
— राजीव कुमार, अधीक्षण अभियंता, आवास विकास परिषद
उन्होंने कहा कि कोर्ट की रोक के कारण पहले कार्रवाई अटकी रही, लेकिन “अब सुप्रीम कोर्ट का आदेश पूरे भारत में लागू होगा.”
लेकिन अब भी लग रहा है कि हालात फिर पुराने ढर्रे की तरफ लौट रहे हैं.
‘मानवीय संकट’ पहुंचा योगी तक
तोड़फोड़ की धूल अभी हवा में ही थी कि बाज़ार ने विरोध में शटर बंद कर दिए. व्यापारियों ने अपने बांह पर काले रिबन बांधे और कैलाश मिठ्ठन नाम की एक मिठाई दुकान के बाहर जुटकर नारे लगाए— “व्यापारी एकता ज़िंदाबाद!” “ईंट से ईंट बजा देंगे!”
शास्त्री नगर में नाराज़गी गहरी थी — यह इलाका बीजेपी का मज़बूत वोटबैंक है और यहां ऊर्जा राज्य मंत्री सोमेंद्र तोमर का भी घर है. व्यापारियों ने पार्टी पर उन्हें छोड़ देने का आरोप लगाया.
एक प्रदर्शनकारी ने कहा, “कह देते हैं ये सुप्रीम कोर्ट का फैसला है. वोट चाहिए थे तो हमने दिए, चंदा चाहिए था तो हमने दिया. अब जब हमें उनकी ज़रूरत है तो कोई हमारी दहलीज़ पर नहीं आता.”

एक नारा बार-बार सुनाई दिया— “सरकार को दिखाना पड़ेगा अपनी ताकत.” कुछ दिन बाद, लगता है असर हुआ.
पिछले हफ्ते, सांसद अरुण गोविल और विधायक अमित अग्रवाल धरने पर पहुंचे और कई आश्वासन दिए. उन्होंने कहा कि जिन 31 और इमारतों पर अगली कार्रवाई की आशंका थी, उन पर अब कोई कार्रवाई नहीं होगी और इन्हें नई भूमि उपयोग नीति के तहत कॉमर्शियल का दर्जा दिया जाएगा.
जहां पहले से दुकानें तोड़ी जा चुकी हैं (प्लॉट 661/6), उसके लिए गोविल ने कहा कि वे प्रभावित लोगों के पुनर्वास की कोशिश कर रहे हैं. वे लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी मिले और उन्हें “गंभीर मानवीय संकट” की जानकारी दी.
गोविल ने एक्स पर लिखा: “माननीय मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी से व्यापारियों के मुद्दों के समाधान पर चर्चा की गई. चर्चा के बाद मेरठ जिला प्रशासन ने व्यापारियों को महत्वपूर्ण राहत दी.”
सेन्ट्रल मार्केट में स्थित कोम्पलेक्स 661/6 की बाईस दुकानों के सुप्रीम कोर्ट के ध्वस्तीकरण के बाद सेन्ट्रल मार्केट अनिश्चित काल के लिए व्यापारियों द्वारा बन्द कर दिया गया था। इस संबंध में प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी से मिलकर व्यापारियों की समस्याओं के… pic.twitter.com/hx0A7OqCbQ
— Arun Govil (@arungovil12) October 28, 2025
अधिकारियों ने कहा कि शास्त्री नगर सेंट्रल मार्केट को कॉमर्शियल स्ट्रीट घोषित करने का प्रस्ताव मेरठ विकास प्राधिकरण की अगली बैठक में रखा जाएगा.
हड़ताल पटाखे और लड्डुओं के साथ समाप्त हुई.
तोमर, जो मेरठ विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष भी हैं, उन्होंने दिप्रिंट को बताया, “हमारी सरकारी अधिकारियों से बातचीत जारी है. हम ऐसी नीति बनाने की कोशिश कर रहे हैं जिससे भविष्य में ऐसे विवाद न हों. हम स्थानीय स्तर पर जुड़े हुए हैं.”
अब दुकान मालिक मिक्स्ड लैंड यूज़ बढ़ाने के लिए नया कानून चाहते हैं.
हालांकि, उत्तर प्रदेश ने जुलाई 2025 में नए नियम लाए थे, जिनमें रिहायशी प्लॉट पर 49% तक कॉमर्शियल इस्तेमाल की इजाज़त है — बशर्ते सड़क की चौड़ाई वगैरह की शर्तें पूरी हों — लेकिन व्यापारी इससे भी ज़्यादा छूट चाहते हैं.
33, डिपार्टमेंट स्टोर मालिक सोनिया रस्तोगी ने कहा, “हम सुप्रीम कोर्ट या आवास विकास योजना के खिलाफ नहीं हैं.” उन्हें भी नोटिस मिला है.
उन्होंने कहा, “हम बस राहत चाहते हैं.”
कानून बनाम रोज़ी-रोटी
भारत के पुराने बाज़ार, जैसे मेरठ का यह बाज़ार, पहले लोहे, गुड़ और गेहूं की मंडियों के आसपास विकसित हुए थे. यह सब मिक्स्ड मॉडल पर चलने वाले थे—नीचे दुकानें, ऊपर घर. इसे शहरी योजनाकार अनिल देवान ‘ऑर्गेनिक प्लानिंग’ कहते हैं.
पुरानी दिल्ली के बाज़ार— चांदनी चौक, कटरा नील, दरीबा कलां, किनारी बाज़ार —भी इसी तरह गलियों और हज़ारों दुकानों के बीच बढ़े, जिन पर लाखों लोगों की रोज़ी-रोटी निर्भर है.
वाराणसी का दालमंडी बाज़ार, काशी विश्वनाथ मंदिर के पास जहां लगभग 500, ज़्यादातर मुस्लिम व्यापारी आजकल अपने ही ‘बुलडोज़र वाली परीक्षा’ से गुज़र रहे हैं.
स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर में पूर्व डीन (रिसर्च) रहे देवान ने कहा, “अब फैसले प्रशासन करता है, न कि योग्य विशेषज्ञ.”
कागज़ों पर जिन बाज़ारों को ‘अवैध कब्जा’ कहा जाता है, वही स्थानीय अर्थव्यवस्था को चलाते हैं. सिर्फ व्यापारी नहीं, बल्कि ट्रांसपोर्टर, रिक्शा चालक, मज़दूर, लोडर और ठेला-खोमचा वाले — सबकी आय इन बाजारों पर टिकती है.
अवैध निर्माण शब्द का इस्तेमाल व्यापारियों के खिलाफ क्यों हो रहा है? जैसे हम कानूनी ज़मीन पर अवैध काम कर रहे हों. अपने ही प्लॉट पर दुकान खोलने पर सज़ा क्यों?
— भगवान दास, अध्यक्ष, दिल्ली हिंदुस्तानी मर्केंटाइल एसोसिएशन
132 साल पुराने दिल्ली हिंदुस्तानी मर्केंटाइल एसोसिएशन के अध्यक्ष भगवान दास ने कहा, “सरकारी नौकरी रोज़गार की गारंटी नहीं देती, लेकिन हमारे व्यापारी रोज़गार देते थे. पुराने बाज़ारों में डिग्री वालों से लेकर बिना स्कूल पढ़े लोगों तक सभी को काम मिलता है.”
मेरठ की तरह ही पुरानी दिल्ली की उद्यमशीलता भी आज कानून और रोज़ी-रोटी के बीच फंसी हुई है.
इस महीने दिल्ली नगर निगम ने कटरा नील में आठ दुकानों को सील कर दिया, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद, जिसमें कहा गया कि रिहायशी जगहों का व्यावसायिक इस्तेमाल रोका जाए. एक निवासी की याचिका में कहा गया कि ऐसे बदलावों से भीड़ और सुरक्षा का खतरा बढ़ता है.
सीलिंग से व्यापारियों में गुस्सा फैल गया. उन्होंने कहा कि यह दिल्ली की ऐतिहासिक बाज़ार व्यवस्था को अनदेखा करता है.
दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और चांदनी चौक के सांसद प्रवीण खंडेलवाल ने घोषणा की कि दिल्ली सरकार इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएगी. उन्होंने कहा कि यह इलाका 1962 के मास्टर प्लान से ही मिक्स्ड या कमर्शियल उपयोग में है.
खंडेलवाल ने मीडिया से कहा: “चांदनी चौक कमर्शियल है. 400 साल पुराने बाज़ार को उल्लंघन कैसे कह सकते हैं?”

भूमि रिकॉर्ड इस दावे को सही ठहराते हैं.
गली घंटेश्वर को एमपीडी 2021 में स्ट्रीट-शॉपिंग लेन बताया गया है और कटरा नील, जो पहले ‘मिक्स्ड-यूज़’ था, अब पूरी तरह कमर्शियल दर्ज है.
दूसरी तरफ, योजना विशेषज्ञ देवान का कहना है कि बार-बार की तोड़फोड़ और सीलिंग दिखाती है कि भारत की सख्त ज़ोनिंग व्यवस्था इस बात को नजरअंदाज करती है कि शहर वास्तव में कैसे जीते हैं.
उन्होंने कहा, “सिंगापुर और हांगकांग में ऊंची इमारतें होती हैं. बेसमेंट में पार्किंग, नीचे बाज़ार, ऊपर दफ्तर और सबसे ऊपर घर.”
लेकिन भारत की योजनाओं में अनौपचारिक सेक्टर — जैसे रेहड़ीवाला, धोबी, छोटे विक्रेता, घरेलू कामगार के लिए जगह ही नहीं है.
देवान के अनुसार, मिक्स्ड लैंड यूज़ जरूरी है — यानी एक ही जगह पर रहने और व्यापार दोनों की इजाज़त.
उन्होंने कहा, “मिक्स्ड लैंड यूज़ आज की ज़रूरत है. अगर आप इसकी योजना नहीं बनाएंगे, तो लोग खुद बना लेंगे. यह उनकी जीविका और जीने के अधिकार से जुड़ा है.”
‘काम रुकना नहीं चाहिए’
45 साल के गौरव वर्मानी जब छोटे थे, तब जहां आज शास्त्री नगर मार्केट है, वहां सिर्फ खाली खेत और आधे-अधूरे प्लॉट होते थे.
वर्मानी, जो अब अपने दादा की चलाई हुई किराने की दुकान चलाते हैं, याद करते हैं— “तब यहां सिर्फ 30-40 परिवार रहते थे. न लाइट थी, न दुकानें, सिर्फ खेत.” उनकी दुकान को भी आवास विकास ने नोटिस भेजा है.
यह इलाका 1980 के अंतिम सालों और 1990 के शुरुआती सालों में बदलने लगा.
1987 के हाशिमपुरा हत्याकांड और उसके बाद बाबरी मस्जिद ढहने के बाद हुए दंगों ने कई परिवारों को पुराने शहर की तनावपूर्ण गलियों से उठकर शहर के शांत दक्षिणी हिस्से की ओर आने पर मजबूर किया.

सामान लाने-ले जाने की सुविधा नहीं थी, इसलिए लोगों ने अपने बीच ही अनाज, कपड़े और दवाइयां बेचनी शुरू कीं. जो लेन-देन से शुरू हुआ, वह धीरे-धीरे अस्थायी दुकानों की कतार में बदल गया.
वर्मानी बताते हैं— “तब नौकरियां नहीं थीं. आसपास के गांवों, हापुड़, बुलंदशहर और दूसरे इलाकों के लोग यहां काम ढूंढने आते थे. इसी तरह शास्त्री नगर का बाज़ार और आसपास की बस्तियां बढ़ीं.”
धीरे-धीरे टिन की छप्परों वाली दुकानें ईंट की दुकानों में बदल गईं. खेत बाज़ार में बदल गए. हवा में तले हुए पकौड़ों और डीज़ल की गंध फैलने लगी. दुकानों के बोर्ड एक-दूसरे पर झुकते हुए दिखाई देते, दर्जियों, क्लीनिक और फैशन की दुकानें सजी रहतीं.
यह मेरठ के कई अनौपचारिक बाज़ारों जैसा बन गया— जैसे सोटी गंज, जहां उत्तर भारत से आए कार पार्ट्स को घंटों में तोड़कर बेच दिया जाता था या अबू लेन और बेगमपुल, जहां पीतल, खेल के सामान और कबाड़ का व्यापार होता था.
लेकिन शास्त्री नगर एक कदम आगे था — इसे लोग “मेरठ का सीपी (कनॉट प्लेस)” कहते थे. यह प्लानिंग से नहीं, बल्कि ज़रूरत से बना बाज़ार था — और इसने लोगों को मौका और रोज़गार दिया.

40 साल पहले, किशोर वाधवा, अब 64 साल के, उन्होंने इस विवादित प्लॉट पर 3,000 किराए में दुकान ली थी. 1990 तक कारोबार अच्छा चलने लगा और उन्होंने दुकान दस लाख रुपये में खरीद ली.
आज उन्होंने कहा, “अगर दुकान गिर न जाती, तो वह 1.5 करोड़ की होती.”
वाधवा की आंखें भर आती हैं— “यह बाज़ार हमने खुद बनाया. हर दुकान ने लोगों का पेट पाला. हम कमर्शियल टैक्स भरते हैं, बिजली 14 रुपये यूनिट पर देते हैं. फिर इसे रिहायशी कैसे कहते हैं?”
एक टूटी दीवार, जिस पर पीला बैरिकेड टेप लगा है, उसके पास 44 वर्षीय भूपेंद्र कुमार शर्मा पहरा दे रहे थे. वे वही क्लीनिक था जिसमें वे 15 साल से काम कर रहे थे. अब उनका काम है—जो मरीज यहां आते हैं, उन्हें जेपी हॉस्पिटल भेजना, जहां डॉक्टर साहब शिफ्ट हुए हैं.
पुराना क्लीनिक डॉक्टर संजय गोयल का था, जो यहां 35 साल से चल रहा था — अब ध्वस्त हो चुका है.
भूपेंद्र ने कहा, “मैं दिनभर यहीं खड़ा रहा हूं. डॉक्टर साहब हम सबके लिए नौकरी का इंतज़ाम कर देंगे. काम रुकना नहीं चाहिए.”
(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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