Friday, 19 August, 2022
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4 वर्षों में 131 नए संस्थान, भारत में निजी विश्वविद्यालयों की बाढ़ सी आ गई है

एआईएसएचई द्वारा जारी किए गए नवीनतम आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में निजी विश्वविद्यालयों की संख्या 2015-16 में 276 से बढ़कर 2019-20 में 407 हो गई है.

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नई दिल्ली: बिलबोर्ड. समाचार पत्र. रेडियो. गूगल. यूट्यूब. इस देश में आप जिधर भी नज़र घुमाएं, आपको हर तरफ निजी विश्वविद्यालय की ही धूम दिखेगी. उनकी सर्वव्यापकता से बच पाना मुश्किल है. यदि आपके पास पैसा है, तो हर एक निजी विश्वविद्यालय आपको दाखिला देने के लिए हर वक्त तैयार है – यहां शैक्षणिक प्रदर्शन या योग्यता की कोई बाधा नहीं है. एक ऐसे देश में जहां शिक्षा की पहुंच अभी भी सर्वसुलभ नहीं है, लेकिन इसकी मांग बढ़ती जा रही है, निजी विश्वविद्यालयों ने पिछले आधे दशक में एक अभूतपूर्व वृद्धि का दौर देखा है, और इसने अन्य प्रकार के विश्वविद्यालयों को बहुत पीछे छोड़ दिया है.

नवीनतम अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण अथवा ऑल इंडिया हाइयर एजुकेशन सर्वे (एआईएसएचई) 2019-20 के आंकड़ों से पता चला है कि भारत में निजी विश्वविद्यालयों की संख्या 2015-16 में 276 से बढ़कर 2019-20 में 407 हो गई, इन 131 निजी विश्वविद्यालयों के अलावा कई और भी जल्द ही शुरू होने वाले हैं.

इस 47 प्रतिशत की वृद्धि ने सभी विश्वविद्यालयों (निजी और सार्वजनिक) की वृद्धि को काफ़ी पीछे छोड़ दिया है जिनकी संख्या 2015-16 में 799 से वर्तमान में 30.5 प्रतिशत बढ़कर 1,043 तक हो पाई है.

सरकारी परिभाषा के अनुसार, शिक्षा संस्थानों को मोटे तौर पर छह श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है – राज्य – के सार्वजनिक विश्वविद्यालय, राज्य- के निजी विश्वविद्यालय, डीम्ड निजी विश्वविद्यालय और डीम्ड सार्वजनिक विश्वविद्यालय, केंद्रीय विश्वविद्यालय तथा राष्ट्रीय महत्व के संस्थान.

हालांकि इनमे से प्रत्येक श्रेणी के विश्वविद्यालयों की संख्या में पिछले पांच साल की अवधि में वृद्धि देखी गई, लेकिन सबसे अधिक वृद्धि राज्य के निजी विश्वविद्यालय वाली श्रेणी में आई है. निजी क्षेत्र के अधिकांश लोगों ने इस वर्ग के तहत अपने विश्वविद्यालयों की स्थापना की और 2015-16 में 197 की संख्या में 66 प्रतिशत वृद्धि के साथ 2019-20 में इनकी संख्या 327 हो गई.

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राष्ट्रीय महत्व के संस्थान (इन्स्टिट्यूट ऑफ नॅशनल इंपॉर्टेन्स) वाले संवर्ग में 80 प्रतिशत की वृद्धि हुई और 2015-16 में 75 की संख्या से बढ़कर 2019-20 इन की संख्या 135 हो गई. प्रतिशत के लिहाज से यह सबसे बड़ी वृद्धि थी.

राज्य के सार्वजनिक विश्वविद्यालय की श्रेणी में सिर्फ़ में 17.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई और 2015-16 में 329 संस्थानों से बढ़कर 2019-20 में ऐसे संस्थानों की संख्या 386 हो गई.

केंद्रीय विश्वविद्यालय की संख्या 2015-16 में 43 से बढ़कर 2019-20 में 48 हो गई और इसमें भी केवल 12 प्रतिशत की वृद्धि आई, जबकि डीम्ड-टू-बी सार्वजनिक विश्वविद्यालय 2025-16 में 32 से 12.5 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 2019-20 में 36 हो गए. डीम्ड-टू-बी प्राइवेट यूनिवर्सिटी श्रेणी में केवल एक नये संस्थान को जोड़ा गया, जिससे उनका आंकड़ा 80 हो गया.

छात्रो की काउन्सेलिंग के लिए बनाए गये एक प्लॅटफॉर्म कॉलेजदेखो के एक विश्लेषण में कहा गया है कि भारत में उच्च शिक्षा बाजार में मुख्य रूप से स्व-वित्त पोषित और गैर-सहायता प्राप्त विश्वविद्यालयों और कॉलेजों का वर्चस्व है जिनकी संख्या लगभग 70% है.

एआईएसएचई की रिपोर्ट पर आधारित एक विश्लेषण से पता चलता है कि पिछले कुछ वर्षों में, भारत में साल-दर-साल औसतन 1000 से ज़्यादा नये कॉलेज स्थापित किए गए हैं, जिनमें से 80 प्रतिशत से अधिक निजी प्रतिष्ठान हैं जबकि शेष सरकार द्वारा वित्त पोषित संस्थान के दायरे में आते हैं.


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ये नए विश्वविद्यालय कौन से हैं?

इस श्रेणी में नए-नये आए संस्थानों में आंध्र प्रदेश के श्री सिटी में स्थित केआरईए विश्वविद्यालय हैं, जिसे भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन का समर्थन प्राप्त है. एक और संस्थान हरियाणा के सोनीपत में ऋषिहुड विश्वविद्यालय है . इन दोनों बहु-विषयक (मल्टी-डिसिप्लिनरी) संस्थानों को पिछले साल शुरू किया गया और इनका उद्देश्य सभी विषयों में ‘उदार शिक्षा’ प्रदान करना है.

क्रेआ की वेबसाइट के अनुसार, इसका मुख्य प्रायोजक इंस्टीट्यूशन फॉर फाइनेंशियल मैनेजमेंट एंड रिसर्च नाम की एक सोसाइटी है, जो अनुसंधान पर केंद्रित एक गैर-लाभकारी संस्था है.

ऋषिहुड यूनिवर्सिटी के बोर्ड में पूर्व रेल मंत्री सुरेश प्रभु चांसलर के रूप में शामिल किए गये हैं और इसके एक संस्थापक के रूप में बचपन प्लेस्कूल श्रृंखला के सह-संस्थापक अजय गुप्ता हैं. इसके अन्य संस्थापकों में सार्वजनिक नेता, आध्यात्मिक गुरु, अग्रणी व्यापारी, शिक्षाविद, सामाजिक कार्यकर्ता और बहुत सारे अन्य लोग शामिल हैं.

इस विश्वविद्यालय की वेबसाइट के अनुसार ऋषिहुड विश्वविद्यालय सामाजिक प्रभाव पैदा करने के लिए एक सामूहिक परोपकारी पहल है.

बेंगलुरु स्थित विद्याशिल्प विश्वविद्यालय, जिसे विद्याशिल्प शिक्षा समूह द्वारा स्थापित किया गया है और जिसके कुलपति के रूप में शिक्षाविद् दयानंद पाई हैं, निजी विश्वविद्यालयों की सूची में एक और नया नाम है जो मल्टी-डिसिप्लिनरी कार्यक्रम प्रदान करते हैं.

शैक्षणिक सत्र 2021-22 इसमे दाखिले का पहला वर्ष होगा. यह 1982 में स्थापित विद्याशिल्प शिक्षा समूह की नवीनतम इकाई है, और इसने लिबरल आर्ट्स कला, डेटा साइन्स और मॅनेज्मेंट स्टूडीज जैसे विषयो में कार्यक्रमों के साथ अपनी शुरुआत की है.

पिछले पांच वर्षों में जो अन्य प्रमुख नाम इस श्रेणी में सामने आए हैं, उनमें राजकोट स्थित मारवाड़ी विश्वविद्यालय भी शामिल है, जिसे 2016 में इंजीनियरिंग, प्रबंधन, कला, वित्त, फिजियोथेरेपी आदि की पढ़ाई करवाने वाले एक बहु-विषयक संस्थान के रूप में स्थापित किया गया था. राजकोट के मारवाड़ी फाइनेंशियल सर्वीसज़ के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक केतन मारवाड़ी इसके संस्थापकों में से एक है.

एक अन्य संस्थान अनंत राष्ट्रीय विश्वविद्यालय है, जो 2016 में अहमदाबाद में लक्ष्मण ज्ञानपीठ ट्रस्ट द्वारा स्थापित एक निजी डिजाइन विश्वविद्यालय है. पीरामल समूह के अध्यक्ष अजय पीरामल इस विश्वविद्यालय के प्रबंधन बोर्ड के अध्यक्ष हैं. इस विश्वविद्यालय में अशोक विश्वविद्यालय के संस्थापक सदस्य हैं – प्रमथ राज सिन्हा और अनुनया चौबे – भी प्रबंधन टीम के सदस्यों के रूप ने शामिल हैं

पश्चिम बंगाल स्थित एडमास विश्वविद्यालय की शुरुआत 2015 में एडमास समूह द्वारा की गई थी. यह इस राज्य का एक प्रसिद्ध शिक्षा समूह है जो तकनीकी कॉलेज एवं अन्य शिक्षा संस्थान चलाता है.


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इतने अधिक निजी संस्थानों की वजह ?

इन नए विश्वविद्यालयों से जुड़े लोगों, जिन्होंने अन्य पुराने निजी संस्थानों की संस्थापक टीम में भी काम किया है, के अनुसार ये विश्वविद्यालय अपने-अपने विविध कार्यक्रमों की पेशकशों के साथ वर्तमान समय की मांग हैं.

मारवाड़ी विश्वविद्यालय के कुलपति संदीप संचेती, जो पहले चेन्नई स्थित एसआरएम विश्वविद्यालय के कुलपति थे और वर्तमान में भारतीय विश्वविद्यालयों के संघ के अध्यक्ष भी हैं, ने कहा कि शिक्षार्थियों की बढ़ती संख्या की जरूरतों को पूरा करने के लिए अब और अधिक निजी विश्वविद्यालय सामने आ रहे हैं, क्योंकि सरकारी संस्थान इनमें से केवल कुछ की हीं ज़रूरतों को पूरा कर सकते हैं

संचेती कहते हैं, ‘यह शायद राष्ट्रीय ज्ञान आयोग (नॅशनल नालेज कमीशन) के उस अनुमान के मुताबिक ही है जिसमें इसने 15 साल पहले यह तथ्य सामने रखा था कि भारत को 1500 विश्वविद्यालयों की आवश्यकता है. अब जबकि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति यह कहती है कि वर्ष 2035 तक सकल नामांकन अनुपात (ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो) को 50 प्रतिशत तक पहुंच जाना चाहिए, हमें और अधिक-से-अधिक शिक्षण संस्थानों की आवश्यकता है.’

सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) मूल रूप से उच्च शिक्षा में नामांकित 18-23 आयु वर्ग की जनसंख्या से संबंधित है.

वे कहते हैं, ‘मेरा मानना है कि यही वह कारण है जिसकी वजह से शैक्षणिक संस्थान बढ़ रहे हैं, न केवल निजी बल्कि सरकारी क्षेत्रों में भी. कई नए सार्वजनिक राज्य विश्वविद्यालय भी खुल गए हैं और इस वृद्धि के आगे जारी रहने की संभावना है.’

उन्होने आगे यह भी कहा कि ‘गति, दक्षता और विविधता वह खास बात है जिसे निजी विश्वविद्यालय प्रदान करते हैं, इसलिए वे इतना अच्छा कर रहे हैं. दूसरी ओर, सरकारी विश्वविद्यालय समानता, पारदर्शिता और जवाबदेही प्रदान करते हैं. गति और विविधता ही वे पहलू है जिनके कारण निजी विश्वविद्यालयों बाजी मार पा रहे हैं.’

अनंत राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के प्रोवोस्ट अनुनया चौबे ने भी संचेती से सहमति जताते हुए कहा कि निजी विश्वविद्यालय अधिक विविधता प्रदान करते हैं. वह अशोक विश्वविद्यालय और यंग इंडिया फेलोशिप कार्यक्रम की संस्थापक टीम में भी रहे हैं.

चौबे ने कहा कि ‘ज्यादातर मामलों में हमने पाया कि सरकारी शिक्षा संस्थान पुराने तरीके से ही काम करते जा रहे हैं और वे बदलते परिदृश्य के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहे हैं जिसके लिए एक नए दृष्टिकोण की आवश्यकता है. यही वह दृष्टिकोण है जिसके साथ हमने अपनी यंग इंडिया फेलोशिप की शुरूआत की थी, जो अशोक विश्वविद्यालय का अग्रदूत था.’

उन्होने कहा कि यह विचार बहुत सरल सा था जिसमें हमें एक ऐसा मंच तैयार करने था जहां कोई भी छात्र मनचाहे रूप से अध्ययन कर सकता हो, वह जो भी रुचि रखता है उसे चुनने में सक्षम होना चाहिए. कंप्यूटर विज्ञान की तरह छात्रों को दर्शनशास्त्र का भी अध्ययन करने में सक्षम होना चाहिए. यह वही चीज़ है जिसे निजी विश्वविद्यालय उपलब्ध करा रहे हैं … एक ऐसा मंच प्रदान करना जो अधिक प्रेरक हो.’

निजी विश्वविद्यालयों के नियमन पर उनका कहना है कि ‘सरकार अब निजी विश्वविद्यालयों प्रति अधिक खुली है, लेकिन शर्त यह है कि उन्हें अच्छा करना होगा. अनंत विश्वविद्याल में विभिन्न सरकारी निकायों द्वारा हमारी नियमित जांच होती है जो इस बात का निरीक्षण करते हैं कि क्या हमारा बुनियादी ढांचा अच्छा है? क्या हम अपने छात्रों को रोजगार के अवसर प्रदान कर रहे हैं और इसी तरह की कई अन्य चीज़ें.’

कोलकाता में एडमास यूनिवर्सिटी के वाइस चॅन्सेलर दीपेंद्र कुमार झा का भी मानना है कि सरकारी संस्थानों के क्षमता की एक सीमा होती है, जिसके परे निजी संस्थानों को आगे आने की जरूरत होती है.

झा कहते हैं, ‘जीईआर लगातार बढ़ रहा है और अधिक संख्या में छात्र उच्च शिक्षा की ओर जा रहे हैं, इसलिए सरकार इसकी ज़रूरत तो एक सीमा तक ही पूरा कर सकती है … धन, संसाधन, सब कुछ की एक की सीमा होती है. यही वह स्थान है जहां निजी क्षेत्र अपने कदम रख रहा है.’

वे यह भी कहते हैं कि इसका एक कारण यह भी है कि सरकार अपने शिक्षण संस्थानों की वैश्विक रैंकिंग के प्रति अधिक सचेत हो गई और इसलिए उसने निजी संस्थानों की ओर देखना शुरू कर दिया है. ऐसे कई निजी संस्थान हैं जो बहुत बढ़िया शोधकार्य कर रहे हैं.’


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निजी विश्वविद्यालय के संचालन का व्यावसायिक पहलू

भारत में शिक्षा एक गैर-लाभकारी क्षेत्र की गतिविधि है, जिसका अर्थ है कि यदि कोई संस्था अधिक धनराशि कमाती है, तो उसे उस धन को वापस अपनी गतिविधियों में लगाना पड़ता है. तो फिर इन निजी संस्थानों को व्यवसाय के रूप में चलाने की वास्तविकता क्या है?

अशोक विश्वविद्यालय और पंजाब में नव स्थापित प्लाक्षा विश्वविद्यालय के संस्थापकों में से एक, विनीत गुप्ता ने बताया कि दो प्रकार के निवेश होते हैं – एक परिवार समर्थित (व्यवसाय उन्मुख), और दूसरा परोपकार से प्रेरित, जहां कई व्यक्ति और संस्थान पैसे का योगदान करते हैं.

गुप्ता कहते हैं ‘यदि आप हार्वर्ड और येल जैसे संस्थानों का उदाहरण ले तो वे निजी संस्थान हैं, लेकिन आप यह नहीं बता सकते कि उनका मालिक कौन है. वे आम तौर पर जनता की भलाई के लिए काम कर रहे हैं … वे परोपकार-पर आधारित संस्थान थे. परोपकारी पहल के इस मॉडल ने अमेरिका को अच्छे विश्वविद्यालय दिए. अशोक और प्लाक्ष वही काम कर रहे हैं. यह एक ऐसा मॉडल है जहां बड़ी संख्या में लोग संसाधनों को इकट्ठा कर रहे हैं.’

वे कहते हैं कि ‘एक अच्छी गुणवत्ता वाले संस्थान को पूरी तरह से खड़ा करने में लगभग 2,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश होगा, लेकिन इन संस्थानों के लिए धन इकट्ठा कर एक निरंतर चलने वाला काम है.’

गुप्ता ने बताया कि एक अच्छा संस्थान बनाने के लिए जिस तरह के पैसे की जरूरत होती है, वह इस बात पर भी निर्भर करता है कि आप इसके साथ क्या करना चाहते हैं. वे कहते हैं, ‘यह इस पर निर्भर करता है क़ि क्या यह एक अत्यधिक शोध-संचालित संस्थान हो या फिर केवल डिग्री प्रदान करने वाला संस्थान हो. एक संस्थान जिस तरह के फैकल्टी (अध्यापकों) की भर्ती करता है, वह भी उसकी लागत तय करता है.’

प्रमथ राज सिन्हा, जो इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस (आईएसबी) के संस्थापक डीन थे और हरियाणा में अशोक विश्वविद्यालय और गुजरात में अनंत राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के संस्थापकों में से एक भी थे, इस बात से सहमत हैं.

वे कहते है.’ इसमें निवेश कई चीजों पर निर्भर करता है – जमीन की लागत, बुनियादी ढांचे और संस्थान की वह गुणवत्ता जो आप शुरुआती वर्षों में चाहते हैं. फिर भी यह ध्यान रखना चाहिए कि शुरुआत में कम से कम 50 करोड़ रुपये से 100 करोड़ रुपये के बीच की जरूरत होती है.’

एक निजी विश्वविद्यालय किस तरह का लाभ कमा सकता है, इस पर उन्होंने कहा, ‘एक विकास काल के बाद – अधिकतम 8-9 वर्ष – अच्छी ख़ासी अतिरिक्त राशि उत्पन्न कर सकता है. लेकिन भूमि और भवन की सभी लागतों की पूरी तरह से वसूली करना कठिन है … एक बार फिर यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप कितना निवेश करते हैं.’

हालांकि इस देश का कानून यह कहता है कि कोई भी शिक्षा संस्थान मुनाफा नहीं कमा सकता है, लेकिन कई लोगों ने नाम न छापने की शर्त पर दिप्रिंट को बताया कि इन नियमों में मौजूद कई खामियों का फायदा उठाते हुए इस तरह के लाभ को हिसाब -किताब से दूर रखते हुए मुनाफा कमाया जाता है.


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क्या इस तरह की वृद्धि का कोई विपरीत पहलू भी है?

पाठ्यक्रम निर्माण और अन्य मामलों में निजी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की भागीदार बनने वाली संस्था सनस्टोन एडुवर्सिटी के मुख्य व्यवसाय अधिकारी अंकुर जैन ने कहा कि निजी विश्वविद्यालयों में बेतहाशा वृद्धि का एक दूसरा पहलू भी है. उनके अनुसार, निचले पायदान पर स्थित संस्थान गुणवत्ता बनाए नहीं रखते हैं.

जैन कहते हैं ‘राज्य के विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम बहुत पुराना है और यही वह स्थान है जहां हम अपने कदम बढ़ाते हैं … संस्थानों को अपने पाठ्यक्रम को उन्नत करने में मदद करने के लिए. लेकिन राज्य के विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम की पुरानी प्रकृति ही वह कारण है कि सरकार ने निजी क्षेत्र के लोगों के लिए इस क्षेत्र को बड़े पैमाने पर खोल दिया है.’

जैन ने आगे बताया, ‘लेकिन समस्या यह है कि उन्होंने इसके लिए जमीन की आवश्यकता बना रखी है … परिणाम स्वरूप जिनके पास भी 25 एकड़ जमीन है, उन्होंने जो पढ़ाया जा रहा है उसकी गुणवत्ता पर ध्यान दिए बिना विश्वविद्यालय खोलना शुरू कर दिया. यही कारण है कि निचले पायदान के निजी विश्वविद्यालय अब राज्य के विश्वविद्यालयों की तरह होते जा रहे हैं जिन्हें शिक्षा की गुणवत्ता की कतई परवाह नहीं है.’

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के दिशा-निर्देशों के अनुसार, एक निजी विश्वविद्यालय की स्थापना के प्रस्ताव को केवल – सोसायटी पंजीकरण अधिनियम के तहत पंजीकृत सोसायटी; राज्य लोक न्यास अधिनियम के तहत पंजीकृत एक सार्वजनिक ट्रस्ट; और कंपनी अधिनियम की धारा 25 के तहत पंजीकृत किसी कंपनी. द्वारा ही प्रायोजित किया जा सकता है

निजी विश्वविद्यालय यूजीसी द्वारा शासित होते हैं और एस्टॅब्लिशमेंट ऑफ आंड मेंटेनेन्स ऑफ स्टॅंडर्ड्स इन प्राइवेट यूनिवर्सिटीस रेग्युलेशन्स 2003 का पालन करते हैं.

निजी विश्वविद्यालयों की संख्या में वृद्धि के बारे में बात करते हुए, यूजीसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अपना नाम न छापने की शर्त पर कहा कि ऐसा बढ़ी हुई मांग के कारण है.

इस अधिकारी ने आगे बताया कि शिक्षार्थियों की संख्या लगातार बढ़ रही है और निजी क्षेत्र ने इस बाजार की क्षमता का पूरा- पूरा दोहन किया है. एनईपी का एक लक्ष्य वर्ष 2050 तक 50 प्रतिशत जीईआर प्राप्त करना भी है; पर यह केवल सार्वजनिक संस्थानों के माध्यम से संभव नहीं होगा. हमें निजी क्षेत्र से सक्रिय भागीदारी की आवश्यकता है.’

इस संस्थानों की गुणवत्ता पर, उन्होंने कहा ‘यदि कोई संस्थान आवश्यक मानकों को पूरा नहीं करता है, तो उसे बंद कर दिया जाएगा …इसे सुनिश्चित करने के लिए नाक (नॅशनल असेसमेंट आंड अक्रेडिटेशन काउन्सिल अथवा राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद) जैसे निकाय कार्यरत हैं.’


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