नई दिल्ली: दिप्रिंट को जानकारी मिली है कि इस साल चल रही नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क (एनआईआरएफ) रैंकिंग के आकलन में बड़ी संख्या में रिसर्च पेपर वापस लिए गए यानी रिट्रैक्ट किए गए पाए गए हैं. इसके बाद सरकार ने उच्च शिक्षा संस्थानों की कड़ी जांच शुरू कर दी है.
इस प्रक्रिया की वजह से इस साल की रैंकिंग जारी होने में भी देरी हुई है. आमतौर पर ये रैंकिंग अगस्त और सितंबर के बीच जारी की जाती हैं.
पिछले साल की एनआईआरएफ आकलन प्रक्रिया में पहली बार संस्थानों पर वापस लिए गए रिसर्च पेपर को लेकर कार्रवाई की गई थी. उनके पब्लिकेशन और साइटेशन स्कोर में से अंक काटे गए थे. रिसर्च पेपर वापस लिए जाने से जुड़ा डेटा थर्ड-पार्टी डेटाबेस से लिया गया था.
ग्लोबल रिसर्च वॉचडॉग रिट्रैक्शन वॉच के मुताबिक, भारत में 2025 में 887 रिसर्च पेपर वापस लिए गए थे. इसके साथ ही भारत दुनिया में सबसे ज्यादा रिसर्च पेपर वापस लेने वाले देशों में दूसरे स्थान पर था. भारत से आगे सिर्फ चीन था, जहां 1,701 रिसर्च पेपर वापस लिए गए थे.
एनआईआरएफ ने सार्वजनिक रूप से यह नहीं बताया था कि 2025 की रैंकिंग में कितने संस्थानों के अंक वापस लिए गए रिसर्च पेपर की वजह से काटे गए थे या कितने रिसर्च पेपर को जुर्माने के लिए गिना गया था.
सूत्रों ने बताया कि शिक्षा मंत्रालय के तहत काम करने वाला स्वायत्त निकाय नेशनल बोर्ड ऑफ एक्रेडिटेशन (एनबीए), जो हर साल रैंकिंग कराता है, अब बार-बार नियम तोड़ने वाले संस्थानों को भविष्य की एनआईआरएफ रैंकिंग से बाहर करने पर विचार कर रहा है.
दिप्रिंट ने एनबीए से आधिकारिक प्रतिक्रिया के लिए ईमेल के जरिए संपर्क किया है. जवाब मिलने पर इस रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा.
एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया, “इस साल बड़ी संख्या में ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें रिसर्च पेपर वापस लिए गए हैं. एनबीए इनकी जांच कर रहा है. संस्थानों को चेतावनी दी जा रही है और आकलन प्रक्रिया और रैंकिंग में नकारात्मक अंक दिए जाएंगे.”
अधिकारी ने आगे कहा, “पिछले साल साफ संदेश दिया गया था कि साहित्यिक चोरी, रिसर्च में गड़बड़ी या फर्जी अथवा बदली हुई पीयर रिव्यू प्रक्रिया के लिए कोई जगह नहीं है. इस साल एनआईआरएफ रैंकिंग प्रक्रिया में इसे लेकर बहुत सख्ती बरती जा रही है और अगले साल से बार-बार नियम तोड़ने वाले संस्थानों को रैंकिंग से बाहर करने की योजना है.”
रिसर्च पब्लिकेशन को संस्थानों से उनके रिसर्चर्स और फैकल्टी सदस्यों की संबद्धता के आधार पर जोड़ा जाता है.
रिसर्च पेपर वापस क्यों लिए जाते हैं?
रिसर्च पेपर वापस लिया जाना भारतीय अकादमिक व्यवस्था में एक बड़ी समस्या रही है. रिट्रैक्शन वॉच के मुताबिक, 2023 में भारत में 2,737 रिसर्च पेपर वापस लिए गए थे. इस मामले में भारत सिर्फ चीन और अमेरिका से पीछे था. डेटा से पता चलता है कि भारत में 2020 से 2022 के बीच रिसर्च पेपर वापस लिए जाने के मामले 2017 से 2019 की तुलना में 2.5 गुना बढ़ गए.
रिसर्च पेपर वापस लेने का मतलब है कि किसी जर्नल ने प्रकाशित रिसर्च पेपर को वैज्ञानिक रिकॉर्ड से औपचारिक रूप से हटा दिया है, क्योंकि उसके नतीजे, डेटा या उसे प्रकाशित करने की प्रक्रिया को भरोसेमंद नहीं माना गया या उसमें गड़बड़ी पाई गई.
रिसर्च पेपर कई वजहों से वापस लिए जा सकते हैं. इनमें साहित्यिक चोरी, फर्जी या बदले हुए डेटा का इस्तेमाल, एक ही रिसर्च को दो बार प्रकाशित करना, नैतिक नियमों का उल्लंघन और फर्जी या बदली हुई पीयर रिव्यू प्रक्रिया शामिल हैं.
महत्वपूर्ण बात यह है कि हर रिसर्च पेपर का वापस लिया जाना जानबूझकर की गई गड़बड़ी का संकेत नहीं होता. कुछ पेपर रिसर्च में हुई वास्तविक गलतियों या कमियों की वजह से भी वापस लिए जाते हैं.
फरवरी 2025 में पीयर-रिव्यू वाली जर्नल नेचर में प्रकाशित एक विश्लेषण में बताया गया कि कुछ भारतीय संस्थानों से वापस लिए गए रिसर्च पेपर की संख्या पिछले पांच वर्षों में साफ तौर पर बढ़ी है.
2025 के एनआईआरएफ फ्रेमवर्क में वापस लिए गए पब्लिकेशन के लिए नकारात्मक अंक देने की व्यवस्था शुरू की गई थी. इसमें वापस लिए गए रिसर्च पेपर और उनसे जुड़े साइटेशन की संख्या के आधार पर संस्थानों के पब्लिकेशन और साइटेशन स्कोर से अंक काटे गए थे.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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