आणंद (गुजरात): आणंद के मंगलपुरा रोड पर बने कैंपस के प्रवेश द्वार पर अब एक नया बोर्ड लगा है. सबसे ऊपर बड़े अक्षरों में लिखा है: त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय. इसके नीचे थोड़े छोटे अक्षरों में लिखा है: इंस्टीट्यूट ऑफ रूरल मैनेजमेंट आणंद.
दूसरी लाइन कोई फुटनोट नहीं है. यही वह नाम था जिससे इस संस्थान के छात्र पिछले 46 सालों से अपनी पहचान बताते आए हैं—चाहें नौकरी के इंटरव्यू हों, गुजरात की डेयरी सहकारी समितियां हों या ग्रामीण भारत के गांव, जहां वे महीनों तक फील्डवर्क करने जाते थे, जो किसी और मैनेजमेंट स्कूल में नहीं सौंपा जाता था.
अब यह नाम एक दूसरे नाम के नीचे आ गया है—ऐसा नाम जो 14 महीने पहले तक मौजूद ही नहीं था.
गेट के अंदर जाते ही कैंपस काफी हद तक पहले जैसा ही दिखता है. इमारतें वही ग्रे कंक्रीट की हैं जिन्हें आर्किटेक्ट अच्युत कानविंदे ने 1970 के दशक में डिजाइन किया था—सीधी-सादी और लंबे समय के लिए बनाई गई.
रवि जे. मथाई लाइब्रेरी जिसका नाम रवि जे. मथाई के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने इस संस्थान को आकार देने में मदद की थी — आज भी कैंपस के बीचोंबीच मौजूद है. घुमाव और ढांचे से ढके रास्ते भी वैसे ही हैं.

एग्जीक्यूटिव ट्रेनिंग एंड डेवलपमेंट सेंटर के पास दीवार पर लगी तस्वीरें संस्थान का पूरा इतिहास बताती हैं. त्रिभुवनदास पटेल, जिन्हें भारत के सहकारी आंदोलन का जनक माना जाता है. उनके बगल में वर्गीज कुरियन, जिन्होंने अमूल बनाया और 1979 में IRMA की स्थापना की.
आगे बढ़ती तस्वीरों में इंदिरा गांधी हैं, जो 1982 में IRMA के पहले दीक्षांत समारोह में आई थीं…फिर राजीव गांधी…अटल बिहारी वाजपेयी…ए. पी. जे. अब्दुल कलाम.
और सबसे नई तस्वीर में हैं अमित शाह, जो हाल के एक दीक्षांत समारोह में पहुंचे थे.

बदलाव
3 फरवरी 2025 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में एक बिल पेश किया. त्रिभुवन सहकारी यूनिवर्सिटी बिल में प्रस्ताव रखा गया कि 1979 से सोसाइटी के रूप में रजिस्टर्ड IRMA को भारत की पहली राष्ट्रीय सहकारी यूनिवर्सिटी के एक स्कूल के रूप में बदला जाए, जो सहकारिता मंत्रालय के तहत काम करेगी.
लोकसभा ने इसे पिछले साल 26 मार्च को और राज्यसभा ने 1 अप्रैल को पास कर दिया. 3 अप्रैल को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली. 6 अप्रैल को गजट नोटिफिकेशन जारी हुआ और IRMA एक कानूनी संस्था के रूप में खत्म हो गया.
उसकी जगह त्रिभुवन सहकारी यूनिवर्सिटी ने ली, जिसे राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित किया गया. पुराने प्रमुख एमबीए कोर्स के साथ तीन नए एमबीए प्रोग्राम शुरू किए गए—कोऑपरेटिव मैनेजमेंट, एग्रीबिजनेस मैनेजमेंट और कोऑपरेटिव बैंकिंग एंड फाइनेंस. जे एम व्यास, जो नेशनल फोरेंसिक साइंसेज यूनिवर्सिटी के फाउंडर और प्रिंसिपल रहे हैं, उन्हें टीएसयू का कार्यकारी प्रिंसिपल बनाया गया.

सरकार की तरफ से इस बदलाव के पीछे तर्क सीधा था. भारत में 8 लाख से ज्यादा सहकारी समितियां और 30 करोड़ सहकारी सदस्य हैं. लंबे समय से इस क्षेत्र में प्रशिक्षित प्रोफेशनल्स की कमी रही है. IRMA हर साल सिर्फ 60-90 स्टूडेंट तैयार कर रहा था. टीएसयू को इस स्केल की प्रॉब्लम दूर करने के लिए बनाया गया.
इस बदलाव को अभी सिर्फ एक साल हुआ है. 46 साल पुराने इंस्टीट्यूट को अपने अंदर शामिल करना, एक साथ तीन नए प्रोग्राम शुरू करना और पूरी नई यूनिवर्सिटी व्यवस्था बनाना—ऐसे बड़े बदलावों को स्थिर होने में समय लगता है. प्रिंसिपल में शुरुआती परेशानियां साफ दिख रही हैं, लेकिन बदलाव की स्पीड भी नज़र आ रही है.
किसी ने नहीं चुना दूसरा रास्ता
जब टीएसयू के तीन नए प्रोग्राम शुरू किए गए, तब IRMA के एमबीए इन रूरल मैनेजमेंट के छात्रों—जो पहले PGDM(RM) का 46वां बैच था और जिसमें 240 छात्र थे, को आधिकारिक तौर पर एक विकल्प दिया गया: या तो रूरल मैनेजमेंट में बने रहें, या नए कोर्सों में चले जाएं.
लेकिन हर छात्र ने रूरल मैनेजमेंट में ही बने रहने का फैसला किया. एक भी छात्र ने कोर्स नहीं बदला. दिप्रिंट ने कैंपस में ऐसे छह छात्रों से बात की.
एमबीए (रूरल मैनेजमेंट) के छात्र आलोक तिंदवानी ने कहा, “एक जनरल बॉडी मीटिंग (जीबीएम) हुई थी, जिसमें डीन अकैडमिक्स, डीन प्लेसमेंट्स और बाकी सभी मौजूद थे. उन्होंने बताया कि आगे क्या होने वाला है और नए छात्रों को कैसे मदद दी जाएगी. हमें साफ मौका दिया गया था—अगर हम रहना चाहते हैं या बाहर जाना चाहते हैं. लेकिन हम सभी रुके. IRMA की 46 साल पुरानी मजबूत संस्कृति है. हमें पूरा भरोसा था कि इससे हमारी प्लेसमेंट पर असर नहीं पड़ेगा.”
एमबीए (रूरल मैनेजमेंट) की छात्रा शर्मिष्ठा काले ने जीबीएम से पहले की अनिश्चितता के बारे में बताया.
उन्होंने कहा, “हालांकि इंटरव्यू के दौरान मुझे बताया गया था कि संस्थान त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय में बदल रहा है, लेकिन हमें यह नहीं पता था कि इसे लागू होने में कितना समय लगेगा. जब हमारे आने के बाद तीन नए प्रोग्राम शुरू हुए, तब यह पूरी तरह तय नहीं था कि कौन-कौन से कोर्स होंगे और प्लेसमेंट का क्या माहौल रहेगा. काफी अनिश्चितता थी.”
सोमित गुच ने इस उलझन को दूसरे तरीके से समझाया. उन्होंने कहा, “बाद में जाकर चीजें साफ होने लगीं, कि IRMA अब एक केंद्रीय विश्वविद्यालय बन गया है, इसका नाम टीएसयू हो गया है और अब कुछ और कॉलेज व कोर्स भी होंगे. सबसे ज्यादा उलझन इस बात को लेकर थी कि पाठ्यक्रम और प्लेसमेंट कैसे होंगे.”
यह चिंता समझ में आने वाली थी और सिर्फ IRMA तक सीमित नहीं थी. इतने बड़े बदलाव से गुजरने वाला कोई भी संस्थान अपने छात्रों में ऐसी बेचैनी पैदा करता. एमबीए इन रूरल मैनेजमेंट में दाखिले के लिए सीएटी या एक्सएटी में 80 परसेंटाइल या उससे ज्यादा स्कोर लाना होता है, जिसके बाद लिखित परीक्षा और पर्सनल इंटरव्यू होता है. ऐसे में छात्रों का वहीं बने रहने का फैसला अपने तरीके से संस्थान पर भरोसे का संकेत था—चाहे नाम पुराना हो या नया.
संस्थान के निदेशक शाश्वत नारायण बिस्वास, जो तीन दशक से ज्यादा समय से IRMA से जुड़े हैं और बदलाव के दौरान नेतृत्व संभाल रहे थे, उन्होंने इस चिंता को सीधे स्वीकार किया. उन्होंने कहा, “अकादमिक दुनिया विरासत पर टिकी होती है. जब आप कोई कोर्स चुनते हैं तो देखते हैं कि यहां से कौन पढ़कर निकला है, एलुमनाई कौन हैं, प्लेसमेंट रिकॉर्ड क्या है. ऐसे बदलाव के साथ पहला साल हमेशा मुश्किल होता है.”
उन्होंने लंबी तस्वीर समझाते हुए कहा, “जब IRMA शुरू हुआ था, तब पहले बैच में 44 छात्र थे. आज हमारे पास 360 छात्र हैं. डेढ़ दशक तक छात्रों की संख्या 60 से कम रही. फिर धीरे-धीरे विस्तार हुआ. अब भी वही होने वाला है. मैं यहां 34 साल से हूं. मुझे पता है कि इसमें समय लगेगा. हम अधीर लोग नहीं हैं.”

नए कोर्स
नए प्रोग्राम, जिनमें पहले बैच में 40-60 छात्र हैं, अपने साथ ऐसे छात्रों का समूह लेकर आए हैं जो शुरू से जानते थे कि वे पहले बैच का हिस्सा हैं. उनके पास न कोई पुराने छात्र थे जिनसे सलाह ले सकें और न कोई पुराना प्लेसमेंट रिकॉर्ड.
एमबीए इन एग्रीबिजनेस मैनेजमेंट की पहली बैच की छात्रा साक्षी ने कहा कि शुरुआत से ही उत्साह और शक दोनों थे. उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “शुरुआत से ही थोड़ा डर और उत्साह दोनों था क्योंकि हम पहला बैच थे. कोर्स कैसे चलेगा, इसे लेकर उलझन थी, लेकिन कोर्स पूरी तरह इंडस्ट्री की जरूरतों के हिसाब से बनाया गया है—एग्री सप्लाई चेन, कृषि में रिस्क मैनेजमेंट, एग्री फाइनेंस. यह पूरी तरह उस चीज़ से जुड़ा है जिसकी इस क्षेत्र को ज़रूरत है.”
प्लेसमेंट के बारे में उन्होंने कहा कि प्रशासन शुरू से सक्रिय रहा. “जिस दिन से हमारा ऑनबोर्डिंग शुरू हुआ, उसी दिन से प्लेसमेंट को लेकर लगातार बातचीत हो रही है. प्रशासनिक टीम ने शुरुआत से भरोसा दिलाया कि कोई परेशानी नहीं होगी. उन्होंने कहा: हम आपका हाथ पकड़कर आगे बढ़ाएंगे और मार्गदर्शन करेंगे.”
शाश्वत नारायण बिस्वास ने बताया कि सहकारिता मंत्रालय के समर्थन का असली असर क्या रहा है. उन्होंने कहा, “आज मंत्रालय के सचिव हर राज्य, हर सहकारी संस्था और हर मुख्य सचिव को लिख रहे हैं ताकि उन्हें टीएसयू के बारे में जानकारी दी जा सके और वे यूनिवर्सिटी के साथ जुड़ें व यहां से छात्रों की भर्ती करें. ऐसा समर्थन हमें पहले कभी मिलने की उम्मीद नहीं थी. एक नए तरह का माहौल तैयार हो रहा है.”
पुराने रिक्रूटर्स के साथ नए रिक्रूटर्स भी जुड़े हैं. नए प्रोग्राम के छात्रों ने राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम जैसी संस्थाओं का नाम लिया, जो पहले भर्ती के लिए नहीं आती थीं, लेकिन अब कैंपस में आ रही हैं.
आंकड़े क्या बताते हैं
मौजूदा बैच के लिए सबसे बड़ी बात 100 प्रतिशत प्लेसमेंट है. इस साल चारों प्रोग्राम के हर छात्र को समर इंटर्नशिप प्लेसमेंट मिला.
2023-25 बैच के लिए 113 रिक्रूटर्स ने समर इंटर्नशिप सेगमेंट (एसआईएस) में 563 ऑफर दिए. दो महीने की इंटर्नशिप के लिए सबसे बड़ा स्टाइपेंड 2.40 लाख रुपये रहा. 2025 के फाइनल प्लेसमेंट में सबसे बड़ा पैकेज 31.84 लाख रुपये सालाना रहा, जबकि औसत पैकेज 15.64 लाख रुपये रहा — जो पिछले साल से 10 प्रतिशत ज्यादा है.
एमबीए (रूरल मैनेजमेंट) की छात्रा वंशिता महाजन ने कहा, “हमारे एसआईएस प्लेसमेंट के बाद अभी हमारा पूरा बैच प्लेस हो चुका है. इसलिए मुझे पूरा भरोसा है कि हम सभी का अच्छे से ध्यान रखा जा रहा है.”
निहार, जिन्होंने भारतीय प्रबंधन संस्थान रायपुर का ऑफर छोड़कर IRMA में रहने का फैसला किया था, उनका सिलेक्शन Amul-GCMMF में हुआ. जब उनसे पूछा गया कि उनकी डिग्री पर IRMA की जगह टीएसयू का नाम होने को लेकर उन्हें कोई पछतावा है या नहीं, तो उनका जवाब सीधा था.
उन्होंने कहा, “बिल्कुल नहीं. मेरा मानना है कि IRMA खुद एक ब्रांड नाम है और टीएसयू उस पहचान में एक नया जोड़ है. दोनों एक-दूसरे को मजबूत कर रहे हैं, एक-दूसरे की जगह नहीं ले रहे.”
जब उनसे पूछा गया कि कोई अगर पूछे कि वह कहां पढ़ते हैं, तो वह क्या कहते हैं, तो जवाब तुरंत आया—“IRMA.”
बदलाव को अभी सिर्फ एक साल हुआ है, इसलिए टीएसयू नाम को आम पहचान मिलने में अभी समय लगेगा. आने वाले बैचों के साथ यह बदलेगा.
दिप्रिंट से बात करने वाले कुछ छात्रों ने आगे की चिंता भी जताई. अब तक रिक्रूटर्स का दायरा हर साल 60-90 छात्रों के हिसाब से था, लेकिन अब चार प्रोग्राम मिलाकर छात्रों की संख्या 360 हो गई है और उसी हिसाब से रिक्रूटर्स नहीं बढ़े हैं. एक छात्र ने कहा, “यह बहुत मुश्किल लगता है कि अगले बैच को भी इसी तरह 100 प्रतिशत प्लेसमेंट और इतने अच्छे पैकेज मिलेंगे.”
शाश्वत नारायण बिस्वास ने वादों को लेकर सावधानी बरती. उन्होंने कहा, “टीएसयू प्लेसमेंट की गारंटी नहीं देता. हम कोई गारंटी नहीं देते और यह बात साफ होनी चाहिए. लेकिन लंबे समय से मांग बनी हुई थी. कुछ साल पहले हमारे हर छात्र के लिए तीन से चार नौकरियां उपलब्ध होती थीं. अगर हम संख्या थोड़ी बढ़ाते हैं, तो हमें ज्यादा परेशानी नहीं होगी.”

तेज़ी से बढ़ता विस्तार
छात्रों की बातचीत से अलग, टीएसयू के पहले साल में उसका तेज़ी से विस्तार काफी अहम है. वैकुंठ मेहता राष्ट्रीय सहकारी प्रबंधन संस्थान (VAMNICOM), जो पुणे में स्थित भारत का सबसे पुराना सहकारी प्रबंधन संस्थान है, सबसे पहले इससे जुड़ा. इसके बाद उत्तर प्रदेश, पंजाब, दिल्ली, सिक्किम और दूसरे राज्यों के 14 और संस्थान इससे जुड़ चुके हैं. यह सब एक साल के अंदर हुआ.
सिर्फ संबद्धता ही नहीं, टीएसयू अपने नए कैंपस भी खोल रहा है. ओडिशा सरकार के निमंत्रण पर भुवनेश्वर में एक कैंपस की तैयारी चल रही है. कर्नाटक में भी एक कैंपस की संभावना देखी जा रही है. गुजरात के अंदर गांधीनगर में एक कैंपस तैयार किया जा रहा है, जहां अगले साल एमबीए इन डेवलपमेंट मैनेजमेंट और Cooperation नाम के दो नए प्रोग्राम शुरू होंगे.

फैकल्टी के मामले में भी संस्थान ने तेजी दिखाई है. शाश्वत नारायण बिस्वास ने अपने पूर्ववर्ती उमाकांक दास को इसका श्रेय दिया. उन्होंने कहा, “उन्होंने मुझसे कहा था कि हमें फैकल्टी बढ़ानी होगी. उस समय मुझे लगा था कि इससे आर्थिक दबाव बढ़ेगा, लेकिन उन्होंने कहा, नहीं, हम आगे बढ़ने वाले हैं. शायद उन्हें अंदाजा था कि हम यूनिवर्सिटी बनने वाले हैं. इसलिए 30 फैकल्टी से बढ़कर हम 42 तक पहुंचे.”
अब एग्जीक्यूटिव काउंसिल ने फैकल्टी में 50 प्रतिशत और बढ़ोतरी को मंजूरी दे दी है. यानी कुल संख्या 60 से ज्यादा होगी और अगले पांच से छह महीनों में भर्ती होने की उम्मीद है.
एमबीए इन रूरल मैनेजमेंट में अब 240 छात्र हैं, जबकि पहले यह संख्या करीब 90 थी. हर नए प्रोग्राम में 40-60 छात्र हैं.
नया कैंपस
दिप्रिंट को जानकारी मिली है कि टीएसयू का नया 125 एकड़ का कैंपस, जो मौजूदा 60 एकड़ कैंपस से दोगुना से भी ज्यादा है—उस जमीन पर बनेगा जो पहले अंतर्राष्ट्रीय जल प्रबंधन संस्थान से जुड़ी रही है. यह संस्था दो दशक से ज्यादा समय से आनंद में रिसर्च कर रही है. इस जमीन पर कृषि और पर्यावरण अनुसंधान के दौरान लगाए गए दुर्लभ पेड़ मौजूद हैं. निर्माण शुरू होने से पहले यूनिवर्सिटी केंद्रीय लोक निर्माण विभाग के साथ मिलकर ऐसी योजना बना रही है जिसमें मौजूदा हरियाली को सुरक्षित रखा जाए.
शाश्वत नारायण बिस्वास ने समयसीमा समझाते हुए कहा, “कैंपस डेवलपमेंट के दो चरण हैं. जमीन तैयार करने में करीब एक साल लगेगा—वहां बड़ी बिजली लाइनें और बिजली का ढांचा मौजूद है. कुछ बदलाव करने होंगे. जमीन तैयार होने के बाद पहले चरण का निर्माण करीब ढाई साल चलेगा. यानी हमें उम्मीद है कि साढ़े तीन साल में कैंपस तैयार हो जाएगा और हम वहां शिफ्ट हो सकेंगे.”
जब टीएसयू के बड़े लक्ष्य—8 लाख सहकारी समितियों वाले देश के लिए एक सहकारी यूनिवर्सिटी बनाने—की बात आई, तो शाश्वत नारायण बिस्वास ने एक तुलना दी.

उन्होंने कहा, “मुझे याद है कि आज एशिया के सबसे बेहतरीन मैनेजमेंट संस्थानों में गिने जाने वाले भारतीय प्रबंधन संस्थान अहमदाबाद के शुरुआती शिक्षक कंपनियों के पास जाकर कहते थे—कृपया हमारे छात्रों को नौकरी दीजिए. अगर वे अच्छे न लगें तो वापस भेज दीजिए, लेकिन मौका दीजिए. उस समय कोई उन्हें नौकरी नहीं देना चाहता था. फिर धीरे-धीरे चीजें बदलीं. और आज आप जानते हैं कि वह संस्थान कहां पहुंच चुका है.”
उन्होंने कहा, “यही यहां भी होगा. हमें संस्थाओं के पास जाकर उन्हें समझाना होगा. जाहिर है यह चुनौतीपूर्ण है और इसी वजह से इसमें मजा है—क्योंकि यह चुनौती है. अगर काम आसान हो, तो उसमें कोई मजा नहीं.”
बाहर छात्र IRMA के कपड़ों और सामान के साथ घूमते दिखते हैं. गेट पर लगे बोर्ड का नाम बदल गया है—अब उसके ऊपर एक बड़ा नया नाम है. लेकिन कैंपस में, गलियारों में और छात्रों के उस आसान जवाब में कि वे कहां पढ़ते हैं, अब भी पुराना नाम ही सबसे ज्यादा असर करता है.
क्या यह स्थिति आगे भी बनी रहेगी, जब टीएसयू और बड़ा होगा—15 संबद्ध संस्थान, भुवनेश्वर और गांधीनगर में नए कैंपस, और 360 छात्रों की संख्या और बढ़ेगी—यह सवाल 46वां बैच अपनी पहली नौकरी वाली जगहों से देखता रहेगा.
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