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Wednesday, 26 August, 2026
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खराब स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर और शिक्षकों की कमी से Gen Alpha परेशान, सरकारी डेटा ने बताई दिक्कत

छोटे छात्रों ने जो समस्याएं उठाई हैं, वे सिर्फ उनकी अपनी शिकायतें नहीं हैं. सरकारी आंकड़ों में भी इन कमियों का ज़िक्र है, जो ‘उनकी उम्मीदों और उन्हें मिल रही सुविधाओं के बीच अंतर’ को दिखाता है.

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नई दिल्ली: जेन एल्फा ने भी शायद जेन ज़ी से सीख ली है. अब वे अलग-अलग राज्यों के स्कूलों में खराब सुविधाओं और शिक्षकों की कमी के खिलाफ सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे हैं.

सरकारी आंकड़े इस समस्या की गंभीरता दिखाते हैं. सरकार की UDISE Plus रिपोर्ट और एक संसदीय समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, पूरे भारत की स्कूल शिक्षा व्यवस्था में करीब 10 लाख पद खाली हैं. करीब 95,000 स्कूलों में काम करने वाली बिजली की सुविधा नहीं है, जबकि 5.42 लाख स्कूलों में काम करने वाले कंप्यूटर नहीं हैं.

जुलाई में जारी UDISE Plus रिपोर्ट 2025-26 में यह भी बताया गया कि 4.77 लाख स्कूलों में इंटरनेट की सुविधा नहीं है, जबकि 10.67 लाख स्कूलों में पढ़ाई के लिए काम करने वाले मोबाइल फोन नहीं हैं.

स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बीच बड़ी हो रही इस पीढ़ी के लिए यह अंतर काफी साफ दिखाई देता है.

ये प्रदर्शन सिर्फ एक राज्य तक सीमित नहीं हैं.

उत्तर प्रदेश से बिहार और महाराष्ट्र से राजस्थान तक छात्र स्कूल व्यवस्था में मौजूद कमियों के खिलाफ अपनी आवाज़ उठा रहे हैं. इन प्रदर्शनों के बाद राज्य सरकारों ने भी कदम उठाए हैं. उदाहरण के लिए छात्रों के प्रदर्शन के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने करीब 40,000 सरकारी स्कूलों के लिए 14 बिंदुओं वाली एक चेकलिस्ट जारी की. इसमें पीने का पानी, शौचालय और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं शामिल हैं.

राजस्थान में सरकार ने सरकारी स्कूलों के इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने के लिए 12,500 करोड़ रुपये की तीन साल की योजना का ऐलान किया है.

इन छात्रों ने जो समस्याएं उठाई हैं, वे सिर्फ उनकी अपनी शिकायतें नहीं हैं. सरकारी आंकड़ों में भी इन कमियों का ज़िक्र है. ये आंकड़े उनकी उम्मीदों और उन्हें मिल रही सुविधाओं के बीच अंतर को दिखाते हैं.

केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की सालाना यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस यानी UDISE+ रिपोर्ट 2025-26, जो पिछले महीने जारी हुई, के मुताबिक देश में कुल 14.67 लाख सरकारी और निजी स्कूल हैं. इनमें 24.72 करोड़ छात्र पढ़ते हैं और 1.03 करोड़ शिक्षक हैं. यह दुनिया की सबसे बड़ी स्कूल शिक्षा व्यवस्थाओं में से एक है.

इनमें सरकारी स्कूलों की संख्या 10.05 लाख, यानी 69 प्रतिशत है. इन स्कूलों में 11.89 करोड़ छात्र पढ़ते हैं. यानी भारत के स्कूल नेटवर्क का एक बड़ा हिस्सा सरकारी स्कूलों का है.

UDISE+ के आंकड़ों के मुताबिक, 1.39 लाख स्कूलों में लाइब्रेरी नहीं है, 2.65 लाख स्कूलों में खेल का मैदान नहीं है, जबकि 13.62 लाख स्कूलों में डिजिटल लाइब्रेरी नहीं है. वहीं 71,959 स्कूलों में लड़कियों के लिए काम करने वाले शौचालय नहीं हैं और 1.12 लाख स्कूलों में लड़कों के लिए काम करने वाले शौचालय नहीं हैं.

उम्मीदों और हकीकत के बीच अंतर

शिक्षा विशेषज्ञ मीता सेनगुप्ता ने कहा कि ये प्रदर्शन जेन एल्फा की उम्मीदों और उन्हें जो हकीकत में मिल रहा है, उसके बीच बढ़ते अंतर को दिखाते हैं.

उन्होंने कहा, “जेन एल्फा साफ तौर पर अपनी उम्मीदों और अपनी हकीकत के बीच के अंतर को देख रही है. उनकी उम्मीदें उनके आसपास दिख रही तरक्की से बढ़ी हैं, लेकिन उनकी अपनी स्थिति उससे अलग है.”

उन्होंने कहा कि सुरक्षित और स्वस्थ बचपन के लिए स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं होना जरूरी है. उन्होंने “समुदाय की अगुवाई वाली स्कूल व्यवस्था को मजबूत करने” की जरूरत बताई, ताकि छात्रों को अपनी समस्याओं के लिए खुद आवाज उठाने के लिए मजबूर न होना पड़े.

पिछले महीने जारी नीति आयोग की एक रिपोर्ट ‘School Education System in India’ में भी कहा गया है कि करीब हर 15 स्कूलों में से एक में अब भी लड़कियों के लिए काम करने वाला शौचालय नहीं है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि सुरक्षित और काम करने वाले शौचालयों तक सभी की पहुंच सिर्फ स्वास्थ्य और सम्मान के लिए ही जरूरी नहीं है, “बल्कि खास तौर पर उच्च प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर छात्रों की उपस्थिति, पढ़ाई जारी रखने और अगली कक्षा में जाने की दर को बेहतर बनाने के लिए भी ज़रूरी है.”

UDISE+ के आंकड़ों के मुताबिक, करीब 95,000 स्कूलों में अब भी काम करने वाली बिजली नहीं है. वहीं नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, बिजली वाले स्कूलों का प्रतिशत 2014-15 में 55.96 प्रतिशत से बढ़कर 2024-25 में 91.9 प्रतिशत हो गया.

रिपोर्ट में इस लगातार सुधार का श्रेय सरकारी नीतियों और स्कूलों के इंफ्रास्ट्रक्चर में किए गए निवेश को दिया गया है. हालांकि, इसमें बताया गया है कि अब भी करीब 7 प्रतिशत स्कूलों में बिजली नहीं है. रिपोर्ट में सभी स्कूलों तक बिजली पहुंचाने और तकनीक की मदद से पढ़ाई को बढ़ावा देने के लिए “खासकर मुश्किल भौगोलिक क्षेत्रों में आखिरी स्तर की कमियों को दूर करने” की ज़रूरत बताई गई है.

नीति आयोग की रिपोर्ट में पानी और साफ-सफाई की सुविधाओं में भी कमियों का ज़िक्र किया गया है.

2014 में 96.5 प्रतिशत स्कूलों में पीने के पानी की सुविधा थी, जो 2025 में बढ़कर 99 प्रतिशत हो गई, लेकिन अब भी 14,505 स्कूलों में काम करने वाले पानी के स्रोत नहीं हैं और करीब 59,829 स्कूलों में हाथ धोने की सुविधा नहीं है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसी कमियों के कारण “स्कूल बच्चों के लिए पढ़ाई जारी रखने के लिए शारीरिक रूप से सही जगह नहीं रह जाते और शिक्षा और बुनियादी सार्वजनिक स्वास्थ्य पर असर पड़ता है.” खासकर कोविड-19 महामारी के बाद यह समस्या और महत्वपूर्ण हो गई है.

सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े मामलों पर काम कर रहे सुप्रीम कोर्ट के वकील अशोक अग्रवाल ने कहा कि जमीन पर स्थिति अक्सर सरकारी आंकड़ों में दिखाई देने वाली स्थिति से भी खराब होती है.

अग्रवाल ने दिप्रिंट से कहा, “हम स्कूलों में जाते रहते हैं और बुनियादी सुविधाओं को भूल जाते हैं. कई स्कूल अब भी टेंट में चल रहे हैं, जबकि छात्रों को जमीन या फर्श पर बैठना पड़ता है क्योंकि उनके पास ठीक कक्षाएं या फर्नीचर नहीं हैं.”

उन्होंने कहा, “सरकारी आंकड़े ज़मीन की इन हकीकतों को दर्ज नहीं करते. छात्रों में इतनी नाराज़गी क्यों है और उन्होंने प्रदर्शन क्यों शुरू कर दिए हैं, इसकी एक वजह है.”

शिक्षकों के पद बड़ी संख्या में खाली

पिछले अगस्त में जारी एक संसदीय समिति की रिपोर्ट में बताया गया था कि 2024-25 में देश की स्कूल शिक्षा व्यवस्था में करीब 10 लाख शिक्षकों के पद खाली थे. इसमें जवाहर नवोदय विद्यालय (जेएनवी) और केंद्रीय विद्यालय (केवी) जैसे केंद्रीय संस्थानों के साथ-साथ राज्य सरकारों के स्कूल भी शामिल हैं.

नीति आयोग की रिपोर्ट में भी इस चिंता का ज़िक्र किया गया है. इसमें कहा गया है कि “शिक्षकों के खाली पद कई भारतीय राज्यों में योग्य शिक्षकों की उपलब्धता में बड़ी कमी दिखाते हैं.” यह कमी खास तौर पर प्राथमिक, माध्यमिक और सीनियर सेकेंडरी स्तर पर है.

रिपोर्ट में बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश को ऐसे राज्यों के रूप में बताया गया है, जहां शिक्षकों के काफी ज्यादा पद खाली हैं.

अकेले बिहार में प्राथमिक स्तर पर 2.08 लाख, माध्यमिक स्तर पर 36,035 और सीनियर सेकेंडरी स्तर पर 33,035 पद खाली हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, कर्नाटक, हरियाणा और महाराष्ट्र समेत दूसरे राज्यों में भी शिक्षकों की बड़ी कमी है. यह “इस समस्या के पूरे सिस्टम में होने” को दिखाता है.

नीति आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, मध्य प्रदेश में प्राथमिक स्तर पर 47,122, माध्यमिक स्तर पर 2,877 और सीनियर सेकेंडरी स्तर पर 2,020 पद खाली हैं.

राजस्थान में प्राथमिक स्तर पर 3,856, माध्यमिक स्तर पर 1,365 और सीनियर सेकेंडरी स्तर पर 14,949 पद खाली हैं. झारखंड में प्राथमिक स्तर पर 80,341, माध्यमिक स्तर पर 18,343 और सीनियर सेकेंडरी स्तर पर 881 पद खाली हैं.

डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़ी कमी

भारत राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 लागू कर रहा है, जिसमें डिजिटल शिक्षा, AI के इस्तेमाल और ऑनलाइन पढ़ाई पर काफी जोर दिया गया है, लेकिन सरकारी आंकड़े बताते हैं कि करीब हर तीन में से एक स्कूल में कंप्यूटर की सुविधा नहीं है.

डिजिटल सुविधाओं की कमी सिर्फ सरकारी आंकड़ों में ही नहीं दिखती.

28 जुलाई को उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के एक सरकारी स्कूल में करीब 1,500 छात्रों ने खराब इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर प्रदर्शन किया. छात्रों ने दूसरी सुविधाओं के साथ कंप्यूटर लैब की भी मांग की. छात्रों ने कहा कि स्कूल में न तो कंप्यूटर लैब है और न ही लाइब्रेरी.

काम करने वाले कंप्यूटरों की बात करें तो यह कमी और भी बड़ी है. UDISE Plus के आंकड़ों के मुताबिक, देश के 14.67 लाख स्कूलों में से 5.42 लाख स्कूलों में काम करने वाले कंप्यूटर नहीं हैं, जबकि 4.77 लाख स्कूलों में इंटरनेट की सुविधा नहीं है.

आंकड़ों में पढ़ाई के लिए मोबाइल उपकरणों की उपलब्धता में भी बड़ी कमी दिखाई गई है. 10.66 लाख से ज्यादा स्कूलों में पढ़ाई के लिए इस्तेमाल होने वाले काम करने वाले मोबाइल फोन नहीं हैं. इसका मतलब है कि करीब तीन-चौथाई स्कूलों में यह सुविधा नहीं है.

नीति आयोग की रिपोर्ट में भी डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की कमियों का जिक्र किया गया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले 10 साल में ज्यादातर राज्यों में कंप्यूटर की सुविधाएं तेजी से बढ़ी हैं, लेकिन अब भी एक-तिहाई से ज्यादा स्कूलों में कंप्यूटर नहीं हैं. राज्यों के बीच भी इस सुविधा को लेकर काफी अंतर बना हुआ है.

रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि NEP 2020 के तहत कक्षा में डिजिटल तरीके से पढ़ाई तेजी से महत्वपूर्ण हो रही है. ऐसे में भरोसेमंद इंटरनेट कनेक्टिविटी और भी जरूरी हो गई है, लेकिन “एक-तिहाई से ज्यादा स्कूल अब भी कनेक्टिविटी के बिना हैं, जो इस समस्या के लगातार बने रहने को दिखाता है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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