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Monday, 28 September, 2026
होमडिफेंसC-130J-30 बनाम C-390: लॉकहीड ने भारत के मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट डील के लिए अपनी दलील रखी

C-130J-30 बनाम C-390: लॉकहीड ने भारत के मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट डील के लिए अपनी दलील रखी

अमेरिकी विमानन कंपनी Embraer के साथ सबसे बड़े सैन्य परिवहन विमान सौदे के लिए मुकाबले में है, जिसका मकसद वायुसेना के पुराने हो चुके AN-32 और IL-76 विमानों को बदलना है.

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नई दिल्ली: भारत के पास मौजूद C-130J-30 Super Hercules विमानों के इस्तेमाल के अनुभव को आधार बनाते हुए Lockheed Martin ने अपनी दावेदारी मजबूत की है. कंपनी का कहना है कि उसका विमान अपने सबसे करीबी प्रतिद्वंद्वी, ब्राजील की Embraer के C-390 Millennium की तुलना में कहीं ज्यादा इस्तेमाल करने लायक क्षमता और अभियानों में ज्यादा लचीलापन देता है. यह मुकाबला बड़े मध्यम परिवहन विमान (MTA) कार्यक्रम के लिए है.

अमेरिकी विमानन कंपनी Embraer के साथ उस सबसे बड़े सैन्य परिवहन विमान सौदे के लिए मुकाबले में है, जिसका मकसद वायुसेना के पुराने हो चुके AN-32 और IL-76 विमानों को बदलना है.

वायुसेना ने भारतीय कंपनियों को भेजे प्रस्ताव के अनुरोध (RFP) में औपचारिक तौर पर 60 विमानों की मांग की है, लेकिन बाद में यह संख्या बढ़ने की उम्मीद है.

यूरोप की बड़ी विमानन कंपनी एयरबस इस मुकाबले से बाहर हो गई है. अब C-130J-30 और C-390 मुख्य दावेदार हैं.

इस कार्यक्रम के लिए प्रस्ताव का अनुरोध (RFP) 12 अगस्त को जारी किया गया था और कंपनियों को 2 दिसंबर तक अपनी बोली जमा करनी है.

Lockheed वायुसेना को C-130J-30 का सबसे नया संस्करण दे रही है, जिसे C-130J-30 Block 8.1.2 के नाम से जाना जाता है. इनमें से 12 विमान अमेरिका के जॉर्जिया के Marietta में कंपनी की फैक्ट्री में बनाए जाएंगे, जबकि बाकी 48 विमान Tata Advanced Systems Limited (TASL) के साथ साझेदारी में भारत में बनाए जाएंगे. RFP में कम से कम 40 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री की शर्त है.

Lockheed Martin में हवाई परिवहन और समुद्री अभियानों के लिए रणनीति और कारोबार विकास के उपाध्यक्ष Robert Toth ने दिप्रिंट से कहा कि वायुसेना के पास जो विमान है और कंपनी जो विमान दे रही है, वह C-130J-30 है, सिर्फ C-130J नहीं, जैसा कि आम तौर पर माना जाता है.

उन्होंने कहा, “C-130J की कई ऐसी खूबियां बताई जाती हैं, जो असल में C-130H या C-130J के पुराने और छोटे संस्करण की हैं.”

उन्होंने कहा कि जब लोग कहते हैं कि C-130J की क्षमता 18-19 टन है, तो यह गलत है, क्योंकि वायुसेना के इस्तेमाल वाला C-130J-30 22 टन सामान ले जा सकता है.

C-130J-30 Hercules का लंबा किया गया संस्करण है. इसमें विमान के मुख्य हिस्से को करीब 14 फीट बढ़ाया गया है, जिससे अंदर ज्यादा सामान रखने की जगह मिलती है.

यह अंतर काफी महत्वपूर्ण है. वायुसेना के RFP में कहा गया है कि विमान की न्यूनतम क्षमता 18 टन और अधिकतम क्षमता 30 टन होनी चाहिए.

Embraer के विमान की क्षमता 26 टन है और यह इन दोनों के बीच आता है.

‘यह वजन की नहीं, जगह की बात है’

Toth की मुख्य दलीलों में से एक यह है कि सिर्फ अधिकतम वजन उठाने की क्षमता से किसी सामरिक परिवहन विमान की क्षमता तय नहीं होती.

उन्होंने कहा कि ज्यादातर सामान पहुंचाने वाले अभियानों में विमान अपनी अधिकतम वजन क्षमता तक पहुंचने से पहले ही सामान रखने की जगह के मामले में भर जाता है.

अमेरिकी वायुसेना के पूर्व C-130J पायलट Toth ने कहा, “जब आप सामान ले जाने के बारे में सोचते हैं, तो यह वास्तव में गणित का सवाल है. यानी एक निश्चित समय में आपको कितनी चीजें एक जगह से दूसरी जगह ले जानी हैं.”

उन्होंने दावा किया कि C-390 की तुलना में C-130J-30 60 प्रतिशत ज्यादा यात्रियों, 45 प्रतिशत ज्यादा पूरी तरह युद्ध के लिए तैयार पैराट्रूपर्स और घायल लोगों को निकालने के लिए 30 प्रतिशत ज्यादा स्ट्रेचर ले जा सकता है.

उन्होंने यह भी दावा किया कि C-130J-30 में C-390 के सात की तुलना में आठ सामान्य माल ढोने वाले पैलेट रखे जा सकते हैं. यानी 15 प्रतिशत का अंतर है.

ये आंकड़े Lockheed Martin के अपने तुलनात्मक दावे हैं और कंपनी ने इनके लिए खास संख्या नहीं दी.

हालांकि, कंपनी की वेबसाइट के मुताबिक, यह 128 युद्धक सैनिकों और 92 पैराट्रूपर्स को ले जा सकता है.

Lockheed का कहना है कि इसलिए C-130J-30 में सामान रखने के लिए उपलब्ध अतिरिक्त जगह, अधिकतम वजन उठाने की क्षमता की सीधी तुलना से ज्यादा महत्वपूर्ण है.

कंपनी ने यह भी बताया कि विमान छोटे और कम सुविधाओं वाले रनवे और ज्यादा ऊंचाई वाले हवाई अड्डों से भी उड़ान भर सकता है.

Lockheed का कहना है कि उसके विमान में छोटे रनवे से उड़ान भरने और उतरने की सबसे अच्छी क्षमता, सामान रखने वाले पैलेट/यात्रियों/स्ट्रेचर ले जाने की सबसे ज्यादा क्षमता, ईंधन की सबसे कम खपत, ज्यादा उड़ान दूरी, कम कार्बन उत्सर्जन, युद्ध में साबित हुई सुरक्षित रहने की क्षमता और बिना तैयार किए गए हवाई अड्डों पर काम करने की सबसे अच्छी क्षमता और मजबूती है.

Toth ने यह भी कहा कि C-130J-30 को युद्धक सैनिकों की तैनाती और मानवीय सहायता अभियानों को पूरा करने के लिए कम उड़ानों की जरूरत होती है.

उन्होंने कहा कि कम उड़ानों में ज्यादा लोगों और सामान को ले जाने की क्षमता से आपात स्थिति और मानवीय सहायता अभियानों में सैनिकों को तेजी से पहुंचाया जा सकता है और कुल अभियान खर्च भी कम किया जा सकता है.

Hercules के साथ भारत का अनुभव

वायुसेना ने अपना पहला C-130J-30 विमान 2010 में शामिल किया था और तब से इस विमान का कई तरह के अभियानों में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया है.

Toth ने कहा कि भारतीय बेड़े ने अब तक करीब 58,000 उड़ान घंटे पूरे किए हैं और इसकी उपलब्धता दर 85 प्रतिशत से ज्यादा रही है.

इन विमानों का इस्तेमाल आपदा राहत से लेकर संघर्ष वाले इलाकों से भारतीय नागरिकों को निकालने तक के अभियानों में किया गया है.

इन विमानों द्वारा किए गए सबसे मुश्किल कामों में से एक लद्दाख के Daulat Beg Oldi (DBO) में उतरना था. यह जगह करीब 16,600 फीट की ऊंचाई पर है.

इन विमानों का इस्तेमाल अफगानिस्तान और सूडान में अभियानों के साथ-साथ मानवीय सहायता अभियानों में भी किया गया है. इनमें नेपाल में चल रहे अभियान भी शामिल हैं.

MTA के लिए अपनी दावेदारी रखते हुए Lockheed इस अभियान के अनुभव पर काफी जोर दे रही है.

कंपनी का कहना है कि दुनिया भर में C-130J के बेड़े ने करीब 28 संचालकों के साथ 30 लाख से ज्यादा उड़ान घंटे पूरे किए हैं. कंपनी के मुताबिक, इससे विमान में लगातार सुधार करने के लिए बड़े स्तर पर अभियान का अनुभव और प्रतिक्रिया मिली है.

नए विमान वायुसेना के मौजूदा C-130J से ज्यादा आधुनिक

MTA कार्यक्रम के लिए प्रस्तावित विमान भारत के मौजूदा C-130J विमानों जैसे नहीं होंगे. भारत के मौजूदा विमान Block 6 विन्यास वाले हैं, जबकि Lockheed का कहना है कि MTA के लिए वह सबसे नया Block 8.1.2 विन्यास देने का इरादा रखती है.

उन्होंने कहा कि नए विन्यास में संचार, दिशा-निर्धारण, विमान की इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों और कंप्यूटर कार्यक्रमों में बदलाव समेत कई दूसरे सुधार किए गए हैं. हालांकि, उन्होंने इनके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं दी.

Lockheed का यह भी कहना है कि उसके पास भारत के मौजूदा 12 विमानों को भी इसी विन्यास में आधुनिक बनाने की क्षमता है.

हालांकि, उन्होंने कहा कि यह आधुनिकीकरण अलग समझौते के तहत होगा और मौजूदा MTA प्रस्ताव का हिस्सा नहीं है.

Toth ने कहा कि अगर यह आधुनिकीकरण किया जाता है, तो वायुसेना आखिरकार 72 C-130J-30 विमानों का एक समान बेड़ा चला सकेगी. इसमें मौजूदा 12 विमान और MTA कार्यक्रम के तहत मिलने वाले 60 विमान शामिल होंगे. इससे प्रशिक्षण, रखरखाव और सामान पहुंचाने की व्यवस्था के लिए एक जैसी सुविधाओं का फायदा मिलेगा.

चार इंजन बनाम दो

Lockheed की दावेदारी का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा C-130J का चार इंजन वाला टर्बोप्रॉप विन्यास है. कंपनी का कहना है कि मुश्किल परिस्थितियों में, खासकर ज्यादा ऊंचाई और ज्यादा तापमान वाले हवाई अड्डों पर यह विन्यास इंजन में खराबी आने की स्थिति में ज्यादा सुरक्षा देता है.

कंपनी के अधिकारियों ने इसकी तुलना C-390 से की, जिसमें दो टर्बोफैन जेट इंजन हैं.

Lockheed की दलील है कि अगर विमान का एक इंजन खराब हो जाए, तो वह फिर भी अपना अभियान जारी रख सकता है या ऐसी स्थिति में उड़ान भरना या उतरना पूरा कर सकता है, जहां दो इंजन वाले विमान में ऐसी अतिरिक्त क्षमता कम होगी.

उन्होंने कहा कि Lockheed इसे अभियान में फायदा बता रही है, खासकर भारत के भूगोल को देखते हुए. भारत में समुद्र तल वाले इलाकों से लेकर दुनिया के कुछ सबसे ऊंचे सैन्य हवाई अड्डे तक हैं.

Lockheed ने Tata के साथ साझेदारी को बताया अहम

कंपनी भारत में अपनी मौजूदा औद्योगिक मौजूदगी को भी अपनी दावेदारी का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने की कोशिश कर रही है. MTA प्रस्ताव के तहत 60 में से 48 विमान TASL के साथ साझेदारी में भारत में बनाए जाएंगे.

Lockheed का कहना है कि Tata के साथ उसका संबंध 10 साल से ज्यादा पुराना है और दोनों कंपनियों ने संयुक्त उपक्रमों के जरिए भारत में पहले ही विमान बनाने की क्षमता विकसित कर ली है.

Toth ने बताया कि हैदराबाद की इन फैक्ट्रियों में से एक ने 265 C-130J के पिछले हिस्से बनाए हैं.

उन्होंने S-92 हेलिकॉप्टर के केबिन और F-16 लड़ाकू विमानों के पंखों पर किए गए काम का भी उदाहरण दिया. उनका कहना था कि इससे पता चलता है कि बड़े विमान उत्पादन कार्यक्रम के लिए जरूरी औद्योगिक व्यवस्था भारत में पहले से मौजूद है.

Lockheed का कहना है कि उसकी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा 500 से ज्यादा भारतीय आपूर्तिकर्ता हैं, जिनमें करीब 140 छोटे और मध्यम उद्योग शामिल हैं.

कंपनी की दलील है कि यह मौजूदा नेटवर्क उसे MTA कार्यक्रम के लिए उत्पादन तेजी से बढ़ाने में मदद करेगा. इसके मुकाबले किसी ऐसे निर्माता को भारत में औद्योगिक नेटवर्क तैयार करने में समय लगेगा, जो समझौता मिलने के बाद यहां अपना नेटवर्क बनाना शुरू करेगा.

Lockheed बेंगलुरु में C-130J के रखरखाव, मरम्मत और बड़े स्तर पर सुधार की सुविधा भी बना रही है.

कंपनी का कहना है कि यह सुविधा 2026 के अंत तक तैयार हो जाएगी और पहला भारतीय विमान 2027 की पहली या दूसरी तिमाही के आसपास इस सुविधा में आने की उम्मीद है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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