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Monday, 22 July, 2024
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आर्टिलरी से रॉकेट लांचर तक- अजरबैजान के खिलाफ रक्षात्मक क्षमता के लिए आर्मेनिया ने किया भारत का रुख

अर्मेनियाई रक्षा मंत्री सुरेन पापिक्यान ने गांधीनगर में डेफएक्सपो के दौरान राजनाथ सिंह से अलग से मुलाकात की थी. आर्मेनिया सितंबर में भारत के साथ पिनाका रॉकेट लॉन्चर के लिए एक सौदा भी कर चुका है.

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नई दिल्ली: पाकिस्तान और तुर्की के करीबी सहयोगी अजरबैजान के साथ चल रहे तनाव के बीच आर्मेनिया ने एक आर्टिलरी सिस्टम खरीदने के साथ अपनी रक्षात्मक क्षमता बढ़ाने के लिए भारत की ओर रुख किया है. नागोर्नो-कराबाख क्षेत्र के कब्जे के लिए जारी लड़ाई में रूस की पहल पर संघर्ष विराम के बाद पिछले दो महीनों में आर्मेनिया ने भारत से अन्य युद्धक सामग्री के अलावा टैंक-रोधी मिसाइलें और मल्टी-बैरल रॉकेट लांचर आदि खरीदे हैं.

आर्मेनिया की खरीदारी सूची में नवीनतम उपकरण भारत फोर्ज निर्मित 155 मिमी 39-कैलिबर आर्टिलरी सिस्टम है, जो एक निजी रक्षा कंपनी है और पुणे स्थित कल्याणी समूह का हिस्सा है. कल्याणी समूह के लिए यह पहला आर्टिलरी ऑर्डर है. सेना भी इसी कंपनी द्वारा निर्मित कई स्वदेशी गन सिस्टम खरीदने वाली है.

कल्याणी समूह ने बताया था कि 155 मिलियन अमेरिकी डॉलर (करीब 1,200 करोड़ रुपये) का ऑर्डर ‘गैर-संघर्ष प्रभावित क्षेत्र’ के लिए है, लेकिन रक्षा प्रतिष्ठान के सूत्रों ने अब खुलासा किया है कि खरीदार आर्मेनिया है. गन सिस्टम का निर्माण कल्याणी समूह की पुणे में फैसिलिटी में किया जाएगा और इसे अगले तीन वर्षों में चरणबद्ध तरीके से खरीदार को मुहैया कराया जाएगा.


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लेकिन यह पहला मौका नहीं है जब आर्मेनिया ने भारतीय रक्षा प्रणाली खरीदी है. इस साल सितंबर में येरेवन ने स्वदेशी पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर, टैंक-रोधी मिसाइलों और गोला-बारूद के लिए नई दिल्ली के साथ गवर्नमेंट-टू-गवर्नमेंट डील पर हस्ताक्षर किए थे.

अर्मेनियाई रक्षा मंत्री सुरेन पापिक्यान ने पिछले महीने गांधीनगर में आयोजित डेफएक्सपो के मौके पर अपने भारतीय समकक्ष राजनाथ सिंह से अलग से भी मुलाकात की थी, जिसमें भारत के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाने पर चर्चा हुई. दिप्रिंट ने तब रिपोर्ट दी थी कि आर्मेनिया भारत के साथ और अधिक रक्षा सौदों पर नजरें टिकाए है, जिसमें रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) द्वारा विकसित आकाश जैसी सतह से हवा में मार करने वाली मध्यम दूरी की मिसाइल (एसएएम) प्रणाली के अलावा ड्रोन, काउंटर-ड्रोन सिस्टम और अन्य युद्धक सामग्री शामिल है.

पूर्व सोवियत गणराज्य ने 2020 में भारत से चार स्वदेशी ‘स्वाती’ वीपन-लोकेटिंग रडार खरीदे थे, जो अज़रबैजान के साथ उसके नए सिरे से छिड़े संघर्ष के बीच मुहैया कराए गए थे.

उधर, संघर्ष की स्थिति की समीक्षा करते हुए अर्मेनियाई प्रधानमंत्री निकोल पशिनियन ने सोमवार को अजरबैजान पर आरोप लगाया कि उसने नागोर्नो-कराबाख में कृषि कार्य में लगे ‘नागरिकों पर गोलियां चलाई हैं.’

अजरबैजान-तुर्की-पाकिस्तान की तिकड़ी

भारत सरकार आर्मेनिया के अजरबैजान के साथ तनावपूर्ण रिश्तों के कारण ही इस पूर्व सोवियत गणराज्य के साथ रक्षा सहयोग के बारे में कुछ बोलने को लेकर सावधान रही है. गौरतलब है कि अजरबैजान को लोग तुर्की और पाकिस्तान के साथ एक उभरती तिकड़ी के तौर पर देखते हैं. पर्यवेक्षकों भी इस और इशारा करते हैं कि भौतिक स्तर पर काफी दूरी के बावजूद हाल के वर्षों में आर्मेनिया-अजरबैजान और भारत-पाकिस्तान के बीच एक ‘परोक्षा संबंध’ उभरता दिख रहा है.

2017 में तुर्की, अजरबैजान और पाकिस्तान ने एक संयुक्त बयान जारी कर सुरक्षा सहयोग कायम किया था और पिछले द्विपक्षीय सैन्य सहयोग को आगे बढ़ाने का फैसला किया था. इसके बाद 2020 में अजरबैजान ने आर्मेनिया के खिलाफ 44 दिन जंग के दौरान तुर्की निर्मित ड्रोन तैनात किए थे, और माना जाता है कि वह जेएफ-17 लड़ाकू विमान खरीदने के लिए पाकिस्तान से बातचीत भी कर रहा है.

सितंबर 2021 में, तीनों देशों ने आठ दिवसीय संयुक्त सैन्य अभ्यास भी किया था जिसे ‘थ्री ब्रदर्स’ एक्सरसाइज कहा गया.

संयोग से, तुर्की के बाद पाकिस्तान ही वो दूसरा देश था जिसने 12 दिसंबर, 1991 को अजरबैजान को एक स्वतंत्र राष्ट्र के तौर पर मान्यता दी थी.

वाशिंगटन इंस्टीट्यूट में तुर्की प्रोग्राम के निदेशक सोनर कैगाप्टे को 2021 में अरब न्यूज ने यह कहते उद्धृत किया था कि ये क्षेत्रीय तिकड़ी इस मायने में महत्वपूर्ण है कि यह ‘राजनीतिक संबंधों में सैन्य रिश्तों भी जोड़ देगा.’

पिछले साल हस्ताक्षरित बाकू घोषणापत्र में तुर्की, अजरबैजानी और पाकिस्तानी संसदों के वक्ताओं ने अपनी-अपनी प्राथमिकताएं रेखांकित करने के साथ एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता का समर्थन करने पर भी सहमति जताई थी. घोषणा पत्र काराबाख में अजरबैजान के अभियान, जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तान के दावों और साइप्रस, ईजियन और पूर्वी भूमध्यसागरीय विवादों को लेकर तुर्की के दृष्टिकोण का खुला समर्थन करने वाला था.

(अनुवादः रावी द्विवेदी)

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़नें के लिए यहां क्लिक करें)


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