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Tuesday, 19 May, 2026
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इश्क, आज़ादी और संगम का किनारा—चार दिनों में कैसे जी ली गई पूरी मोहब्बत

“ना तो मैं अपना नाम बदलूंगी ना धर्म, मुझे तुम्हारे साथ वैसे ही रहना है जैसे जोधा अकबर के साथ रहती थी,तुम अल्लाह की इबादत करना,मैं अपने किशन कन्हैया की पूजा करूंगी."

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“तुम्हारी आंखों में बहुत गहराई है प्रिया” प्रिया की आंखों में देखते हुए शाहिद बोला.

“गहराई! कितनी गहराई? नदी जितनी या समंदर जितनी? गहरा तो कुआं भी होता है,गहरी तो खाई भी होती है और वहां जान जाने का खतरा भी होता है.”

“इनकी तो सीमा है, मैं तो अनंत गहराई की बात कर रहा हूं, जो बस तुम्हारी आंखों में है, जान जाने का तो पता नहीं, लेकिन मेरी सारी चेतना, सारी होशियारी, सारी समझदारी के उसमें समा जाने की असीम संभावना ज़रूर है.”

“तुम बहलाते अच्छा हो.”

“और तुम बहकाती अच्छा हो.”

“अब मेरी आंखों में आंखें डालकर, ऐसे देखना बंद करो,मुझे शर्म आ रही है.”

“अपनी शर्मो हया को तुम हवा के साथ बादलों के पार क्यों नहीं भेज देती, हिंद महासागर के अथाह जल में जाकर बहा दो इसे, या यहीं संगम पर कर दो इसका विसर्जन. कमबख़्त ये शर्म तुम्हें जीभर मुझसे नज़र भी नहीं मिलाने देती.”

“तुम्हारी सारी बातें समंदर,हवा और आसमान पर ही आकर क्यों रुकती है?

“क्योंकि तुम्हें देखकर मुझे यही सब याद आता है!”

“क्यों? मैं कोई मछली हूं,पंछी हूं या पतंग हूं क्या हूं मै?

“नहीं, तुम तो समंदर,हवा और आसमान ही हो. मछली और पंछी तो मैं हूं. जो तुम्हारी अथाह गहराई में डूब जाना चाहता है, बहती हवाओं के साथ आसमान की अनंत ऊंचाई में उड़ जाना चाहता है.”

“अच्छा! और पतंग का क्या? वो तुम नहीं हो? क्या मैं हूं पतंग?”

“नहीं,ना तुम पतंग हो और ना मैं,उसकी डोर तो कभी भी टूट सकती है,कट सकती है,जमीन पर पतंग लूटने वाले उसपर झपट्टा मारने के लिए टकटकी लगाए बैठे रहते हैं.”

शाहिद की बात सुन प्रिया ने उसे गले से लगे लिया. संगम किनारे सर्दी की दोपहरी चमकीली धूप निकली है. जहां प्रिया और शाहिद का मधुर मिलन हो रहा है.

डुग्गा किसी काम से 4 दिन के लिए कानपुर गया है. इस बीच प्रिया के कॉलेज में आंतरिक परीक्षायें शुरू हो गई. ये सत्र की निर्णायक परीक्षाएं नहीं हैं, लेकिन प्रिया अपने घर वालों को ये समझाने में सफल रही कि ये कितनी महत्वपूर्ण हैं. तमाम हिदायतों के बाद उसे 4 दिन खुद से कॉलेज जाने की छूट मिल गई.

पिंजरे से आजाद होकर पंछी इतनी तेज रफ्तार से उड़ान भरता है कि पल भर में आसमान छू लेना चाहता है. प्रिया चार दिन के लिए पिंजरे से आज़ाद हुए पंछी की तरह थी. वो शाहिद की गोद में अपना सिर रखना चाहती है. लेकिन शाहिद ने उसे रोक दिया. किसी ने देख लिया तो क्या होगा. प्रिया ने अपने चेहरे को दुपट्टे से ढंक लिया, ताकि कोई उसे पहचान न सके. अब वो निश्चिंत होकर शाहिद की गोद में अपना सिर रख सकती है. शाहिद उसकी पतली-पतली उंगलियों से खेलने लगा और प्रिया आसमान को निहारते हुए कुछ सोच रही है.

“एक बात बताओ,तुम मुझसे विवाह करोगे या निकाह?”

“ये कैसा सवाल पूछ रही हो तुम” (शाहिद को जोर की हंसी आ गई,लेकिन प्रिया की तनी हुई भौहें देख वो गंभीर हो जाता है )” ठीक है सुनो, पहली कोशिश तो ये रहेगी कि कोर्ट मैरिज हो जाए, फिर तुम कहोगी तो विवाह भी कर लेंगे और निकाह भी.”

“लेकिन मेरी एक शर्त है,पूरी करोगे”

“हां तुम बोलो तो सही”

“ना तो मैं अपना नाम बदलूंगी ना धर्म, मुझे तुम्हारे साथ वैसे ही रहना है जैसे जोधा अकबर के साथ रहती थी,तुम अल्लाह की इबादत करना,मैं अपने किशन कन्हैया की पूजा करूंगी.”

शाहिद ने मुस्कुराते हुए सहमति में सिर हिलाया और प्रिया की हथेली पर बड़े प्यार से चुंबन करने के बाद वो जेब से सिगरेट निकालकर जला लेता है. पहला कश खींचने के बाद जब धुआं छोड़ता है तो प्रिया चिढ़ जाती है.

“तुम सिगरेट को शान समझते हो क्या?” प्रिया उसकी सिगरेट छीनकर संगम के पानी में फेंक देती है.

“पहले समझता था,अब तो मजबूरी हो गई है,जब तक कश ना खींचू शरीर में झनझनाहट होती रहती है.”

“होती होगी तुम्हारे शरीर में झनझनाहट लेकिन जब तुम सिगरेट पीते हो तो मेरे दिमाग में झल्लाहट होती है.छोड़ दो ना,कितने लोग तो छोड़ते हैं.”

“ठीक है,ठीक है..छोड़ देता हूं,यहीं से,अभी से,छोड़ देता हूं.”

“हां, छोड़नी तो पड़ेगी, वरना मैं कभी नहीं मिलूंगी तुमसे बता देती हूं, मैं भी अकबर के जोधा जैसी ही ज़िद्दी हूं.”

“तुम क्या हमेशा जोधा-अकबर, जोधा-अकबर करती रहती हो, तुम्हें पता भी है कि असल में अकबर की जोधा नाम की कोई पत्नी थी ही नहीं.”

“और तुम भी क्या हर बात में अपना इतिहास वाला ज्ञान घुसा देते हो, मैं इमोशन की बात करती हूँ और तुम मुझे लॉजिक समझाने लगते हो.”

शाहिद इस बार ठहाका मारकर हंसा,प्रिया उसकी गोद से उठकर उसे निहारने लगी, शाहिद ने प्रिया के चेहरे से दुपट्टा हटा दिया और उसका माथा चूमकर अपनी बाहों में भर लिया.

संगम के पानी में पंख भिगोकर उड़ते पंछियों को दोनों एक साथ निहारने लगे, सूरज की रोशनी से चमकती बालू को अपने हाथों में भर प्रिया धीमे वेग से चलती हवा के साथ उड़ाने लगी, दोनों प्रेमी संगम किनारे प्रकृति के हर एक नज़ारे को अपनी आंखों में संजो रहे हैं. जो प्रेम में होता है उसके लिए सारे नज़ारे रूमानियत भरे हो जाते हैं. इश्कबाजों ने प्रेम और प्रकृति के मेल को रचा है.प्रकृति की समझ भला प्रेमियों से ज्यादा किसे होगी.

प्रेम में संवाद और कल्पना का स्तर भी ऊँचा उठ जाता है,भाषा परिष्कृत हो जाती है,गहरे अर्थ के शब्द जुबान पर खुद ब खुद आने लगते हैं,तब प्रेमी सिर्फ एक-दूसरे से ही नहीं आते बल्कि प्रकृति से भी प्रेम करने लगते हैं, प्रकृति के हर सौंदर्य में खुद को साथ पाते हैं. उनकी बातों और कल्पनाओं में दोनों प्रकृति के साथ होते हैं.

प्रिया ने दोबारा शाहिद की गोद में अपना सिर रख लिया. उसने शाहिद के हाथों में अपनी उंगलियां उलझा दीं और एक लंबी सांस छोड़ी.

आह! कितने दिनों के बाद मधुर मिलन की बेला आई है.

शाहिद ने दुपट्टे से प्रिया का चेहरा ढ़ंक दिया.सूरज की रोशनी से प्रिया की आंखें चौंधिया रही थीं या कि उस रोशनी में चमकता उसका चेहरा किसी की आंखों में खटक सकता था.

(चींटी की अर्थी किताब को पंक्ति प्रकाशन ने छापा है जिसका अंश प्रकाशन की अनुमति से छापा जा रहा है. किताब के लेखक कौशलेंद्र हैं.)

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