नई दिल्ली: कैप्टागन गोलियों से भरी एक कमर्शियल चपाती काटने वाली मशीन ने यह खुलासा किया है कि भारत अब सीरिया से सऊदी अरब तक फैले एक अंतरराष्ट्रीय ड्रग नेटवर्क का ट्रांजिट पॉइंट बनता जा रहा है.
पिछले हफ्ते नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) को अंतरराष्ट्रीय ड्रग कार्टेल्स द्वारा भारत को ट्रांजिट पॉइंट के तौर पर इस्तेमाल किए जाने की रिपोर्ट्स और खुफिया जानकारी मिल रही थी. इसी दौरान एक विदेशी एंटी-ड्रग एजेंसी से दिल्ली इलाके में मौजूद ड्रग खेप को लेकर सूचना मिली.
एनसीबी अधिकारियों के मुताबिक, सूचना में बताया गया था कि खेप के एक हिस्से में बेहद लत लगाने वाला नशीला पदार्थ है, जिसका शरीर पर भ्रम पैदा करने वाला असर होता है और जो पश्चिम एशियाई बाजार में बदनाम है.
इस सूचना के आधार पर एनसीबी ने 11 मई को दक्षिण दिल्ली के नेब सराय इलाके में एक किराए के घर पर छापा मारा. वहां से 31.5 किलो कैप्टागन टैबलेट बरामद की गईं. यह पहली बार है जब भारतीय एजेंसियों ने इस ड्रग को पकड़ा है.
दो आधे चांद के निशान वाली ये गोलियां एक कमर्शियल चपाती काटने वाली मशीन में छिपाई गई थीं और इन्हें सऊदी अरब के जेद्दा भेजा जाना था.

कैप्टागन में मुख्य रूप से फेनेथाइलीन और एम्फेटामाइन होते हैं, जिन्हें नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंसेज (NDPS) एक्ट, 1985 के तहत साइकोट्रॉपिक पदार्थ माना जाता है. यह गोली शरीर को उत्तेजित करने वाली दवा है और पिछले एक दशक से सऊदी अरब जैसे पश्चिम एशियाई देशों के युवाओं में नशे का बड़ा कारण बनी हुई है.
इस ड्रग की बड़े पैमाने पर मौजूदगी का संबंध पूर्व राष्ट्रपति बशर अल-असद के शासनकाल के दौरान युद्धग्रस्त सीरिया में चल रही अवैध फैक्ट्रियों और सुविधाओं से जोड़ा गया है. जॉर्डन सीमा से लगे रास्ते इसकी तस्करी के मुख्य मार्ग माने जाते हैं.
नेब सराय वाले घर से एनसीबी ने एक सीरियाई नागरिक अलाब्रास अहमद को भी गिरफ्तार किया, जो वीजा खत्म होने के बाद भी भारत में अवैध रूप से रह रहा था.
दिल्ली में पकड़ी गई ड्रग खेप तो सिर्फ शुरुआत निकली. आरोपियों से पूछताछ के बाद एनसीबी ने गुजरात के मुंद्रा पोर्ट पर एक कंटेनर से 196.2 किलो कैप्टागन पाउडर भी बरामद किया.
यह कंटेनर सीरिया से आया था और दस्तावेज़ में लिखा था कि इसमें भेड़ की ऊन है. अधिकारियों ने बताया कि देहरादून में किराए पर मैन्युफैक्चरिंग सुविधा दिलाने में मदद करने के आरोप में उत्तराखंड के एक व्यक्ति को भी गिरफ्तार किया गया है.

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शनिवार को एक्स पर ‘ऑपरेशन Ragepill’ नाम से चलाए गए इस अभियान के बारे में पोस्ट किया. उन्होंने कहा कि भारतीय एजेंसियां यह सुनिश्चित करेंगी कि देश को अंतरराष्ट्रीय ड्रग कार्टेल्स के ट्रांजिट रूट के तौर पर इस्तेमाल न होने दिया जाए.
उन्होंने लिखा, “खुशी है कि ‘ऑपरेशन RAGEPILL’ के जरिए हमारी एजेंसियों ने पहली बार 182 करोड़ रुपये की तथाकथित ‘जिहादी ड्रग’ कैप्टागन जब्त की है. मिडिल ईस्ट भेजी जा रही इस ड्रग खेप को पकड़ना और एक विदेशी नागरिक की गिरफ्तारी, ड्रग्स के खिलाफ हमारी जीरो टॉलरेंस नीति का मजबूत उदाहरण है.”
पश्चिम एशिया के संघर्ष वाले इलाकों में कट्टरपंथी समूहों द्वारा कथित इस्तेमाल और तस्करी की वजह से कैप्टागन को अक्सर “जिहादी ड्रग” कहा जाता है.
दिप्रिंट से बात करते हुए एनसीबी के एक अधिकारी ने कहा, “यह ड्रग मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) के कुछ हिस्सों में इसके उत्तेजक और खुशी देने वाले असर के लिए बड़े पैमाने पर इस्तेमाल की जाती है. कैप्टागन लेने से व्यक्ति में ज्यादा सतर्कता और ऊर्जा, भूख और थकान में कमी, थोड़े समय के लिए खुशी का एहसास, लंबे समय तक जागे रहने की क्षमता, आत्मविश्वास और आक्रामकता में बढ़ोतरी, गलत फैसले लेने और जल्दबाजी वाला व्यवहार, और बार-बार इस्तेमाल से मानसिक निर्भरता पैदा होने जैसे असर देखे जाते हैं.”
जर्मन लैब से सऊदी बाजार तक
कैप्टागन में 50 मिलीग्राम फेनेथाइलीन होता है. यह फेनेथाइलामाइन केमिकल फैमिली की एक सिंथेटिक ड्रग है, जिसमें एम्फेटामाइन भी शामिल है. कैप्टागन को 1960 के दशक में जर्मन फार्मास्युटिकल कंपनी Degussa ने एक ब्रांड नाम के तौर पर लॉन्च किया था. उस समय इसे गोल, हल्के सफेद रंग की टैबलेट के रूप में बाज़ार में उतारा गया था, जिस पर दो आधे चांद का लोगो बना होता था.
यूरोप में डॉक्टर इस दवा को सेंट्रल नर्वस सिस्टम को उत्तेजित करने वाली दवा के तौर पर लिखते थे. इसका इस्तेमाल अटेंशन डेफिसिट डिसऑर्डर और नार्कोलेप्सी जैसी बीमारियों के इलाज में होता था. लेकिन बाद में संयुक्त राष्ट्र ने 1971 के UN Convention on Psychotropic Substances के तहत फेनेथाइलीन को शामिल कर लिया. इसके बाद यूरोपीय बाजार में कैप्टागन अपने मूल रूप में खत्म हो गया.
अगले कुछ वर्षों में पश्चिम एशियाई देशों में इसकी मांग तेजी से बढ़ी और बाजार में मिलावटी कैप्टागन आने लगा. European Monitoring Centre for Drugs and Drug Addiction (EMCDDA) की रिपोर्ट के मुताबिक, 1990 के दशक से लेकर 2000 के दशक के बीच बुल्गारिया और तुर्की में इसका उत्पादन बड़े स्तर पर होने लगा.
रिपोर्ट के अनुसार, 2000 के दशक के मध्य तक इस ड्रग का निर्माण अवैध लैब्स में होने लगा, खासकर तुर्की, बुल्गारिया, स्लोवेनिया, सर्बिया और मोंटेनेग्रो में. वहां से इसे गैरकानूनी तरीके से मुख्य रूप से सऊदी अरब जैसे उपभोक्ता बाजारों में भेजा जाता था.
2015 तक सऊदी सरकार का अनुमान था कि 12 से 22 साल के करीब 40 प्रतिशत युवा कैप्टागन के आदी हो चुके थे. एनसीबी अधिकारियों के मुताबिक, यह चलन आज भी सऊदी अरब और पूरे क्षेत्र में जारी है.
संयुक्त राष्ट्र के Interregional Crime and Justice Research Institute की रिपोर्ट के अनुसार, इस अवैध कारोबार को बढ़ावा देने की एक बड़ी वजह इसमें होने वाला भारी मुनाफा भी है. एक टैबलेट को बनाने और पैक करने में सिर्फ कुछ रुपये खर्च होते हैं, लेकिन इसकी बिक्री कीमत 10 से 25 डॉलर तक होती है.
क्यों कहा जाता है ‘जिहादी ड्रग’
दिल्ली में एनसीबी की कार्रवाई और देहरादून की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट पर छापे से पहले कैप्टागन करीब एक दशक पहले अक्टूबर 2015 में सुर्खियों में आया था. उस समय लेबनान अधिकारियों ने एक सऊदी प्रिंस और उसके चार साथियों को बेरूत अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट से दो टन कैप्टागन की तस्करी करने से पहले गिरफ्तार किया था. इस बड़ी कार्रवाई के बाद लेबनान और सऊदी अरब के बीच कूटनीतिक विवाद भी शुरू हो गया था.
2011 में अरब स्प्रिंग शुरू होने के बाद पश्चिम एशिया में कैप्टागन का कारोबार बहुत तेजी से बढ़ा. सीरिया को इसका बड़ा केंद्र माना जाता है. गृह युद्ध के दौरान वहां असद शासन, विद्रोही गुटों और इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड द लेवांत (ISIL) जैसे कट्टरपंथी संगठनों के बीच देश बंटा हुआ था.
रिपोर्ट्स में सामने आया था कि ISIL के लड़ाके और दूसरे हथियारबंद समूह कैप्टागन का इस्तेमाल करते थे और कई-कई दिनों तक बिना थके जागते रहते थे. सीरिया के लड़ाकों से जुड़े कई विवरणों में इस ड्रग से मिलने वाली “सुपरह्यूमन एनर्जी” का ज़िक्र किया गया, जिसकी वजह से इसका इस्तेमाल तेज़ी से बढ़ा.
सीरिया में लड़ाकों के बीच इसके कथित बड़े पैमाने पर इस्तेमाल और स्वीकार्यता के कारण कानून लागू करने वाली एजेंसियों के बीच कैप्टागन को “जिहादी ड्रग” कहा जाने लगा.
पिछले एक दशक में हुई कई अंतरराष्ट्रीय जांचों और संघर्ष वाले इलाकों में बरामदगी से भी यह संकेत मिला कि युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में सक्रिय हथियारबंद समूहों और तस्करी सिंडिकेट्स के पास कैप्टागन गोलियां पाई गई थीं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, कैप्टागन की तस्करी से होने वाला भारी मुनाफा कई संगठित अपराध और कट्टरपंथ से जुड़े नेटवर्क्स के लिए गैरकानूनी फंडिंग का बड़ा स्रोत बन गया है.
एनसीबी अधिकारी ने कहा, “इस शब्द का इस्तेमाल इसलिए शुरू हुआ क्योंकि इस ड्रग का असर लेने वाले व्यक्ति को लंबे समय तक जागे रहने, डर और थकान को दबाने, आक्रामकता और जोखिम उठाने वाले व्यवहार को बढ़ाने, और तनावपूर्ण हालात में लंबे समय तक लड़ाई जैसी गतिविधियां जारी रखने में मदद करता था.”
असद शासन पर भी बड़े कैप्टागन कार्टेल चलाने के आरोप लगे थे. कई बार जॉर्डन सीमा के रास्ते बड़ी खेप भेजी जाती थी. असद शासन के पतन के बाद अहमद अल-शरा की नई सरकार और जॉर्डन सरकार ने कैप्टागन कार्टेल पर नजर रखने और कार्रवाई के लिए सहयोग समझौते किए हैं.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)