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Monday, 2 March, 2026
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मुसलमानों को मुख्तार अंसारी जैसे नेताओं से मुंह मोड़ लेना चाहिए. वे कभी भी वास्तविक सुधार नहीं लाएंगे

मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद, मोहम्मद शहाबुद्दीन अपने दम पर सत्ता में नहीं आये; बल्कि, अपने हितों की पूर्ति करने वाले राजनीतिक दलों द्वारा उनका समर्थन किया गया.

विपक्ष भी नहीं सोचता कि वह BJP को हरा पाएगा, सिर्फ सीटें कम करने और अस्तित्व बचाए रखने की जद्दोजहद है

विपक्षी दलों को कड़ी चुनौती का एहसास तो है मगर उनके अंदर बातें यही होती हैं कि नरेंद्र मोदी की सीटें कहां-कहां से कम की जा सकती हैं, यह नहीं कि उन्हें सत्ता से कैसे बेदखल किया जा सकता है

चुनावी बॉण्ड कई सवाल उठाते हैं जिनका बीजेपी के पास कोई उत्तर नहीं है

मोदी को उस हमाम को बंद करने का श्रेय दिया जाता है जहां हर राजनेता और पार्टी नंगी थी. अब उन्हें चुनावी बॉन्ड पर बात दबाने की राजनीतिक आम सहमति को तोड़ना होगा.

ममता और मोदी ने उत्तर बंगाल में शुरू किया कैंपेन, पर जो महत्वपूर्ण उसका ज़िक्र तक नहीं

जलपाईगुड़ी बवंडर मुद्दे पर मोदी को भारी नुकसान हुआ. अपने रैली स्थल से बमुश्किल 125 किलोमीटर दूर बवंडर आने के बावजूद उन्होंने इसके बारे में एक शब्द भी नहीं कहा.

अरविंद केजरीवाल जिस दौर से गुजर रहे हैं उसमें हर पार्टी दोषी है, इसे अलग करके न देखें

अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी का समय आप के इस आरोप को बल देता है कि भाजपा अपने चुनावी विरोधियों के खिलाफ केंद्र सरकार की एजेंसियों का इस्तेमाल कर रही है.

राजनीतिक स्टार्ट-अप के लिए ममता जैसा साहस, NTR जैसी करिश्माई शख्सियत और केजरीवाल जैसी स्मार्ट सोच चाहिए

आप और टीएमसी जैसे स्टार्ट-अप लोकतांत्रिक मुकाबले को और धारदार बनाते हैं. उनमें लड़ने की भावना और विरोध करने ऊर्जा बहुतायत में है.

सेना से रिटायर होने के बाद किसी सियासी दल में शामिल होना सेना का राजनीतिकरण नहीं बल्कि गर्व की बात

सेना के कई सेवानिवृत्त अधिकारी अपनी नेतृत्व क्षमता और अपने अनुभवों के बूते राजनीति के क्षेत्र में सफल हुए हैं. यह समाज और फौजी बिरादरी के लिए भी गर्व का विषय होना चाहिए

मैं 36 सालों तक IAS अधिकारी रहा, यह कभी निराशाजनक नहीं था; संजीव सान्याल ने सिविल सेवा को गलत तरीके से समझा

मैं ऐसे किसी भी व्यक्ति को चुनौती दूंगा जो दावा करता है कि सिविल सेवाएं विकास और इनोवेशन के लिए अवसर प्रदान नहीं करती हैं.

क्यों ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष’ चुनाव के न्यूनतम पैमाने पर भी खरा उतरता नहीं दिख रहा 2024 का आम चुनाव

हम एक ऐसी विकट स्थिति की तरफ बढ़ रहे हैं जब चुनाव तो नियमित अंतराल पर होंगे, लेकिन उसमें वोटिंग मशीन का बटन दबाने को छोड़ कर और कुछ भी मुक्त नहीं होगा और वोटों की गिनती को छोड़कर और कुछ भी निष्पक्ष नहीं होगा.

भक्ति काल से बाबू मंगूराम तक, कहां गया जाति-विरोधी इतिहास? यह केवल जुमलों तक ही सीमित रह गया है

राजनीतिक हेरफेर जाति-विरोधी आंदोलनों के समृद्ध इतिहास और सांस्कृतिक जटिलताओं के साथ इस तरह से छेड़छाड़ की जो कि उन्हें राजनीतिक लाभ दे सके.

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जयपुर, दो मार्च (भाषा) रजस्थान के सवाई माधोपुर जिले के वजीरपुर उपखंड के मीना बड़ौदा गांव में सोमवार को एक घर में बने...

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