आप यह तर्क दे सकते हैं कि नरेंद्र मोदी जो कुछ करते हैं या जिसके बारे में बात करते हैं उसका उद्देश्य आरएसएस के वरिष्ठों की स्वीकृति हासिल करना नहीं है. वे ऐसा अपने निर्वाचन क्षेत्र को ध्यान में रखकर कर रहे हैं.
पहले हमला झेलना और तब जवाब देना ताकत के इस्तेमाल के बारे में फौजी सोच के संस्कार के विपरीत है. अगर यह ‘फौजी सोच’ भारत के राजनीतिक आकाओं के दिमाग पर हावी हुई, तो भारत एक भ्रम के पीछे ही चल पड़ेगा और यह कोई लाभ नहीं दिलाएगा.
लगभग सभी न्यूज़ चैनलों ने अरविंद केजरीवाल को दोषी ठहराने और दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से उनके इस्तीफे की मांग की. वहीं अखबारों ने केवल न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा की टिप्पणियों पर खबरें छापी थीं.
अगर हिंदू धर्म का एक हिस्सा यानी ओबीसी जाति जनगणना की मांग करेगा तो विराट हिंदू एकता के हित में बीजेपी ये ज़हर पी जाएगी. जहर इसलिए क्योंकि उसे मालूम है कि इससे हिंदुओं में जाति की दीवारें और मजबूत हो जा सकती हैं.
मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद, मोहम्मद शहाबुद्दीन अपने दम पर सत्ता में नहीं आये; बल्कि, अपने हितों की पूर्ति करने वाले राजनीतिक दलों द्वारा उनका समर्थन किया गया.
विपक्षी दलों को कड़ी चुनौती का एहसास तो है मगर उनके अंदर बातें यही होती हैं कि नरेंद्र मोदी की सीटें कहां-कहां से कम की जा सकती हैं, यह नहीं कि उन्हें सत्ता से कैसे बेदखल किया जा सकता है
मोदी को उस हमाम को बंद करने का श्रेय दिया जाता है जहां हर राजनेता और पार्टी नंगी थी. अब उन्हें चुनावी बॉन्ड पर बात दबाने की राजनीतिक आम सहमति को तोड़ना होगा.
औपनिवेशिक खुफिया तंत्र क्रांतिकारियों को व्यक्ति के रूप में नहीं बल्कि खतरे के रूप में दर्ज करता था. ऐसा करके उसने कई ज़िंदगियों को इतिहास से निष्कासित कर दिया.