दीपक और अम्मा के काम मायने रखते हैं. एक ऐसे देश में जहां सामूहिक लापरवाही जीने की रणनीति बन गई है, वहां किसी को ‘ना’ कहते देखना एक बड़ा बदलाव जैसा लगता है.
एक पक्ष सोचता है कि आज भारत अपनी हैसियत से ज्यादा आगे बढ़कर कदम उठा रहा है, जबकि दूसरा पक्ष सोचता है कि मोदी ने भारत की हैसियत कमजोर कर दी है और भारत अपनी हैसियत से कम कदम उठा रहा है. सच यह है कि दोनों ही गलत हैं.