हयात तहरीर अल-शाम के सदस्य, जो लेवांट मुक्ति आयोग के नाम से भी जाने जाते हैं, ने सेना की 46वीं रेजिमेंट को किनारे करते हुए पिछले सप्ताह दूसरी बार अलेप्पो पर कब्जा कर लिया.
ईवीएम से छेड़छाड़ की घिसे-पिटे नैरेटिव पर जोर देने के बजाय, कांग्रेस को लोगों के दिमाग को हैक करने का तरीका खोजने पर फोकस करना चाहिए — जो भाजपा ने किया है.
ऐसा लगता है कि सरकार के राजनीतिक गणित में समृद्ध और वंचित तबकों के हित ही शामिल हैं, मिडिल-क्लास को लगभग दरकिनार किया गया है. बढ़ती राजनीतिक उपेक्षा ने इस तबके में मोहभंग की भावना भर दी है.
मोदी सरकार की प्राथमिकताएं बेहद अव्यवस्थित हैं. अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के बजाय, मोदी और उनके साथी चुनाव जीतने के लिए धार्मिक संघर्षों को बढ़ावा देने में व्यस्त हैं.
इस उपमहादेश में क्रिकेट वाले रिश्ते खेल से जुड़े विवाद की वजह से नहीं, न ही हिंदू-मुस्लिम मसले के कारण बल्कि इन मुल्कों के हालात और उनके आपसी मनमुटाव की वजह से बिखरे हैं.
अगर कोई सरकार जानती है कि अमीरों को कैसे एकजुट किया जाए और उसने यह पता लगा लिया है कि सीधे पैसे भेजने से गरीबों के वोट कैसे जीते जाएं, तो उसे मध्यम वर्ग की कोई ज़रूरत नहीं है.
शिंदे ने जनता की अदालत में असली शिवसेना के लिए लड़ाई जीत ली है और अविभाजित शिवसेना के 2019 के प्रदर्शन को बेहतर बनाया है, लेकिन ऐसा लगता है कि वे सीएम पद की दौड़ हार गए हैं.
अब समझदार, उदारवादी आवाज़ों पर निर्भर है कि वह इस विभाजनकारी बयानबाजी से ऊपर उठें और सच्चाई और सुलह के रास्ते पर चलें, जो पुराने जख़्मों को कुरेदने के बगैर मरहम तक जाता हो.