आरटीआई से मिले आंकड़ें और सरकार द्वारा संसद में दी गई जानकारी से पता चलता है कि कई जगहों पर जनरल कटेगरी के लोग 90 फीसदी या उससे भी ज्यादा हैं. ऐसे में सवर्ण आरक्षण की क्या जरूरत पड़ गई?
घुमंतू समाज अपनी रंग बिरंगी जीवनशैली से हमेशा से देश दुनिया के लोगों को आकर्षित करता रहा है, लेकिन हम आपको बता रहे हैं कि इस रंगीन दुनिया के पीछे कैसी है बदरंग दुनिया.
लोहिया और आंबेडकर 1956 में साथ मिलकर चलने की संभावना तलाश रहे थे, जो संभव नहीं हो पाया. उसके 37 साल बाद जाकर सपा और बसपा दो साल के लिए साथ आए और फिर आया 25 साल का अंतराल. अब वे फिर साथ आए हैं.
भारत में अब तक कोई दलित-आदिवासी पीएम नहीं बना. जगजीवन राम इस कुर्सी के बेहद करीब पहुंच कर रह गए. अमेरिका के श्वेतों ने ओबामा को राष्ट्रपति बनाया, क्या भारत के सवर्ण ऐसा कर पाएंगे?
उत्तर प्रदेश और बिहार में लोकसभा की 120 सीटें हैं. नरेंद्र मोदी की सरकार मुख्य रूप से इसी गंगा-यमुना के मैदान में बनी थी. अब यहां का राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल चुका है.