mamata vs modi
ममता बनाम पीएम मोदी/ दिप्रिंट
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इस साल के लोकसभा चुनाव का घमासान पश्चिम बंगाल में होगा. दीदी का बंगाल इस बार यूपी से भी बड़ा चुनावी रणक्षेत्र हो सकता है, इसके साफ संकेत मिलने लगे हैं. कोलकाता के पुलिस कमिश्नर के खिलाफ सीबीआई की कार्रवाई पर ममता के गुस्सैल धरने से इस लोकसभा चुनाव की सबसे बड़ी जंग का ऐलान हुआ तो अब तृणमूल कांग्रेस के विधायक सत्यजित बिस्वास की हत्या और फिर बीजेपी पर आरोपों ने इस घमासान को और पुख्ता कर दिया है. दिलचस्प ये है कि इस जंग को लड़ रही दोनों फौजें ख़ौफज़दा हैं और इस लड़ाई का कारण भी डर ही है.

भाजपा के लिए खौफ है हिंदी पट्टी

भाजपा के लिए खौफ की वजह है, हिंदी पट्टी और उसमें भी खास तौर पर यूपी. हाल में ही राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से मात खाने और तीनों राज्यों में सत्ता गंवा चुकी भाजपा के सामने यूपी में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने हाथ मिलाकर नयी और बड़ी चुनौती खड़ी कर दी. मोदीजी पर लगातार आक्रामक बनी हुई राहुल गांधी की कांग्रेस ने इसके फौरन बाद प्रियंका गांधी वाड्रा को पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान सौंप कर मोदी, शाह और योगी की भाजपा के लिए और बड़ा संकट खड़ा कर दिया है.


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ऐसे में राजनीतिक विश्लेषक ही नहीं पार्टी के कुछ बड़े नेता तक मान रहे हैं कि 2014 में यूपी में 80 में से 71 लोकसभा सीटें बटोरने वाली भाजपा के लिए इस बार पिछली सफलता दोहराना तो दूर उसके आधे तक पहुंचना भी बड़ा मुश्किल हो सकता है. इसके अलावा जिन तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों में हाल में ही भाजपा ने मुंह की खायी है वहां भी 2014 के मुकाबले उसे कुछ नुकसान होने का पूरा खतरा है.

बंगाल पर भाजपा की क्यों है नजर

भाजपा के लिए अगला सिरदर्द महाराष्ट्र है. देश में यूपी के बाद सबसे ज़्यादा सांसद महाराष्ट्र से आते हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में वहां शिवसेना और भाजपा साथ थे. तब वहां की 48 में से भाजपा को 23 सीटें और शिवसेना को 18 सीटें मिल गयी थीं. लेकिन विधानसभा चुनाव में दोनों अलग हो गये. तब से शिवसेना और भाजपा के बीच लगातार नरम गरम का खेल चल रहा है.

इस लोकसभा चुनाव में दोनों साथ रहेंगे, इसका अब तक कोई पुख्ता फैसला नहीं हो पाया है. ऊपर से कांग्रेस का नया आत्मविश्वास भी भाजपा को परेशान किए है. हालांकि भाजपा ने उत्तरपूर्वी राज्यों में नयी ज़मीन तैयार की है पर एक तो वहीं सीटे कम हैं, दूसरे नागरिकता के मसले पर वहां भाजपा को बड़ा विरोध झेलना पड़ रहा है.

किसी बड़े नुकसान की आशंका से डरी भाजपा को इसीलिए बंगाल सबसे उपयुक्त सूबा दिख रहा है. खासतौर पर तब, जब ममता बनर्जी की सरकार वहां करीब 9 साल से बैठी है और एंटी इंकम्बैंसी फैक्टर का कुछ असर लोकसभा चुनाव पर पड़ने के आसार दिख रहे हैं.

इसीलिए बंगाल को देखकर भाजपा का बाकी देश में हार का डर, थोड़ा कम हो जाता है. बंगाल से लोकसभा में 42 सांसद आते हैं जो देश में तीसरे सबसे ज़्यादा हैं. भाजपा वहां लगातार काम कर रही है क्योंकि पिछले चुनाव में उसे सीटें चाहे कम मिली हो पर पार्टी ने वोटर खूब कमाये हैं. तृणमूल कांग्रेस का अल्पसंख्यकों के प्रति अगाध प्रेम भाजपा को लगातार ताकत दे रहे हैं और बंगाल के शहरी मध्यवर्ग के साथ बड़ी तादाद में हिंदीभाषी कारोबारी, भाजपा को भारी संभावना दिख रहे हैं.

भाजपा का राज्य में 17 फीसदी तक वोट पकड़ना

ममता दीदी की तृणमूल कांग्रेस के डर की वजहें दूसरी हैं. करीब 9 साल हो रहे हैं ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल संभाले हुए. पहले पांच साल तो उन्हें कोई बड़ा खतरा नहीं रहा, क्योंकि बंगाल के परंपरागत राजनीतिक तौर तरीकों को अंजाम देते हुए दीदी ने मुख्य विपक्षी यानी वामपंथियों को तो पूरी तरह सुला ही दिया, कांग्रेस ने भी अपनी बची खुची ज़मीन खो दी. पर 2014 की मोदी लहर और फिर भाजपा का राज्य में 17 फीसदी तक वोट पकड़ना और फिर लोकसभा से लेकर स्थानीय निकाय और पंचायतों तक के चुनावों में लगातार भाजपा की संख्या बढ़ते जाना, ममता को खौफज़दा करने को काफी था.

रोज़वैली और शारदा जैसे घोटालों ने आग में घी का काम किया. इन मामलों में पश्चिम बंगाल की आम जनता नें पैसा गंवाया और इनमें तृणमूल कांग्रेस के कई बड़े छोटे नेताओं का हाथ और साथ होने का आरोप है. दीदी ने डैमेज कंट्रोल की कोशिश तो की पर सीबीआई की जांच जिस तरह आगे बढ़ रही है उससे साफ दिख रहा है कि ममता तक जांच की आंच कभी भी पहुंच सकती है.

ऐसे में ममता का खौफज़दा होना लाजिमी है. उनके 8 साल से अभेद्य किले में धीरे धीरे सेंध लगाते हुए बीजेपी इस बार पूरी ताकत से टूट पड़ी है. प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के साथ यूपी के मुख्यमंत्री योगी भी मैदान में कूद पड़े हैं. भाजपा की कोशिश 17 फीसदी वोटशेयर को तीस के आसपास ले जाना है. ऐसे में भाजपा अगर थोड़ा भी कामयाब हुई तो दीदी को सिर्फ सीटों का ही नहीं बल्कि प्रतिष्ठा के भी बड़े नुकसान का डर है क्योंकि वे इस वक्त विपक्षी एकता के सूत्रधारों में शामिल हैं.

बंगाल की 42 सीटों में से 22 पर जीत का लक्ष्य

भाजपा ने इस बीच वे मुद्दे उठाये हैं जिनसे बंगाल जूझ तो अरसे से रहा है पर वोटबैंक की राजनीति की वजहों से न कभी कांग्रेस ने इसे हवा दी न वामपंथियों ने कभी इन मुद्दों पर ध्यान देने की ज़रूरत समझी. वामपंथियों के लिए वे दूसरे मुद्दे ज़्यादा महत्वपूर्ण थे जो उनको 34 साल से लगातार सत्ता में बनाए रखे थे. इनमें 70 के दशक में शुरू हुए किसानों पर केंद्रित मसले सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण रहे हैं. बंगाल का शहरी इसे किसी तरह बस बर्दाश्त कर रहा था. भाजपा ने ये भांप लिया था और इसीलिए इस बार उसने बंगाल की 42 सीटों में से 22 पर जीत हासिल करने का लक्ष्य रखा है.

भाजपा ने इस पर काम 2014 से ही शुरू कर दिया था दीदी के अल्पसंख्यक प्रेम को देखते हुए उसके लिए ये काम आसान भी हो गया. बंगाल में भाजपा ध्रुवीकरण की राजनीति चल निकली. पिछले तीन चार महीनों में अमित शाह सहित तमाम भाजपा के नेता ममता के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर बनाने की कोशिश पूरी ताकत से जुट गये. उसे देखते हुए बंगाल की सीएम को साफ लग गया था कि बीजेपी को पीछे धकेलने के लिए उन्हें मैदान में उतरना होगा और यह मौका उन्हें सीबीआई के जरिए मिल गया.

ममता बनर्जी ने सीबीआई की कार्रवाई को एक राजनीतिक मुददा बना दिया. और यह संदेश भी दे दिया कि ममता भाजपा से मोर्चा लेने में डरती नहीं है. अब बंगाल में ममता बनर्जी की मोदी-शाह से सीधी लड़ाई है. ये लड़ाई ज़बरदस्त ही नहीं, 2019 के लोकसभा चुनाव का खेल बदलने वाली भी साबित होगी, ये साफ दिख रहा है.

(अरुण अस्थाना वरिष्ठ पत्रकार है.)


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