नई दिल्ली: जेडीयू प्रमुख नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार के बिहार के उपमुख्यमंत्री बनने की अटकलों पर अब विराम लग गया है. बुधवार को जेडीयू के वरिष्ठ नेता विजय कुमार चौधरी और बिजेंद्र यादव ने बीजेपी के सम्राट चौधरी के साथ शपथ ली.
जेडीयू सूत्रों के अनुसार, पार्टी ने निशांत कुमार को उपमुख्यमंत्री बनने के लिए मनाने की कोशिश की थी, लेकिन उन्होंने मना कर दिया. इसके बजाय बिजेंद्र प्रसाद यादव और विजय कुमार चौधरी को नई बिहार सरकार में उपमुख्यमंत्री बनाया गया है.
एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “पार्टी नेताओं ने देर रात तक उन्हें मनाने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने मना कर दिया. उनका कहना है कि उनके पास अभी इस जिम्मेदारी के लिए जरूरी अनुभव नहीं है. इसलिए वह पार्टी कार्यकर्ताओं और जनता के बीच ज्यादा समय बिताकर आगे की रणनीति तय करेंगे. पार्टी के अंदर एक वर्ग मानता है कि उन्हें यह पद ले लेना चाहिए था ताकि नीतीश कुमार जी की विरासत बनी रहती.”
सूत्रों ने यह भी बताया कि 44 साल के निशांत ने पार्टी को बता दिया है कि वह अगले छह महीने तक कोई पद लेने की संभावना नहीं रखते. निशांत ने पिछले महीने राजनीति में कदम रखा था, जब उन्होंने आधिकारिक रूप से जेडीयू जॉइन किया. उनके शामिल होने के समय उनके पिता नीतीश कुमार मौजूद नहीं थे.
एक पार्टी नेता ने कहा कि नीतीश और निशांत दोनों ही हमेशा वंशवाद की राजनीति के खिलाफ रहे हैं. इसलिए निशांत खुद अपनी मेहनत से लोगों का भरोसा और पद पाना चाहते हैं.
उन्होंने कहा, “कैबिनेट में शामिल न होकर उन्होंने वंशवाद के आरोपों को खत्म कर दिया है. हम यही बात लालू यादव और गांधी परिवार के खिलाफ कहते हैं, इसलिए पद लेना सही नहीं होता. इससे उनकी छवि भी अच्छी बनेगी और वह जमीनी स्तर पर काम करके सरकार चलाने का अनुभव भी ले सकेंगे.”
उन्होंने यह भी कहा, “निशांत ने बिहार की राजनीति में तभी कदम रखा जब उनके पिता ने राज्यसभा जाने का फैसला किया. वह अभी पार्टी को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहते हैं, खासकर जब नीतीश दिल्ली चले गए हैं.”
बीजेपी काफी समय से बिहार में नेतृत्व परिवर्तन चाहती थी. पिछले साल बिहार चुनाव में जेडीयू और बीजेपी ने बराबर सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिससे यह संदेश गया कि कोई भी ‘बड़ा भाई’ नहीं होगा. अब नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद बीजेपी को पहली बार राज्य में अपना मुख्यमंत्री मिल गया है.
जेडीयू प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद ने कहा, “निशांत जी पार्टी के काम में सक्रिय रहेंगे. वह लोगों और कार्यकर्ताओं से संवाद करेंगे. आगे क्या करना है, यह वह खुद तय करेंगे.”
विशेषज्ञों का कहना है कि अब जब बीजेपी को बिहार में अपना मुख्यमंत्री मिल गया है, तो वह राज्य में “बीजेपी संस्कृति” लागू करने पर ध्यान देगी.
एक सूत्र ने अलग तस्वीर पेश की. उन्होंने कहा कि फिलहाल जेडीयू के अंदर कई गुट हैं. एक गुट चाहता था कि निशांत कुमार कम से कम उपमुख्यमंत्री बनें, लेकिन दूसरा गुट हावी हो गया.
उन्होंने कहा, “दूसरा गुट बीजेपी के प्रभाव में है. अब जब बीजेपी को पूरा नियंत्रण और अपना मुख्यमंत्री मिल गया है, तो वह अपने तरीके से सरकार चलाना चाहेगी, जैसा वह दूसरे राज्यों में करती है.”
एक जेडीयू विधायक ने कहा कि पार्टी इस समय “संकट” में है. नीतीश कुमार के केंद्र जाने से, भले ही उन्होंने समर्थन और मार्गदर्शन का भरोसा दिया हो, कई कार्यकर्ता निराश हुए हैं.
उन्होंने कहा, “अगर निशांत जेडीयू की तरफ से उपमुख्यमंत्री बनते, तो पार्टी मजबूत होती और कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ता. इससे उन्हें राजनीति सीखने का मौका भी मिलता और धीरे-धीरे उनकी लोकप्रियता भी बढ़ती. बीजेपी स्वाभाविक रूप से प्रतिस्पर्धा नहीं चाहती और बड़ी योजना जेडीयू को बीजेपी में मिलाने की लगती है.”
विशेषज्ञों का कहना है कि बीजेपी ने पहली बार बिहार में अपना मुख्यमंत्री बनाने में सफलता पाई है और वह यह सुनिश्चित करेगी कि सरकार “केंद्र के अनुसार” चले.
बी.आर.ए. बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर के राजनीति विज्ञान के सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रविंद्र कुमार वर्मा ने कहा कि अगर निशांत कैबिनेट में होते, तो नीतीश कुमार की विरासत बनी रहती, जो बीजेपी नहीं चाहती.
उन्होंने कहा, “एक तरफ निशांत खुद राजनीति में सक्रिय होने को लेकर ज्यादा उत्साहित नहीं दिखते. दूसरी तरफ अगर वह कैबिनेट में होते, तो नीतीश की विरासत जिंदा रहती. हो सकता है बीजेपी ऐसा नहीं चाहती.”
उन्होंने यह भी कहा कि छह महीने में अनुभव लेकर सरकार में शामिल होने की बात ज्यादा तार्किक नहीं लगती.
उन्होंने कहा, “अगले छह महीने में क्या होगा, यह कोई नहीं बता सकता. जेडीयू कितनी मजबूत या कमजोर होगी, कहना मुश्किल है. मुझे लगता है कि बिहार में अब वही राजनीतिक संस्कृति विकसित होगी, जैसी बीजेपी राष्ट्रीय स्तर पर अपनाती है.”
उन्होंने आगे कहा, “दूसरे राज्यों में जहां बीजेपी ने मुख्यमंत्री बनाए, वहां नए चेहरों को मौका दिया गया, लेकिन बिहार में ऐसा नहीं हुआ. अब बिहार एक तरह से केंद्र के हिसाब से चलेगा. उत्तर प्रदेश में ‘बुलडोजर बाबा’ हैं और शायद बिहार में सम्राट के नेतृत्व में एक ज्यादा आक्रामक मुख्यमंत्री की छवि बनाई जाएगी.”
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