यह समझने की जरूरत है कि आदिवासी इलाकों की राजनीति के मुद्दे देश के अन्य इलाकों से भिन्न होते हैं. आदिवासी राजनीतिक से ज्यादा, अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं.
कांग्रेस के पास सवाल तो हैं, मगर सवालों के जवाब नहीं हैं, 'नेता' हैं मगर विजेता नहीं हैं. चुनाव के चंद सप्ताह पहले वह एक सदाचारी, व्यवस्था विरोधी एनजीओ की तरह पेश आ रही है, जो बस अपना फर्ज़ निभाने से मतलब रखता है.
सरकार रोजगार के 2014 के चुनावी वादे पर विफल हुई है. आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि बेरोजगारी बढ़ी है व पिछले 5 साल में ऑर्गनाइज्ड सेक्टर में रोजगार घटा है.
मंडल बांध परियोजना से 19 गांव के हजारों लोग विस्थापित होंगे. साढ़े तीन लाख पड़े कटेंगे. पर्यावरण को नुकसान होगा. ऐसी तमाम योजनाएं आदिवासियों के लिए विनाशकारी साबित हुई हैं.
दूसरे नेताओं में 80 वर्षीय मुलायम सिंह अपनी ही पार्टी में अलग-थलग हैं, वहीं 79 वर्षीय शरद पवार परिवार की अगली पीढ़ी के लिए चुनाव न लड़ने का ऐलान कर चुके हैं.
पहली बार महिला आरक्षण बिल आने के दो दशक से ज्यादा गुजरने के बावजूद आज भी इसे बाधित करने का आरोप सिर्फ तीन नेताओं- लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव और शरद यादव पर लगता है.
AAP सरकार ने बेअदबी के मामलों में जवाबदेही के मुद्दे से अपने किसी भी पूर्ववर्ती की तुलना में कहीं अधिक राजनीतिक लाभ उठाया है. अब उसके पास यह अवसर भी है—और दायित्व भी—कि वह अपनी इस बयानबाज़ी को अदालत में अपने प्रदर्शन से साबित करे.