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Thursday, 29 January, 2026
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लेक्चरर-प्रोफेसर की नियुक्ति के लिए बने राष्ट्रीय विश्वविद्यालय सेवा आयोग

उच्च न्यायपालिका की तरह यूनिवर्सिटीज में भी एक कोलिजियम सिस्टम चलता है, जिसमें प्रोफेसर अपने रिश्तेदारों को प्रोफेसर बना लेते हैं.

सवर्णों की तरह, मैं भी आरक्षण से नफरत करना चाहता हूं!

भारत सरकार द्वारा गरीब सवर्ण आरक्षण बिल की मंजूरी और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति में संस्थान के आधार पर...

मणिकर्णिका में वीरांगना झलकारी बाई महज आइटम सॉन्ग हैं!

लक्ष्मीबाई महिला-पुरुष विभाजन में कमज़ोर पक्ष में खड़ी थीं, लेकिन ब्राह्मण होने के कारण जातियों की सीढ़ी में वे सबसे ऊपर खड़ी थीं. झलकारी बाई एक साथ जाति और जेंडर दोनों विमर्श के हाशिए पर थीं.

औरतों की इस बात पर भारत के ‘महान नायकों’ को धरा जाना चाहिए

किसी राजनेता या कलाकार के बारे में लिखते हुए हम उन्हें आम इंसान से अलग कर देते हैं. ऐसा लगता है कि देश का...

क्यों मायावती के प्रधानमंत्री बनने की संभावना सबसे कम है

‘तीसरे मोर्चे’ के प्रधानमंत्री के चयन के तरीके पर गौर करने से स्पष्ट हो जाता है कि क्यों मायावती के चुने जाने की कोई संभावना नहीं है. मायावती को प्रधानमंत्री बनाने की चर्चा से सिर्फ भाजपा को ही फायदा होगा.

कांग्रेस की न्यूनतम आय गारंटी बिना कर बढ़ाए संभव ही नहीं

राहुल गांधी के न्यूनतम आय गारंटी का प्रस्ताव कितना कारगर है और इसे कैसे लागू किया जाय उस पर चाहे चर्चा हो, पर एक बात तय है कि इस बार का चुनाव आर्थिक मुद्दों पर लड़ा जायेगा.

अगर अनंतकुमार हेगड़े को कोई ‘गे’ नेता चॉकलेटी फेस बताये तो वो क्या कहेंगे?

आप किसी के रंग रूप, रेस, जेंडर, सेक्सुआलिटी, धर्म, जाति के आधार पर कमेंट नहीं कर सकते. ये विकास की राजनीति से परे सबके विनाश की राजनीति है.

बापू की हत्या गोडसे ने की लेकिन अगली सुबह ‘गांधीवादियों’ ने ‘गांधीवाद’ को ही मार डाला

गांधी की हत्या उनके वैचारिक विरोधी नाथूराम गोडसे ने की, वहीं गांधीवाद की कसमें खाने वालों ने अगली सुबह तक गांधीवाद की भी हत्या कर दी.

जब नेहरू के भारत में गांधी की हत्या और गोडसे से जुड़ी एक कहानी प्रतिबंधित की गई

‘नाइन ऑवर्स टू रामा’ सेंसरशिप से हमारे जटिल संबंधों को दर्शाता है. भारत में प्रतिबंध लगाए जाने के 57 वर्ष बाद आज भी सेंसरशिप का वो प्रकरण प्रासंगिक बना हुआ है.

पुण्यतिथि विशेष: कौन देखता था महात्मा गांधी की सुरक्षा

एक सवाल ये भी कि क्या तब बिड़ला हाउस के भीतर कोई भी मजे से प्रवेश पा सकता था? क्या उधर आने वालों की कोई छानबीन नहीं होती थी?

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अजित पवार की मौत ने भारतीय राजनीति में एक और ‘क्या होता अगर’ वाली बहस छोड़ दी है

दीन दयाल उपाध्याय की हत्या और माधवराव सिंधिया के प्लेन क्रैश से लेकर गांधी परिवार की हत्याओं तक, राजनीति में जो कुछ भी होता है, उसका हिसाब-किताब से कम और किस्मत से ज़्यादा लेना-देना होता है.

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राजनीति

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वायु प्रदूषण के कारण मौत होने के बारे में कोई निश्चित आंकड़ा नहीं : सरकार

नयी दिल्ली, 29 जनवरी (भाषा) सरकार ने राज्यसभा में बृहस्पतिवार को बताया कि वायु प्रदूषण के कारण मौतें होने की बात को स्थापित करने...

लास्ट लाफ

सुप्रीम कोर्ट का सही फैसला और बिलकिस बानो की जीत

दिप्रिंट के संपादकों द्वारा चुने गए दिन के सर्वश्रेष्ठ कार्टून.