देश और साथ ही महाराष्ट्र के सत्तापक्ष व विपक्ष के जनप्रतिनिधियों के लिए सबसे बड़ा सबक यह है कि वे इस शर्म को महसूस करें कि उनकी सत्यनिष्ठा इस कदर संदिग्ध हो चली है कि उसकी बोली लगाने वालों से बचाने के लिए उन्हें प्रायः हर ऐसे संकट के वक्त होटलों में ‘कैद’ करना या अपनी शुभचिंतक सरकारों के राज में ले जाना पड़ता है.
नीतियां ज़मीनी वास्तविकताओं की समझ वाले विशेषज्ञों द्वारा, पर्याप्त विचार-विमर्श के बाद बनाई जानी चाहिए. नेताओं को चाहिए कि वे इनकी जिम्मेदारी लें और समय रहते बदलावों के बारे में कारोबारियों को सूचित करें.
भाजपा की सत्ता अब भले ही केवल कुछ बड़े और महत्वपूर्ण राज्यों तक सीमित हो गई है लेकिन उसकी हिंदुत्ववादी विचारधारा ने अपना वर्चस्व कायम कर लिया है और देशभर में इसका कोई बड़ा विरोध नहीं हो रहा है.
भारत में शैक्षणिक संस्थानों के कैंपस को लगातार अस्थिर करने की कोशिश की जा रही है. इसके लिए रोहित वेमुला, पायल तड़वी, फातिमा लतीफ की आत्महत्या और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में हुए विरोध-प्रदर्शन को देखा जा सकता है.