सीएए पर विरोध प्रदर्शनों को, जो नितांत घरेलू मामला है, दुनिया में भारत की छवि धूमिल करने और 2019 में हासिल उपलब्धियों को गंवाने की वजह नहीं बनने दिया जाना चाहिए.
इतिहास अपने को दोहरा रहा है और 1974 वाले दौर में जो महसूस हुआ था वही आज भी महसूस होने लगा है लेकिन आज का भारत एकदम अलग हालात में जी रहा है, जिसके चलते मोदी के लिए इंदिरा गांधी के नक्शेकदम पर चलना मुश्किल है.
उम्मीद की जानी चाहिए कि आत्मावलोकन से परहेज खत्म होते ही प्रधानमंत्री को यकीन हो जायेगा कि उनका खुद अलोकतांत्रिक बने रहकर जनता से लोकतंत्र की मांग करने का कोई अर्थ नहीं है.
भारतीय लोकतंत्र का मिजाज अधिनायकवादी सरकारों के अनुकूल नहीं है. भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में ऐसी सरकारें हमेशा बेहतर हैं, जो अधिकतम लोगों, समूहों और विचारों को साथ लेकर चलने की कोशिश करें.
नयी दिल्ली, दो फरवरी (भाषा) जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) ने पांच पीएचडी विद्यार्थियों को दो सेमेस्टर के लिए निष्कासित कर दिया है, जिनमें जेएनयू...