किसी राजनीतिक दल की मदद के बगैर सीएए का विरोध कर रहे भारत के मुसलमानों ने एक नई राजनीतिक पहचान कायम की है और उन्होंने नुमाइंदगी के सवाल को भी सुलझा लिया है.
भाजपा जिस तरह संरक्षणवाद का सहारा लेते हुए बहुराष्ट्रीय कंपनियों का निषेध कर रही है और तकनीक विरोधी पुरातनपंथी धारणाओं की ओर मुड़ रही है उससे यही जाहिर होता है कि मजबूत सरकारें भी जोखिम लेने से कतराती हैं.
वॉट्सऐप ग्रुप्स पर गृहमंत्री की ऐसी छवि उभरती है जैसे वो प्राचीनकाल के कोई राजा हों जो विश्व जीतने के लिए निकला है. उसके लिए युवाओं का एक ही उपयोग है- सेना में शामिल हो जाना.
विरोध-प्रदर्शनों की मुख्य विशेषता यह रही है कि आमतौर पर इनका नेतृत्व कोई स्थापित राजनीतिक दल या नेता नहीं कर रहे हैं, बल्कि इनके प्रति एक व्यापक मोहभंग दिखाई दे रहा है.
2015 के दिल्ली चुनाव में आदमी पार्टी ने 67 सीटें जीतकर तहलका मचा दिया था. कांग्रेस, मजबूत नेतृत्व के अभाव में शून्य पर सिमट गयी थी और भाजपा को केवल 3 सीटें मिलीं थीं.
महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख ने जज लोया मामले को दोबारा खोलने के संकेत दिए हैं. पर कोई चूक होने पर ये कदम उलटा पड़ जाएगा – राजनीतिक और कानूनी दोनों ही दृष्टियों से.
2017 से लेकर 2019 तक टीम इंडिया को जिन दो गेंदबाजों ने जबरदस्त कामयाबी दिलाई. इन दो गेंदबाजों ने एक जैसी काबिलियत होने के बाद भी विश्व क्रिकेट के बड़े-बड़े बल्लेबाजों को चौंकाया.
1976 में नरेंद्र मोदी ने भारत के युवाओं को पत्र में लिखा था- आज की गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, अनैतिकता, भ्रष्टाचार, और चरम यातना कल आपको ही भुगतनी पड़ेगी, तो आप चुप क्यों हैं?
क्या हमें भारत में हुए ऐसे किसी आंदोलन की याद है जिसमें महिलाओं की नेतृत्वकारी छवि प्रमुखता से उभरी हो ? इन प्रश्नों के उत्तर तलाशते हुए हम फिलहाल चल रहे नागरिकता आंदोलन के सबसे खास पहलू तक पहुंचते हैं : महिलाएं आज राजनीति का व्याकरण लिख रही हैं.