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Sunday, 1 February, 2026
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मोदी के कोविड-19 लॉकडाउन भाषण से पता चलता है कि वह पिछली गलतियों से सीखते नहीं हैं, या परवाह नहीं करते

कोरोनोवायरस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूसरे भाषण से पता चलता है कि वह नेहरू जैसे ही हैं. वह चुनाव तो जीत सकते हैं, पर और कुछ नहीं.

मोदी सरकार का आलोचक होने के बाद भी मैं कोविड-19 लॉकडाउन का समर्थन करता हूं, विपक्ष को भी करना चाहिए

इस सरकार के रुझान को देखते हुए विपक्ष को सतर्क रहना होगा कि कहीं सरकार राष्ट्रीय स्तर की इस स्वास्थ्य-इमरजेंसी का इस्तेमाल लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन और संविधानेतर शक्तियों को अमल में लाने में ना कर ले.

कोरोनावायरस के प्रकोप के बीच गंगा हमें शायद जैविक हमलों से बचा पाती, अगर उसे बहने दिया जाता

सौ साल भी नहीं हुए निंजा वायरस हमारी गंगा नदी में इफरात पाए जाते थे. वैज्ञानिक इन्हें बैक्टेरियोफाज कहते हैं. संक्रमण फैलने से रोकने में इनका महत्व समझना चाहिए.

मोदी विरोध इतना हावी है कि एक अमेरिकी अर्थशास्त्री का कोविड-19 पर संदेह भरा मॉडल भी इस लॉबी को सही लगता है

अमेरिका स्थित एक अर्थशास्त्री ने कम-से-कम 20 करोड़ भारतीयों के संक्रमित होने का अनुमान लगाया है पर किसी को उन अवधारणाओं का पता नहीं जिस पर कि ये आंकड़ा आधारित है.

ईश्वर का कोरोनावायरस से कुछ नहीं बिगड़ेगा और न आप उनसे पूछ ही पाएंगे कहां हो प्रभू

ईश्वर को डरने की जरूरत नहीं है कि कोरोना को न रोक पाने की वजह से उसकी सत्ता कमजोर पड़ जाएगी. न ही लोग ईश्वर से ये पूछने वाले हैं कि जब लोग बीमार हो रहे थे तो वह क्या कर रहा था?

क्या कोरोनावायरस भारत में खचाखच भरे जेलों से कैदियों की रिहाई का रास्ता बनेगा

जेलों में इस महामारी को रोकने के लिये सात साल तक की सजा पाये कैदियों की पेरोल पर रिहाई की पेशकश है. क्या भारत में जेल व्यवस्था में सुधार के लिये कोरोनावायरस आपदा ही एकामात्र रास्ता है?

कोरोनावायरस से भारत में 30,000 लोगों की मौत हो सकती है, जून तक अस्पताल में बिस्तर खाली नहीं रहेगा : डाटा

कोविड-19 वायरस के मामले में अलग-अलग राज्य अलग-अलग तरह से कार्रवाई करेंगे क्योंकि गरीब राज्यों में स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा बेहद कमजोर है.

कोरोनावायरस ने भारत को दो विकल्प दिए- शासन की शक्ति को बढ़ाएं या क्षमता

भारत में कोरोनोवायरस की महामारी एक लुंज-पुंज स्वास्थ्य प्रणाली की पृष्ठभूमि में फैल रही है. भारत आज जो विकल्प चुनता है, उसी से भविष्य में शासन और नागरिकों के संबंधों का निर्धारण होगा.

इस दुर्दिन में भी डाॅ. लोहिया के वारिसों को उनके बताये कर्तव्य पथ पर चलना गवारा नहीं

डाॅ. लोहिया का वारिस कहने वाली पार्टियां और नेता गहन वैचारिक निराशा से गुजरकर भी निराशा के उन कर्तव्यों को निभाने को तैयार नहीं हैं.

भगत सिंह की शहादत पर पेरियार और आंबेडकर ने क्या कहा था

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत के समय उस दौर के दो प्रसिद्ध बुद्धिजीवी और एक्टिविस्ट पेरियार और डॉ. आंबेडकर ने अपनी पत्रिकाओं में क्या लिखा, इसे जानना इनकी विचार प्रक्रिया को समझने में मददगार साबित होगा.

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डीआरडीओ के लिए बजट कभी बाधा नहीं रहा : संयुक्त निदेशक

कोलकाता, एक फरवरी (भाषा) डीआरडीओ के संयुक्त निदेशक बिनॉय कुमार दास ने रविवार को कहा कि अत्याधुनिक रक्षा प्रौद्योगिकियों और हथियार प्रणालियों के...

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सुप्रीम कोर्ट का सही फैसला और बिलकिस बानो की जीत

दिप्रिंट के संपादकों द्वारा चुने गए दिन के सर्वश्रेष्ठ कार्टून.