प्रभावी श्रम कानूनों की संख्या घटाने से मामला कुछ सरल हुआ है मगर अपेक्षित परिणाम पाने के लिए वही काफी नहीं है, असली इम्तहान तो रोजगार में वृद्धि के मामले में होगा.
उत्तर प्रदेश की बिगड़ी हुई कानून व्यवस्था पर जब भी बात होती है, तो उसे जिलों में तैनात डीएम और एसपी की जाति को देखकर समझने की कोशिश की जाती है. 40 से ज़्यादा जिलों के डीएम/एसपी मुख्यमंत्री के सजातीय हैं.
तालिबान ने संकेत दिया है कि उनकी सत्ता में भागीदारी या वापसी के बाद काबुल की जमीन से भारत विरोधी आतंकी गतिविधि की इजाजत नहीं दी जाएगी. इस तथ्य को देखते हुए भारत को अपनी अफगान नीति को द्विपक्षीय बनाने की जरूरत है.
2016 आरबीआई एक्ट के तहत, सरकार को अगले वर्ष इन्फ्लेशन टारगेट की समीक्षा करनी है, इसके फ्रेमवर्क की नहीं. फिर भी, इस सिस्टम को ख़त्म करने की मांग उठ रही है.
बहरहाल, समझने की नीयत हो तो यह समझना भी जरूरी है कि महात्मा गांधी व लालबहादुर शास्त्री में इतनी ही समानता नहीं है कि अलग-अलग शताब्दियों, जगहों व परिस्थितियों में दोनों एक ही तिथि 2 अक्टूबर को पैदा हुए. उनके नैतिक आग्रह भी लगभग एक जैसे थे.
कांग्रेस के पास मौका है कि वह भाजपा सरकार द्वारा लाए गए कृषि कानूनों और श्रम कानूनों पर अपना रुख साफ करे. मोदी सरकार द्वारा सरकारी संपत्तियों की बिक्री पर स्पष्ट रुख अपनाए.
प्रवासी भारतीय सम्मेलन से लेकर कुंभ मेलों तक, भारत ने दिखाया है कि वह जटिल आयोजनों का प्रबंधन कर सकता है. इस क्षमता को बाद में उसके G20 शिखर सम्मेलन के दौरान वैश्विक मंच पर भी मजबूती मिली.