हर फैशन की तरह बुद्धिजीवी फैशन भी गोल गोल घूमता है, आर्थिक व्यवधान, बढ़ती असमानता, और सरकारी संसाधनों की कमी के चलते, आर्थिक व्यवहार घूम-फिर कर वहीं पहुंच रहा है.
पिछले कुछ सालों से ड्रग्स, लैंगिक समानता, अपराध, कामुकता को कैमरे पर बॉलीवुड आसानी से दर्शाता आ रहा है लेकिन समझ में नहीं आता कि बॉलीवुड अभी भी दलित किरदारों से क्यों हिचकिचाता है.
फ्रांसीसी राजदूत को लेकर तहरीक-ए-लब्बैक के विरोध प्रदर्शनों में अब बहुत लोगों की जान चली गई है और सरकार का मज़ाक बनकर रह गया है. लेकिन इमरान खान अभी भी सौदेबाज़ी कर रहे हैं.
पाकिस्तान में सत्ता में रहने वालों ने हमेशा से व्यावहारिक तौर पर धर्म के इस्तेमाल को ही सभी समस्याओं के समाधान के तौर पर सामने रखा है. 1977 में भुट्टो ने भी धार्मिक अधिकारों के आगे हार मान ली थी.
लोग अपनी चुनी हुई सरकार की आपराधिक उपेक्षा को देख क्रोध में थे लेकिन प्रधानमंत्री ने लोगों के दुख को कमतर आंकते हुए उसे अपने निजी दुर्भाग्य का रूप दे डाला.
प्रधानमंत्री मोदी को वाशिंगटन शिखर सम्मेलन का उपयोग विकासशील देशों के लिए पर्यावरण अनुकूलन के महत्व पर भागीदार देशों का ध्यान खींचने और इसके वास्ते बहुपक्षीय वित्त और प्रौद्योगिकी की व्यवस्था पर जोर देने के लिए करना चाहिए.
बेकाबू कोविड पर लगाम लगाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी अगर वैज्ञानिकों की सलाहों पर ध्यान नहीं देंगे तो ब्रिटिश प्रधानमंत्री का भारत दौरा रद्द किए जाने की अहमियत उन्हें समझ में नहीं आएगी.
बीतों वर्षों में भारतीय नागरिकों का शासन में भरोसा खत्म हो चुका है लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर उनका भरोसा बना हुआ है. क्या भाजपा के मुकाबले राष्ट्र को अधिक तरजीह देंगे मोदी?
अवामी लीग को अभी इस सवाल का जवाब नहीं चाहिए कि हसीना के बाद कौन होगा या यह बहस कि हसीना को बांग्लादेश लौटना चाहिए या नहीं, बल्कि ज़मीन पर नया नेतृत्व चाहिए.