अगर आप सोचते थे कि क्रिकेट और सशस्त्र बल धर्म से अछूते दो संस्थान हैं, तो आपको गहरा झटका लगा होगा. कांग्रेस के राहुल गांधी के शब्दों में अब क्रिकेट नफरत की चपेट में है.
पिछले एक वर्ष में लोगों ने नौकरियां और आय के साधन गंवाए हैं और महंगाई भी जमकर बढ़ी है. यह दोहरी मार की तरह है, ईंधन ऐसे समय पर महंगा हो रहा है जब लोगों की जेब में पैसा भी कम है.
नये वित्तीय कदमों के साथ मुद्रास्फीति का खतरा जुड़ा है, जो मतदाताओं को सरकार के विरोध में खड़ा कर देता है. और, दांव पर अगर आर्थिक वृद्धि है, तो इसने अगर निराश किया तब क्या होगा? मोदी को इस बारूदी रास्ते पर संभलकर ही चलना होगा.
कृषि कानूनों के साथ, मोदी सरकार ने श्रम सुधारों को पारित किया है और प्रमुख कंपनियों के निजीकरण का वादा किया है. इसने अर्थिक दक्षिण-वाम को विभाजित किया है, और यह एक अच्छी बात है.
किसान आंदोलन ने मोदी सरकार के लिए प्रचार के स्तर पर एक नयी चुनौती खड़ी कर दी है. एक ‘चायवाला’ से लोक कल्याण मार्ग तक मोदी के सफर को लेकर बड़े जतन से जो छवि गढ़ी गई थी वह अब धूमिल होने लगी है.
यह साफ है कि जंग किसी को भी रास नहीं आती है. जून 2020 में गलवान घाटी में झड़प के बाद तैनाती के दौरान दोनों देशों की सेनाएं एकदम आमने-सामने आ जाने के बावजूद फिर कोई हताहत नहीं हुआ.
मोदी सरकार किसान आंदोलन से निबटने के लिए जो कुछ कर रही है उससे उदार लोकतांत्रिक देश वाली हमारी छवि धूमिल हो रही है, सरकार को भूलना नहीं चाहिए कि हर नागरिक को अपनी आवाज़ उठाने का अधिकार है.
एक स्थिर नेपाल के लिए आगे का रास्ता लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने, समावेशी संवाद के जरिए राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करने और कानून के शासन को बनाए रखने में है.
गोरखपुर (उप्र), 13 जनवरी (भाषा) उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ मकर संक्रांति के अवसर पर सदियों पुरानी नाथ परंपरा...