राजनैतिक और चुनावी तौर पर काफी मजबूत स्थिति में होने के बावजूद भाजपा अपने तथाकथित साहसिक सुधारों को आगे नहीं बढ़ा पा रही है, क्योंकि ये जन-हितैषी नहीं है.
येदियुरप्पा को अब सम्मान के साथ रियाटर होने के विकल्प पर गौर करना चाहिए. उनके साथ अब न तो उम्र है और न ही विधायक हैं कि अगर ऐसी स्थिति आ जाए, तो वो आलाकमान के साथ बल परीक्षा कर सकें.
परदे के पीछे चलने वाले संवादों से तनाव कुछ कम हुआ तो दिखता है लेकिन नीति बनाने वालों की अपेक्षाओं और नीति तय करने की कठोर हकीकतों के बीच बड़ी खाई बनी हुई है.
आर्थिक सुधारों को अब जिस तरह ताबड़तोड़ लागू किया जा रहा है उससे यही संकेत मिल रहा है कि वे आर्थिक ‘रिकवरी’ की कोशिश तो करेंगे मगर अब तक जो कारगर साबित होता रहा है उससे तौबा नहीं करेंगे.