राहुल गांधी और कांग्रेस अपने आरोपों पर कभी भी स्थिर नहीं रही है. वे अपनी हार की वजह अपने नेतृत्व की क्षमता और संगठन में ढूंढने के बजाय अलग-अलग प्रक्रियाओं में ढूंढते हैं. राहुल गांधी एक नेता की तरह नहीं, बल्कि गांव के मास्टर की तरह नजर आते हैं.
आतंकवाद से निपटने के लिए पाकिस्तान सेना को ऐसी राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखानी होगी, जो केंद्र के नेताओं को सीमावर्ती इलाकों से जोड़ सके. लेकिन शायद उसके पास इसके लिए जरूरी कल्पनाशक्ति न हो.
जो लोग शिकायत करते हैं कि हमारी नगरपालिकाएं कुत्तों को ठीक से आश्रय नहीं दे पा रहीं, वे शरणार्थियों और राजनीतिक उत्पीड़न के शिकार लोगों को दिए जा रहे बदहाल आश्रयों पर क्यों चिंता नहीं करते?
पिछले 11 साल से नेहरू लगातार मेरे प्रयासों में अड़ंगा डालते रहे हैं और मेरी कई योजनाओं व अभियानों को नाकाम बना रहे हैं. मेरी अधिकतर पहलें असफल होने का कारण वही हैं.
सीबीआई ने कई हाई-प्रोफाइल केस सुलझाकर देश की टॉप अपराध जांच एजेंसी के रूप में अपनी पहचान बनाई है, लेकिन कई मामले अब तक अनसुलझे हैं या फिर उनमें आरोपियों को बरी कर दिया गया है.
मंगलवार को हुआ संविधान क्लब का चुनाव ‘ठाकुर बनाम बाकी’ की बीजेपी अंदरूनी जंग का अंत नहीं है. अगला लोकसभा चुनाव आने से पहले जातिगत जनगणना के नतीजों का इंतज़ार कीजिए.
तुर्की और मिस्र की तरह, पाकिस्तान भी उन चुनिंदा देशों में है जिनके पास खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा में मदद करने के लिए जनशक्ति और ढांचा मौजूद है, खासकर जब ट्रंप का अमेरिका अपनी सैन्य मौजूदगी कम कर रहा है.
अगर कांग्रेस साझा नेतृत्व और ज़मीनी संघर्ष को प्राथमिकता दे, तो INDIA गठबंधन अब भी भाजपा-आरएसएस की सत्ता-प्रधान राजनीति के खिलाफ लोकतंत्र का सबसे मज़बूत प्रहरी बन सकता है.
अमेरिका को चुनौती देना भारत के किसी नेता के लिए आमतौर पर निजी जोखिम नहीं होता. विदेशी दबाव की बात आते ही देश एकजुट होकर उस नेता के साथ खड़ा हो जाता है जिसे वे इस लड़ाई में अपना अगुआ मानते हैं.
किसी भी युद्ध को जीतने तो क्या, शुरू करने की कुंजी यह होती है कि उसका लक्ष्य स्पष्ट हो. यह पूरी तरह से राजनीतिक विषय होता है. यह न तो भावनात्मक मामला होता है, और न ही शुद्ध रूप से सैन्य मामला.