आज जो दहशत व्याप्त है उसमें बढ़ती विषमता आग में घी वाला काम कर रही है. इसने अमीर, गरीब, मध्य आय वाले देशों के समाजों की स्थिरता को खतरे में डाल दिया है.
भारत तालिबान को सिर्फ इसलिए राजनीतिक दुश्मन न मान बैठे कि वह इस्लामी है या पाकिस्तान का दोस्त है. भाजपा अगर अपने देश में ध्रुवीकरण की राजनीति से बाज आए तो वह मोदी सरकार उसे अपना दोस्त बना सकती है.
अगर यही स्थिति जारी रही और राजनीतिक दलों ने अपने दृष्टिकोण में बदलाव नहीं किया तो वह समय दूर नहीं जब देश की संसद और विधानमंडलों में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों का बहुमत होगा.
1962 के युद्ध, श्रीलंका में आईपीकेएफ से लेकर हाल के सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट हवाई हमले, लद्दाख में तनातनी का रिकॉर्ड सेना और सरकार ने जिस तरह रखा है वह यही बताता है कि भावी पीढ़ियों को इनका प्रामाणिक विवरण नहीं उपलब्ध हो सकेगा.
हिंदी भाषी राज्यों के लगभग 53 प्रतिशत उत्तरदाताओं को यह पता था कि जोमैटो क्या है, जो अपने आप में महत्वपूर्ण है. लेकिन यह आंकड़ा पेटीएम के बारे में लोगों की जागरूकता से काफी कम है.
मोदी की अधिकांश राजनीतिक और चुनावी ऊर्जा एक ऐसे नेता को अपमानित करने पर खर्च होती रहती है जिसने कांग्रेस को गर्त में पहुंचाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी है.
अगर राहुल गांधी इतने ही बेकार हैं कि वे इस सरकार के लिए एक 'एसेट' और विपक्ष के लिए एक 'लायबिलिटी' की तरह काम करते हैं, तो फिर सरकार उन्हें ख़बरों में बनाए रखने के लिए इतनी ज़ोर-शोर से कोशिश क्यों कर रही है?