2021 भारत में जाति-विरोधी सिनेमा के लिए एक जबरदस्त साल साबित रहा. तमिल फिल्मों ने दिखा दिया कि जाति-विरोधी फिल्में ‘बॉक्स-ऑफिस-विरोधी’ हो ये जरूरी नहीं है.
नव-उदारवाद का जमाना गया, अब हस्तक्षेपवादी सरकार का वक़्त आ गया है, प्रवास का दौर गया, अब आक्रोश को भड़काने का समय आ गया है, लोकतंत्र के प्रतिष्ठित गढ़ों में भी लोकलुभावनवादियों ने क्लब बना लिया है.
नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी दोनों नए प्रस्तावों का विरोध कर सकते हैं, लेकिन कांग्रेस के लिए स्थिति थोड़ी अजीब है. पार्टी के लिए परिसीमन का समर्थन करने से उसे जम्मू में भी फायदा नहीं होगा.
बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि अखिलेश यादव अपनी समाजवादी पार्टी को मोर्चा लेने के लिए किस तरह तैयार करते हैं और भाजपा के पाले में गए मतदाताओं को अपने पाले में कैसे लाते हैं.
पाकिस्तान अधिकतर मामलों में भारत की बराबरी करे यह न केवल नामुमकिन है, बल्कि वह और पिछड़ता ही जाएगा. उसके नेता अपनी अवाम को अलग-अलग बोतल में सांप का तेल पेश करते रहेंगे.