मंडल की राजनीति ने पिछड़ों, दलितों और अति पिछड़ों की पहचान को राजनीतिक चेतना में बदल दिया है. ऐसे में, RSS का एकीकृत हिंदू समाज का विचार उस विविधता से टकराता है जो बिहार की राजनीति की आत्मा है.
असली नाराज़गी गोवा में दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु से आने वाले अमीर टूरिस्टों और ज़मीन खरीदने वालों पर है, लेकिन गुस्सा नीचे की ओर जाकर सबसे गरीब मेहनतकश लोगों पर निकल रहा है, जो उत्तर भारत के राज्यों से आते हैं.
भारत के विभिन्न संप्रदायों को अपनी परंपराओं और ज्ञान को संस्थागत रूप देना होगा और उसे इस तरह सरल बनाना होगा कि वह आसानी से आगे सिखाया जा सके और लोगों तक फैलाया जा सके, अगर उन्हें बड़े अब्राहमिक धर्मों के साथ प्रतिस्पर्धा करना है.
प्रवासियों और उनके परिवारों के एक बड़े वर्ग की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में बदलाव आ रहा है. इससे उन्हें समाज में सम्मानजनक दर्जा हासिल करने में मदद मिल रही है.
बिहार के पास ऐसी उपजाऊ ज़मीन है जो पूरे भारत में सबसे ज्यादा क्रांतियों को जन्म देने वाली रही है. इसके बावजूद बिहार इतना पीछे क्यों रह गया? राजनीति का स्थायी जुनून ही उसके विनाश की मूल वजह है.
दीन दयाल उपाध्याय की हत्या और माधवराव सिंधिया के प्लेन क्रैश से लेकर गांधी परिवार की हत्याओं तक, राजनीति में जो कुछ भी होता है, उसका हिसाब-किताब से कम और किस्मत से ज़्यादा लेना-देना होता है.