जिस दौर में भारत में मुगल शहंशाह और दूसरे राजा-महाराजा तलवार भांज रहे थे, शिकार कर रहे थे, मुजरा देख और सुन रहे थे और अपने लिए महल और मर चुके परिजनों के लिए मकबरे बना रहे थे, तब यूरोप पुनर्जागरण के बाद धर्म को शासन से अलग करने में जुटा था.
लोकसभा की सीटों का आज की जनसंख्या के अनुपात में पुनर्वितरण लोकतांत्रिक लिहाज से तर्कसंगत लग सकता है, लेकिन यह उत्तर दक्षिण की खाई को गहरा करेगा, भारत की संघीय एकता को कमजोर करेगा.
उपभोक्ताओं के आत्मविश्वास का मौजूदा स्तर, और भावी को लेकर उनकी अपेक्षाएं मार्च 2019 के स्तर के करीब नहीं पहुंच पाई हैं, उन्हें मार्च 2020 में कोविड के हमले से पहले के स्तर से काफी ऊपर जाना जरूरी है
भारत का कारवां ऐसे लाखों अति प्रतिभाशाली लोगों द्वारा खींचे जा रहे विशालकाय रथ की तरह गति पकड़ते हुए आगे बढ़ रहा है, जिन्हें तैयार करना हमारे पुराने श्रेष्ठ संस्थानों के बस में नहीं हो सकता था.
पूर्वोत्तर में सांप्रदायिक और बहुसंख्यकवादी तर्क लागू नहीं किए जा सकते. इसके लिए धर्मनिरपेक्ष और संवैधानिक शासन की आवश्यकता है, जो जातीय और जनजातीय हितों की रक्षा करता हो.
देश में साइबर क्राइम का फैलाव कितना है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2021 में इसके कुल 52,000 मामले दर्ज हुए. यह संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है और लगभग दुगनी हो गई है.
जबकि राष्ट्रवादी तबके से 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' जैसी बयानबाजी होती रहती है, मोदी सरकार की चुप्पी ने दिखाया है कि भारत में लैंगिक समानता और सुरक्षा मूल चिंता नहीं है.
पश्चिमी लिबरलिज़्म अधिकारों से शुरू होता है और समाज को पीछे की ओर डिज़ाइन करता है. धर्म रिश्तों से शुरू होता है. यह मानता है कि आप ज़िम्मेदारियों के जाल में पैदा हुए हैं, और यह जाल एक तोहफ़ा है.