अगर मोदी वाजपेयी शैली का एनडीए गठबंधन चलाना चाहते हैं, तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं है. अगर वे तथाकथित मोदी क्रांति की ओर लौटना चाहते हैं, तो गठबंधन मौजूदा शांति से कहीं ज़्यादा मुश्किल में है.
1998 के रियासी हत्याकांड के बाद तीन संकट उभरे — करगिल युद्ध, 2001-2002 में सीमा पर सेनाओं का जमावड़ा और बालाकोट. इन सबने परमाणु शक्ति से लैस दो देशों को युद्ध के कगार पर ला खड़ा किया. अब पिछले सप्ताह हुआ हत्याकांड यही दिखाता है कि दोनों देश खतरनाक गतिरोध में फंसे हैं.
कुछ राज्यों में बीजेपी को जो सत्ता-विरोधी वोट हासिल हुए हैं उनके सहारे यह बात थोड़ी-बहुत छिप जा रही है कि इस बार का जनादेश केंद्र में काबिज़ बीजेपी के खिलाफ आया है.
‘नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी’ में नई जान फूंकने के बाद ही एक शांतिपूर्ण, समृद्ध और एकजुट क्षेत्र के अपने सपने को नई सरकार साकार कर सकती है. क्षेत्र में सुरक्षित और स्थिर वातावरण होगा तभी वह ‘विकसित भारत’ के अपने लक्ष्य को हासिल कर सकेगी.
सहज राजा अपने पूर्ववर्ती, प्रतिद्वंद्वी, या मातहत के प्रति ग्रंथि से मुक्त होता है. उसे किसी से अपनी चमक फीकी पड़ने का अंदेशा नहीं होता. नकली राजा हर बात से अपनी कमतरी दिखने के डर में रहता है. उसे अपना गुणवान मंत्री, मंत्री का अच्छा सचिव भी नागवार गुजरता है.
मुस्लिम वोट भाजपा की सबसे बड़ी चिंता हैं. विरोधी पहले से ही सक्रिय हैं और कमियों की तलाश कर रहे हैं. यूपी को फिर से हासिल किए बिना, भाजपा की हार के धीरे धीरे बढ़ने की संभावना है.
भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद का घर-घर जाकर प्रचार करना, संविधान को मुद्दा बनाना और दलितों और मुसलमानों को एकजुट करना, जिसने उन्हें नगीना निर्वाचन क्षेत्र में जीत दिलाई, मायावती खेमे में बेचैनी बढ़ा सकता है.
आज निरंतर बदलती विश्व व्यवस्था भारत के लिए एक मौका उपलब्ध करा रही है जिसका लाभ उठाने के लिए उसे खुद को अनुशासित रखना होगा ताकि पाकिस्तान जब अपने लिए मौका देख रहा है तब हम हड़बड़ी में कोई प्रतिक्रिया न कर बैठें.