एशिया के दो सबसे अधिक आबादी वाले और ताकतवर देशों, चीन और भारत के बीच लंबे समय से चल रहा तनाव, कभी-कभी सशस्त्र संघर्ष में बदलता रहा है. जलवायु संकट के कारण दक्षिण एशिया के देशों के बीच संघर्ष और भी बदतर होने की आशंका है.
पूर्व नरेश के कई समर्थक उन्हें उम्मीद की एक किरण के रूप में देखते हैं. उनका मानना है कि वे देश में राजनीतिक स्थिरता बहाल कर सकते हैं, जो कि 17 वर्षों से दूर का सपना बना हुआ है.
भारत वर्षों से देसी एटीजीएम बनाने की कोशिश में जुटा है ताकि उसकी सैन्य क्षमता मजबूत बने, विदेशी हथियार सप्लायरों पर निर्भरता घटे और सेना के ऑपरशन्स ज्यादा असरदार बने.
पहले कार्यकाल में ज़मीन अधिग्रहण विधेयक और दूसरे कार्यकाल में कृषि कानूनों पर पीछे हटने के बाद, ऐसा लगता है कि पीएम मोदी ने तीसरे कार्यकाल में सुधारों के लिए अपनी इच्छा समाप्त कर दी है.
ये नियम दखलंदाजी या प्रोत्साहनों पर आधारित नहीं हैं. बल्कि, काउंसलिंग, डिजिटल कुशलता के साधन, या गेम की स्वैच्छिक सीमा जैसे उपाय आचरण में दीर्घकालिक बदलाव को बढ़ावा दे सकते हैं.
विधायक तापसी मंडल के पार्टी बदलने के बाद — जिसके लिए उन्होंने भाजपा के ‘विभाजनकारी एजेंडे’ को जिम्मेदार ठहराया — शुभेंदु अधिकारी की सांप्रदायिक टिप्पणियों की बाढ़ आ गई. ममता के सिपहसालारों ने भी उसी तरह पलटवार किया.
मुसलमान लोग सोशल मीडिया पर होली तथा दूसरे हिंदू त्योहार मना रहे हैं और अपने हिंदू दोस्तों तथा मुस्लिम दोस्तों को भी त्योहारों पर बड़े उत्साह से बधाई दे रहे हैं. अब हम इसे वास्तविक रूप क्यों न दें?
हाल के वर्षों में बलूचिस्तान में कई नए लोकतांत्रिक आंदोलन हुए हैं. पाकिस्तानी सेना यह तो नहीं चाहेगी कि कोई नई बगावत फूटे. हालांकि, अपनी ताकत को चुनौती दिए जाने की जगह वह इसे ही पसंद करेगी.
तीन-भाषा नीति का डीएमके द्वारा विरोध राष्ट्र पर पार्टी को प्राथमिकता देने का उदाहरण है. शायद अब वक्त आ गया है कि पार्टी को कत्थक पर गर्व होना चाहिए, जैसा कि हम उत्तर भारतीय भरतनाट्यम पर करते हैं.
बांग्लादेश के नए विदेश मंत्री खलील-उर-रहमान के अप्रैल में भारत आने की उम्मीद है. प्रधानमंत्री तारिक रहमान के पद संभालने के बाद ये दोनों देशों के बीच पहला बड़ा हाई-लेवल संपर्क होगा.