चंडीगढ़ और जालंधर: पंजाब यूनिवर्सिटी की एक यात्रा के दौरान, नवदीप सिंह अपने हाथों में पकड़ी नीली किताब को बार-बार देख रहे थे, जैसे वह कहीं गायब न हो जाए. इस किताब का नाम है गैंग्रीन: पंजाबी दलित शॉर्ट स्टोरिज, जो पेंगुइन द्वारा प्रकाशित एक कलेक्शन है. फाजिल्का के एमआर गवर्नमेंट कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर नवदीप सिंह का नाम इस किताब के कवर पर पंजाब यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अक्षय कुमार के साथ लिखा है. फिर भी, वह इसे लेकर पूरी तरह खुश नहीं हो पा रहे हैं.
उनकी एकेडमिक दुनिया और फिरोजपुर के पंजावा गांव में रहने वाले उनके मजहबी दलित सिख समुदाय के बीच एक दूरी है. उन्होंने यह किताब अपने माता-पिता को समर्पित की है, लेकिन उन्हें यह सवाल परेशान करता है: क्या यह किताब उनके उस समुदाय के लिए कुछ मायने रखेगी, जो ज्यादातर खेत मजदूर हैं?
उन्होंने कहा, “मैं इसे पूरी तरह समझ नहीं पा रहा हूं. मेरे माता-पिता नहीं समझते कि यह कितनी बड़ी बात है, और शायद मैं भी उन्हें ठीक से समझा नहीं सकता. हो सकता है कि प्रोफेसर अक्षय के साथ जिस अगली किताब पर मैं काम कर रहा हूं, वह खुशी और गर्व का एहसास लेकर आए.” 28 साल के अंग्रेजी साहित्य के इस शिक्षक ने चंडीगढ़ में कुमार के आवंटित क्वार्टर में बैठे हुए हल्की चिंता के साथ मुस्कुराते हुए यह बात कही.
गैंग्रीन में अत्तारजीत, प्रेम गोरखी, मोहन लाल फिल्लौरिया और भगवंत रसूलपुरी जैसे लेखकों की कहानियां शामिल हैं, जो अब पूरे भारत के पाठकों तक पहुंच रही हैं. उनकी कहानियां यह दिखाती हैं कि एक ऐसे राज्य में दलित होना क्या मायने रखता है, जहां लगभग एक-तिहाई आबादी इस समुदाय से है, लेकिन इस साहित्य की पहुंच पंजाब के भीतर भी बहुत कम रही है.
भारत में दलित लेखन आमतौर पर महाराष्ट्र से जुड़ा माना जाता है — जहां अत्यधिक गरीबी और आंबेडकर-फुले की क्रांतिकारी विरासत से निकली तीखी और सच्ची आत्मकथाएं सामने आईं. लेकिन पंजाबी दलित लेखन एक अलग परिस्थिति से उभरा, जिस पर कृषि समृद्धि, सिख धर्म की समानता की भावना, मार्क्सवादी विचार, डेरा संस्कृति और आज़ादी से पहले के ‘अछूतों’ के आदि धर्मी सामाजिक-धार्मिक आंदोलन का प्रभाव रहा.
पंजाब में सामाजिक तनाव आमतौर पर उत्तर भारत के अन्य हिस्सों की तरह “ब्राह्मण बनाम दलित” नहीं है, बल्कि जमीन और सत्ता को लेकर जाटों—जो राष्ट्रीय स्तर पर ओबीसी हैं लेकिन स्थानीय रूप से जनरल माने जाते हैं—और दलितों के बीच संघर्ष है.
कुमार, जो बनिया समुदाय से हैं और 30 साल से चंडीगढ़ में रह रहे हैं, कहते हैं, “पंजाब में शायद वैसी खुली और तीखी हिंसा नहीं दिखती जैसी अन्य जगहों पर है, लेकिन यहां भेदभाव टाल दिया जाता है और कई रूपों में सामने आता है.” राज्य में भेदभाव के ये सूक्ष्म तरीके ऐसी कहानियों के लिए उपयुक्त रहे हैं जो गहराई से और बारीकी से समाज को दिखाती हैं, न कि केवल आत्मकथात्मक विस्फोट के रूप में. यहां उत्पीड़न अक्सर छुपे रूप में दिखाई देता है—जैसे सामुदायिक कुओं पर नजरें चुराना, मजदूरी छीन लेना, या विदेश से आने वाले पैसों का असमान बंटवारा.

1970 के दशक से, पंजाबी दलित लेखकों ने जाति को वैसे ही लिखा है जैसा वह जीवन में अनुभव होती है—गांव में शोषण से लेकर शहर में अलगाव तक. अत्तारजीत की बाथलू चामियार एक गांव के चमड़े के काम करने वाले व्यक्ति की कहानी है. मोहन लाल फिल्लौरिया की मोची दा पुट एक ऐसे आदमी की कहानी है जो सरकारी नौकरी में है, लेकिन अपने मोची के बेटे होने की पहचान छुपाने की कोशिश करता है. भगवंत रसूलपुरी की रूट्स में एक आदमी जाति से बचने के लिए बौद्ध धर्म अपनाता है, लेकिन उसे उम्मीद के मुताबिक राहत नहीं मिलती.
गैर-दलित लेखकों के चित्रण से अलग, जैसे गुरदियल सिंह का 1964 का उपन्यास मढ़ी दा दीवा, जिसमें दलितों को निष्क्रिय पीड़ित के रूप में दिखाया गया था, ये आधुनिक कहानियां आंबेडकरवादी सोच और सक्रियता से भरी हुई हैं. ये कहानियां जाति के खिलाफ पुराने प्रतिरोध की परंपराओं से भी जुड़ी हैं—जैसे 17वीं सदी के योद्धा-कवि भाई जैता, जो मजहबी समुदाय से थे और जिनकी रचना श्री गुरु कथा खालसा के जन्म का वर्णन करती है, और 19वीं सदी के ज्ञानी दित्त सिंह, जिन्होंने जाति पाखंड के खिलाफ लेख लिखे.
इतिहासकार और दलित अध्ययन, पंजाबी साहित्य और सिख इतिहास के विशेषज्ञ राजकुमार हंस कहते हैं, “मराठी दलित साहित्य के विपरीत, जो ज्यादातर 20वीं सदी में कठिन परिस्थितियों के जवाब में शुरू हुआ, पंजाबी दलित लेखन का इतिहास काफी लंबा है. पंजाबी दलित कहानियां और कविताएं रोजमर्रा के सूक्ष्म भेदभाव और बड़े सामाजिक बदलाव दोनों को दिखाती हैं, और यह बताती हैं कि समुदाय ने पीढ़ियों से असमानता का सामना कैसे किया है.”
क्या जाति से बचना संभव नहीं?
जालंधर में भगवंत रसूलपुरी के बड़े घर की दूसरी मंजिल पर, पंजाबी किताबों की कतारें हर दीवार को भर देती हैं. वह बताते हैं कि उनकी पत्नी और बेटी भी लेखिका हैं. रसूलपुरी पंजाब के सबसे प्रमुख दलित साहित्यिक आवाज़ों में से एक हैं. उनका रोज़ का काम नवां ज़माना अखबार के रविवार संस्करण का संपादन करना है, लेकिन वह कहानी धारा नाम की एक त्रैमासिक पंजाबी साहित्यिक पत्रिका भी चलाते हैं, जिसे उन्होंने दस साल से भी पहले शुरू किया था. हालांकि, अपने लेखन में ही वह सबसे ज्यादा खुद को महसूस करते हैं.
रसूलपुरी ने 30 साल में छह कहानी संग्रह और एक उपन्यास लिखा है, लेकिन उन्हें व्यापक पहचान हाल ही में मिली है. उनके कलेक्शन डिलीवरी मैन को 2025 का धहान पुरस्कार मिला, जिसके चलते वह कनाडा के सरे गए. इन कहानियों में अकेलापन, विस्थापन और लैंगिक संघर्ष जैसे विषय हैं, जिसमें एक कहानी में तलाकशुदा महिला प्रोफेसर को एक डिलीवरी मैन के साथ सुकून मिलता है. 2017 में, उनकी एक पुरानी कहानी पर प्रशंसित पंजाबी फिल्म चम्म बनाई गई, जो एक दलित बूचड़खाने के कर्मचारी की कहानी है, जो अपने समुदाय की चमड़ा-काम की परंपरा और जाट जमींदारों के दबदबे के बीच फंसा हुआ है. यह फिल्म यह भी दिखाती है कि इस काम से जुड़े कुछ दलित लोग नैतिक कारणों से पैसे के लिए घायल जानवरों को मारने से इनकार करते हैं.

उनके ज्यादातर कामों में एक लगातार सवाल चलता है: क्या कोई इंसान सच में अपनी जड़ों से पूरी तरह निकल सकता है?
रसूलपुरी कहते हैं, “समुदाय आर्थिक, सामाजिक और आध्यात्मिक रूप से बदलते हैं, लेकिन अपनी गहरी पहचान और विरोधाभासों को साथ लेकर चलते हैं.” रूट्स कहानी, जो दोआबा क्षेत्र में आधारित है और गैंग्रीन में शामिल है, में ज्ञान चंद नाम का एक व्यक्ति खुद को पूरी तरह बदलने की कोशिश करता है. वह अपना नाम बदलकर भिक्षु ज्ञान रतन रख लेता है और बौद्ध धर्म अपनाता है, यह मानते हुए कि इससे वह जाति से मुक्त होकर सम्मान पा सकता है. वह बुद्ध विहार बनाता है, लोगों को उपदेश देता है और अपनी नई पहचान में पूरी तरह डूब जाता है. कुछ समय के लिए लगता है कि वह पूरी तरह बदल गया है. लेकिन उसके माता-पिता उसे चुनौती देते हैं. जिस समुदाय को वह प्रेरित करना चाहता था, वही विरोध करता है. और फिर उसकी अपनी आवाज़ उसे धोखा दे देती है. बौद्ध उपदेश देते समय वह आदत से “जय रविदास” बोल देता है. वह दो पहचानों के बीच फंस जाता है, और किसी एक में पूरी तरह शामिल नहीं हो पाता.
रसूलपुरी कहते हैं, “कहानी तब खत्म होती है जब ज्ञान एक बौद्ध किताब खोलता है और उसमें कुछ अनोखा पाता है. उसे उसमें रविदास की तस्वीर मिलती है. उसका अतीत उससे बाहर नहीं है, बल्कि उसके अंदर ही बसा है. यह ऐसी चीज़ है जिसे वह मिटा नहीं सकता.” फिर एक और कहानी है लाइफ स्टोरी ऑफ हमत मसीह मट्टू, जिसमें मुख्य पात्र गांव के भोज में बचा हुआ खाना इकट्ठा करने से लेकर एक राज्य पुरस्कार पाने वाले शिक्षक बनने तक का सफर तय करता है, लेकिन उसे पता चलता है कि उसकी सफलता भी जाति के कलंक को मिटा नहीं सकती.
रसूलपुरी कहते हैं, “उसका नाम ही पीढ़ियों में बदलती पहचान को दिखाता है. ‘रहमत’ उसके मुस्लिम अतीत की ओर इशारा करता है, ‘मसीह’ ईसाई चरण को दर्शाता है, और ‘मट्टू’ उसे उसके दलित मूल से जोड़ता है. उसका जीवन पंजाब के हाशिए पर रहे समुदायों के लंबे और जटिल इतिहास को दिखाता है.”
रसूलपुरी ने अपने परिवार में भी इन कहानियों के रूप देखे हैं. उनका जन्म एक ऐसे पिता के घर हुआ जो मजदूर थे और एक दादा के घर जो मरे हुए जानवरों की खाल उतारने का काम करते थे. समय के साथ, उनके दादा इसी चमड़ा उद्योग में व्यापारी बन गए. शिक्षा, प्रवास और आर्थिक अवसरों ने परिवार के लिए नए रास्ते बनाए.
रसूलपुरी कहते हैं, “लेकिन मैंने देखा कि दलित समुदायों के भीतर भी विभाजन उभरते हैं. जो लोग धन, शिक्षा और ऊंचा दर्जा हासिल कर लेते हैं, वे खुद को दूसरों से अलग करने लगते हैं और कभी-कभी उन लोगों के साथ भेदभाव भी करते हैं जो अभी भी मजदूर हैं.”

जब पहचान पहले पहुंच जाती है
मोहन लाल फिल्लौरिया की नौकरी यूनियन बैंक ऑफ इंडिया में उन्हें देशभर में ले गई — बनारस, लखनऊ, जबलपुर, बॉम्बे, दिल्ली, भोपाल, चंडीगढ़. लेकिन किसी दफ्तर में कदम रखने से पहले ही लोग उनकी जाति, उनके सामाजिक पृष्ठभूमि और उस जगह के बारे में जान लेते थे जो उन्हें एक तय व्यवस्था में पहले से मिल चुकी थी.
“मेरे पहुंचने से पहले मेरी पहचान दफ्तरों में पहुंच जाती थी,” फिल्लौरिया, जो अब सत्तर के दशक में हैं, जालंधर में अपने घर पर चाय पीते हुए याद करते हैं.
रिटायर होने के बाद उन्होंने वकालत की और पांच किताबें लिखीं, लेकिन बैंक में बिताए साल उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण थे. उनकी शुरुआती कहानियों में से एक सरकारी वर्दी 1990 के दशक की शुरुआत में वहीं काम करने के अनुभव से निकली. जब आरक्षण की मांग बढ़ रही थी, दलित कर्मचारी इकट्ठा होकर रुकी हुई पदोन्नति और उन बाधाओं पर चर्चा करते थे जो उन्हें आगे बढ़ने से रोकती थीं.
उन्होंने कहा, “समय के साथ यूनियन बने और उन्होंने मिलकर अपने अधिकारों की मांग की. लेकिन जैसे-जैसे नौकरियों की संख्या कम होती गई, आरक्षण के खिलाफ भावना बढ़ने लगी.” उनका लेखन इन अनुभवों से गहराई से जुड़ा है, खासकर मोची दा पुट (मोची का बेटा) में, जो गैंगरीन में भी शामिल है. यह कहानी एक ऐसे दलित व्यक्ति की है जिसके पास सरकारी नौकरी है और जो सामाजिक रूप से ऊपर उठ चुका है, जहां बहुत कम लोग उसकी असली पृष्ठभूमि जानते हैं. जब उसका पिता उसके साथ रहने आता है और रोज़ एक मोची के पास जाने लगता है, तो बेटा उसे रोकने को कहता है, क्योंकि उसे डर है कि उसकी जाति का पता चल जाएगा. तब पिता उससे सवाल करता है: अपनी ही पहचान पर शर्म क्यों? बाद में कहानी में बेटा खुद को खुलकर मोची का बेटा बताता है.

फिल्लौरिया के लिए यह कहानी छिपाने से लेकर खुलकर स्वीकार करने तक के बदलाव का प्रतीक है.
उन्होंने कहा, “लगभग 2000 के आसपास एक नाटककार ने इसे मंच पर पेश किया, और जल्द ही कई थिएटर समूह इसे करने लगे.”
पंजाबी साहित्य में उनके योगदान के लिए फिल्लौरिया को 2008 में गुरदास राम आलम पुरस्कार और 2019 में केवल विग पुरस्कार से सम्मानित किया गया. उनकी अन्य किताबों में कच्चे मांस, लागी, और मिट्टी के बोझ शामिल हैं.
आज वह जालंधर में एक छोटे, सफेद विला जैसे घर में रहते हैं, जिसके बड़े बगीचे को वह अपने मेहमानों को गर्व से दिखाते हैं. उनकी निजी लाइब्रेरी किताबों से भरी हुई है और थोड़ी धूल भरी भी है, क्योंकि अब वह उनकी देखभाल पूरी तरह नहीं कर पाते. अलमारियों के बीच छोटी छिपकलियां घूमती रहती हैं, लेकिन उन्हें इससे कोई परेशानी नहीं है. नई किताबों के लिए हमेशा जगह रहती है. उनकी बेटी उन्हें अक्सर किताबें भेजती है, जिनमें हाल की दो किताबें हैं — ममता कालिया की आत्मकथा जीते जी इलाहाबाद और नवतेज सरना का उपन्यास क्रिमसन स्प्रिंग, जो जलियांवाला बाग हत्याकांड पर आधारित है.
इन अलमारियों में ऐसी किताबें भी रखी हैं, जिन्होंने उन्हें अपने रोज़मर्रा के भेदभाव और संघर्ष के अनुभवों को एक बड़े सामाजिक संदर्भ में समझने में मदद की — जैसे मराठी लेखक शरणकुमार लिंबाले की आत्मकथात्मक कृति अक्करमाशी. इस शब्द का मतलब होता है ऐसा व्यक्ति जो अपने पिता को नहीं जानता, या ‘आधा जाति’. उन्होंने कहा कि ऐसी कृतियां पंजाब में दलित साहित्यिक आंदोलन के लिए भी आधार बनीं.
उन्होंने कहा, “कोई पहली या आखिरी कहानी नहीं होती.”
ऐसी जमीन जहां सामाजिक ढांचे बदलते हैं
राष्ट्रीय स्तर पर, दलित साहित्य को अक्सर अत्यधिक गरीबी और मजबूत विरोध के दस्तावेज़ के रूप में देखा जाता है, जो ओम प्रकाश वाल्मीकि की जूठन, लक्ष्मण गायकवाड़ की उचाल्या, और शरणकुमार लिंबाले की अक्करमाशी जैसी आत्मकथाओं पर आधारित है.

इसके विपरीत, जैसा कि रसूलपुरी ने 2009 के एक लेख में बताया, पंजाबी दलित साहित्य ने मराठी और हिंदी साहित्य की तरह “तेज और विद्रोही स्वभाव” को काफी हद तक नहीं अपनाया, बल्कि “सूक्ष्म परतों” पर ज्यादा ध्यान दिया. उनका कहना था कि 1980 के बाद ही दलित साहित्य “हिंदी के माध्यम से बड़े पैमाने पर पंजाबी में आया.”
लेकिन पंजाब में जाति का विकास अलग तरीके से हुआ.
भारत के कई हिस्सों के विपरीत, पंजाब में सामाजिक ढांचा कभी सख्त वर्ण व्यवस्था में नहीं बदला. उत्तर-पश्चिमी प्रवेश द्वार होने के कारण यहां व्यापारी, आक्रमणकारी और सूफी संत आते रहे, जिससे एक “खुला” माहौल बना, जहां कोई एक व्यवस्था पूरी तरह हावी नहीं हो सकी.
राजकुमार हंस ने कहा, “पंजाब का दलित साहित्य एक ज्यादा खुले और लचीले सामाजिक माहौल से उभरा, जो गहराई, परतों और जटिलताओं से भरा था.”
सिख परंपरा ने इस खुलेपन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. गुरु नानक और अन्य गुरुओं ने निर्गुण दर्शन को बढ़ावा दिया — जहां ईश्वर निराकार और गुणों से परे है — और जाति के अहंकार को ठुकराया. यहां तक कि क्षत्रिय पृष्ठभूमि से आने वाले गुरुओं ने भी सामाजिक असमानताओं को चुनौती दी, और सिख शिक्षा तथा आदि ग्रंथ जैसे ग्रंथों ने ज्ञान को आम लोगों तक पहुंचाया.
हंस ने कहा, “गुरु गोबिंद सिंह द्वारा खालसा पंथ की स्थापना ने समानता को और मजबूत किया, जहां सभी दीक्षित लोगों ने ‘सिंह’ उपनाम अपनाया, जिससे जाति के भेद मिटाने की कोशिश हुई. इन सामाजिक बदलावों ने शिक्षा और आगे बढ़ने के अवसर दिए, जिससे पंजाबी दलित बुद्धिजीवियों के लिए रास्ता तैयार हुआ.”
फिर भी, इस खुलेपन की एक सीमा थी. जाट, जो पहले किसान समुदाय थे, धीरे-धीरे प्रमुख जमींदार वर्ग बन गए, जबकि निचली जातियों के लोग भूमिहीन खेत मजदूर बने रहे या अपने पारंपरिक पेशों से पहचाने जाते रहे — जैसे चूहड़ा/मजहबी (सफाई कर्मी) और रामदासिया/रविदासिया (चमड़ा काम करने वाले).
1920 के दशक तक, इस अंतर ने आदि धर्म आंदोलन को जन्म दिया. इसे मंगूराम मुगोवालिया ने शुरू किया, जो अमेरिका में गदर पार्टी से जुड़कर वापस आए थे. इस आंदोलन ने यह विचार खारिज किया कि दलित किसी और धर्म के हाशिये पर हैं. मुगोवालिया का कहना था कि दलित इस भूमि के मूल निवासी हैं, जो हिंदू, सिख या इस्लामी ढांचे से स्वतंत्र हैं. 1931 की जनगणना में लगभग पांच लाख लोगों ने खुद को आदि धर्मी के रूप में दर्ज कराया. आंबेडकर के विचारों को अपनाते हुए उन्होंने राजनीतिक रूप से संगठित होकर चुनाव भी लड़े.
इसी माहौल में आंबेडकर 1951 में कानून मंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद पंजाब आए, जहां उन्होंने भाषण दिए और लोगों से संवाद किया.
फिल्लौरिया ने कहा, “इन यात्राओं का गहरा असर पड़ा. उस समय पंजाब, बंगाल और केरल के साथ, राजनीतिक रूप से ज्यादा जागरूक माना जाता था.”

उन्होंने बताया कि यह जागरूकता साहित्य में भी दिखने लगी. दलितों ने अपनी कहानियां खुद, अपनी आवाज़ में बताने का अधिकार जताया. इस दौर में सुजान सिंह एक प्रमुख लेखक थे, जिनकी कहानी संग्रह सब रंग (1949) और नरकां का देवता (1951) पंजाब के शोषित वर्गों की स्थिति को दिखाते हैं.
बाद में, उत्तर प्रदेश में कांशीराम जैसे नेताओं के राजनीतिक आंदोलनों ने पंजाब के दलितों में पहचान की भावना को और मजबूत किया. वहीं, फिल्लौरिया के अनुसार, कई पंजाबी लोग विदेश — जैसे इंग्लैंड, अमेरिका और मध्य पूर्व — गए और वहां से नए विचार लेकर आए, जिनका असर धीरे-धीरे समाज पर पड़ा.
फिल्लौरिया ने कहा, “पहले हम शूद्र थे, फिर अछूत, फिर हरिजन, फिर अनुसूचित जाति, और अब दलित हैं. आगे हमें क्या कहा जाएगा, मुझे नहीं पता.”
लेकिन भाषा की बाधाओं ने पंजाबी साहित्य की पहुंच को सीमित रखा, और प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन ने 1970 के दशक तक उत्तर भारत के साहित्य को वामपंथी सोच की ओर मोड़ा. इस विचारधारा में वर्ग (क्लास) को जाति से ज्यादा महत्व दिया गया, और जाति के मुद्दों को अक्सर आर्थिक क्रांति के मुकाबले कम महत्वपूर्ण माना गया.
फिल्लौरिया ने कहा, “यहां वामपंथ का प्रभाव कम्युनिस्ट पार्टी के जरिए आया, खासकर पश्चिम बंगाल जैसे स्थानों से. रूसी विचारधारा से प्रभावित होकर उन्होंने कहा कि केवल वर्ग मायने रखता है, जाति नहीं. लेकिन यहां सच्चाई अलग है — जाति अभी भी बहुत महत्वपूर्ण है. चाहे आप समाज को वर्ग के नजरिए से कितना भी समझें, जाति बार-बार सामने आ ही जाती है.”

हाशिए की आवाज़ें
जसवीर बेगमपुरी, 58 साल के, 2001 से अपने गांव बेगमपुर में पंजाबी साहित्य से भरी एक किताबों की दुकान चला रहे हैं. उनके अनुसार, इतनी समृद्धि के बावजूद दलित कहानियां ज्यादा नहीं बिकतीं.
उन्होंने कहा, “जब बात दलित साहित्य की आती है, तो कहानियां उतनी नहीं बिकतीं. ज्यादा बिकती हैं आत्मकथाएं और डॉ. आंबेडकर, ज्योतिबा फुले जैसे बड़े व्यक्तियों की रचनाएं. पाठक उनके मूल लेखन और जीवन कहानियों में ज्यादा रुचि रखते हैं,” बेगमपुरी, जो खुद भी एक उत्साही पाठक हैं, ने कहा.
कहानी साहित्य तभी थोड़ा चलता है जब वह किसी ऐतिहासिक सच्चाई से जुड़ा हो, जैसे बलबीर मधोपुरी का उपन्यास मिट्टी बोल पाए, जो मंगू राम के जीवन पर आधारित है. इसके अलावा, मांग लगभग पूरी तरह से एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट या वेटिंग फ़ॉर अ वीज़ा जैसी मूल किताबों के लिए ही रहती है.
गैंगरीन के जरिए अक्षय कुमार और नवदीप सिंह इस अंतर को कम करना चाहते हैं और कहानियों को उनका सही स्थान दिलाना चाहते हैं.
कुमार ने कहा, “हम पंजाबी दलित लेखकों के काम का अनुवाद करना चाहते थे और उन्हें एक बड़े प्रकाशक के माध्यम से पूरे देश के पाठकों तक पहुंचाना चाहते थे. पंजाबी दलित साहित्य के अंदर भी इन कहानियों को जगह पाने में मुश्किल होती है. फिर भी यह काम बहुत समृद्ध और मजबूत है, जिसे ज्यादा लोगों तक पहुंचना चाहिए.”
किताबों की दुकानों में आत्मकथाओं के हिस्से में भी पंजाबी दलित लेखन बहुत कम मिलता है. कुमार के अनुसार, ऐसी किताबें एक दर्जन से भी कम हैं, और इनमें से कोई भी किसी दलित महिला द्वारा लिखी नहीं गई है. उन्होंने यह भी बताया कि पंजाब में लंबे समय तक प्रगतिशील लेखकों का दबदबा रहा है, और उन्होंने अक्सर दलित लेखन को अलग पहचान देने से परहेज किया, उसे एक “एकीकृत” परंपरा के तहत ही देखा.

इसका मतलब यह हुआ कि जाति के बदलते रूपों को दिखाने वाली कहानियों को पहचान मिलने में मुश्किल हुई — खासकर नई कहानियां जो शहरों में आधारित हैं, जहां माना जाता था कि जाति खत्म हो जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
उन्होंने कहा, “शुरुआती पंजाबी दलित कहानियां अक्सर गांव के जीवन पर आधारित थीं, जिनमें ग्रामीण सच्चाइयों और कृषि संघर्षों को दिखाया जाता था. लेकिन नए लेखक अब फैक्ट्री में काम, प्रवास और शहरों के जीवन जैसे अनुभवों को भी लिख रहे हैं.”
आस्था, डर और कहानी
भारत के कुछ हिस्सों में, किसी दलित आदमी का अपनी शादी में घोड़ी पर चढ़ना या सिर्फ अपनी मजदूरी मांगना भी खतरनाक हो सकता है. लेकिन पंजाब में जाति और उससे जुड़ी हिंसा ज्यादा छुपी हुई होती है.
कुमार ने कहा, “पंजाब में कई बार एक ही सरनेम अलग-अलग जातियों में इस्तेमाल होता है. जैसे ‘सिद्धू’ नाम, जो ऊंची जातियों और दलित समुदाय दोनों में पाया जाता है. इससे एक तरह की अस्पष्टता बनती है—किसी की जाति तुरंत पहचान में नहीं आती.”
ऊपर से यह बराबरी जैसा लगता है, लेकिन अंदर ही अंदर जाति व्यवस्था मजबूत बनी रहती है. सिख धर्म के अंदर भी अलग-अलग समुदायों के लिए अलग गुरुद्वारे होते हैं और धर्म परिवर्तन भी कोई पक्का रास्ता नहीं है.
कुमार ने कहा, “ईसाई या इस्लाम धर्म अपनाने से भी जाति की पहचान खत्म नहीं होती. बल्कि यह नए रूप में नए धर्मों के भीतर भी बनी रहती है.”

जाति का यह असर, जो रोजमर्रा की जिंदगी में—यहां तक कि धर्म और प्रेम में भी—दिखाई देता है, पंजाबी दलित कहानियों की मुख्य ताकत है.
अत्तारजीत की कहानी गैंगरीन में, जगतार मास्टर नाम का एक स्कूल शिक्षक परमजीत, जिस महिला से वह प्यार करता है, पर बेवफाई का आरोप लगाता है—लेकिन बाद में उसे समझ आता है कि जाति और परिवार के दबाव ने उसे ऐसा करने पर मजबूर किया. जैसे-जैसे उसकी दुनिया बिखरती है, वह अपने आसपास की पाखंड और “एक पिता एकस के हम बारिक” (हम सब एक ही पिता की संतान हैं) और “राणा रंक बराबरी” (राजा और भिखारी बराबर हैं) जैसे उपदेशों की खोखली सच्चाई को समझने लगता है.

इसके बाद वह अपने पुराने विश्वासों को ठुकराने लगता है और अपने धर्म के प्रतीकों को हटा देता है. समाज उसे अलग कर देता है, उसे पागल कहा जाता है और आखिर में उसे उसकी नौकरी से निलंबित कर दिया जाता है.
अंतिम दृश्य में, जगतार एक दीपक के पास छिपकलियों को देखता है, जो एक पतंगे का इंतजार कर रही हैं. वह छिपकलियों पर एक डंडा फेंकता है और वे छत के एक छेद में भाग जाती हैं, लेकिन उनमें से एक की पूंछ टूटकर गिर जाती है. फिर वह देखता है कि चींटियां उस पूंछ को खींचकर ले जा रही हैं, और उसे अचानक कुछ समझ आता है.
वह बार-बार कहता है, “परमजीत बेवफा नहीं थी… यह इस गैंग्रीन ने उसे ऐसा करने पर मजबूर किया. यह गैंग्रीन, यह पतंगा और यह छिपकली…” यहां ‘गैंग्रीन’ शरीर की बीमारी नहीं, बल्कि उस समाज की सड़न है जो खुद को बराबरी वाला कहता है.
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