‘वन नेशन वन इलेक्शन’ पर बहस, जो आजादी के बाद सबसे बड़ा चुनाव सुधार माना जा रहा है, पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फिर से शुरू की.
बीजेपी के 47वें स्थापना दिवस पर कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए पीएम ने कहा कि “आज देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड और वन नेशन वन इलेक्शन जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा हो रही है और इस दिशा में काफी प्रगति हो रही है.”
यह ध्यान देने वाली बात है कि पीएम मोदी ने वन नेशन वन इलेक्शन को बीजेपी के मुख्य वैचारिक मुद्दों जैसे यूनिफॉर्म सिविल कोड, नागरिकता संशोधन कानून, राम मंदिर का निर्माण, ट्रिपल तलाक पर प्रतिबंध आदि के साथ रखा. इन बातों से लगता है कि बीजेपी सरकार अपने वैचारिक मुद्दों पर मजबूती से कायम रहेगी और साथ ही शासन और सुधार के दूसरे मुद्दों पर भी काम करेगी.
विचारधारा और सुधार को साथ लाना
बड़े राष्ट्रीय सुधारों के एजेंडे को अपनी विचारधारा के साथ जोड़कर पीएम मोदी यह समझते हैं कि कोई भी राजनीतिक पार्टी विचारधारा से चलती है, लेकिन उसे आगे बढ़ने के लिए ऐसे विचारों की जरूरत होती है जो राष्ट्रीय हित को सबसे ऊपर रखें.
पीएम का हालिया बयान उस समय आया है जब सितंबर 2023 में राम नाथ कोविंद की अध्यक्षता में समिति बनने और उसके बाद दिसंबर 2024 में लोकसभा में संविधान (129वां संशोधन) बिल 2024 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) बिल 2024 पेश किए जाने के बाद कुछ समय तक इस मुद्दे पर शांति थी. इन दोनों बिलों को संयुक्त संसदीय समिति को भेजा गया था.
कुछ लोग जो इस योजना पर शक करते हैं, उनका कहना है कि यह सिर्फ एक कोशिश है जो आगे नहीं बढ़ेगी. वे कहते हैं कि संविधान संशोधन की मुश्किल प्रक्रिया, राजनीतिक सहमति की कमी, जनगणना और परिसीमन से इसका जुड़ना, और 2034 में लागू होने की योजना जैसी वजहों से यह आगे नहीं बढ़ पाएगा.
लेकिन ऐसे लोग कम से कम दो बातों को समझने में चूक जाते हैं. पहली, यह समझना कि मोदी सरकार के लिए वन नेशन वन इलेक्शन इतना अहम क्यों है. दूसरी, वे यह भी कम आंकते हैं कि मोदी सरकार अपने मुख्य एजेंडे को पूरा करने के लिए मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और कड़े फैसले लेने की क्षमता रखती है.
इतिहास को सुधारना
सबसे पहले, वन नेशन वन इलेक्शन का प्रस्ताव एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ आता है, जिसे बीजेपी सरकार एक मौके के रूप में देखती है.
आम धारणा के विपरीत, भारत में एक साथ चुनाव कराने का विचार नया नहीं है. जब आजाद भारत के निर्माताओं ने संसदीय व्यवस्था और संघीय ढांचे को अपनाया, तब एक साथ चुनाव अपने आप ही व्यवस्था का हिस्सा बन गया था. यही कारण है कि 1951-52, 1957, 1962 और 1967 के शुरुआती आम चुनाव ज्यादातर राज्यों के विधानसभा चुनावों के साथ हुए थे.
लेकिन इस व्यवस्था में एक समस्या थी. लोकसभा और राज्य विधानसभा दोनों का कार्यकाल तय पांच साल का नहीं होता, क्योंकि इन्हें पहले भी भंग किया जा सकता है.
1967 के बाद यह पैटर्न बदलने लगा, जब कांग्रेस पार्टी कई राज्यों में चुनाव हार गई. इसके बाद दल बदल और कई राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाने की वजह से राज्यों की विधानसभाओं और संसद के चुनाव अलग-अलग समय पर होने लगे.
1971 में इंदिरा गांधी द्वारा समय से पहले चुनाव कराना और 1975 से 1977 के बीच लगाए गए आपातकाल, जिसमें लोकसभा का कार्यकाल पांच साल से ज्यादा बढ़ा दिया गया, ने इस व्यवस्था को पूरी तरह अलग कर दिया.
आज भी कुछ राज्यों जैसे अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, आंध्र प्रदेश और ओडिशा में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ हो जाते हैं, लेकिन यह योजना के तहत नहीं बल्कि संयोग से होता है. इसलिए आज एक साथ चुनाव अपवाद है, नियम नहीं. इसी वजह से आज देश में अलग-अलग समय पर चुनाव होने की व्यवस्था चल रही है.
इस पृष्ठभूमि में, वन नेशन वन इलेक्शन को आगे बढ़ाकर पीएम मोदी उसी मूल संवैधानिक व्यवस्था को वापस लाना चाहते हैं, जिसे आपातकाल और राष्ट्रपति शासन के ज्यादा इस्तेमाल से कांग्रेस ने बिगाड़ दिया था.
बड़े फैसलों की इच्छा
समय-समय पर कई संस्थाओं ने एक साथ चुनाव कराने के विचार को फिर से शुरू करने की बात कही है. चुनाव आयोग ने 1982 में, विधि आयोग ने 1999 और 2018 में, संसद की स्थायी समिति ने 2015 में, नीति आयोग ने 2017 में और सबसे हाल में सितंबर 2023 में राम नाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय समिति ने इस पर सुझाव दिए. अटल बिहारी वाजपेयी ने 2003 तक विपक्ष के साथ इस पर काम किया और एलके आडवाणी ने 2010 तक इसे आगे बढ़ाया.
इन सभी कोशिशों में यह चिंता जताई गई कि भारत में लगातार चुनाव होने से शासन प्रभावित होता है, सरकारी संसाधनों पर ज्यादा बोझ पड़ता है और कई तरह की असक्षमताएं पैदा होती हैं. मोदी सरकार की एक खास पहचान यह रही है कि उसने ऐसे बड़े फैसले लेने की इच्छा दिखाई है, जिन पर पहले की सरकारें या तो कदम नहीं उठाना चाहती थीं या बार-बार कोशिश के बावजूद उन्हें हल नहीं कर पाईं. इसलिए वन नेशन वन इलेक्शन इस सोच में फिट बैठता है कि “मोदी है तो मुमकिन है”.
पिछले साल कार्नेगी एंडोमेंट के एक पेपर में बताया गया कि पीएम मोदी के नेतृत्व में एक खास पैटर्न देखा गया है, जिसमें कई अलग-अलग समस्याओं के लिए एक जैसे समाधान लागू करने की कोशिश की जाती है. ‘वन नेशन’ नीतियों का उद्देश्य भारत की आर्थिक और प्रशासनिक व्यवस्था को एक जैसा बनाकर बेहतर तालमेल और कार्यक्षमता लाना है, ताकि 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य हासिल किया जा सके.
इन नीतियों में ‘वन नेशन वन टैक्स’ यानी वस्तु एवं सेवा कर शामिल है, जिससे एक समान टैक्स व्यवस्था बनी. ‘वन नेशन वन सब्सक्रिप्शन’ जिससे अंतरराष्ट्रीय जर्नल्स तक पहुंच मिले. और ‘वन नेशन वन राशन कार्ड’ जिससे सस्ती दर पर अनाज मिल सके. इनका उद्देश्य अलग-अलग व्यवस्थाओं को खत्म करना है और ये एक अच्छी शुरुआत मानी जा रही हैं. वन नेशन वन इलेक्शन को इन सभी नीतियों का सबसे जरूरी हिस्सा माना जा रहा है, जिसे लागू करने के लिए सरकार पूरी ताकत लगा सकती है.
जैसे-जैसे इस मुद्दे पर चर्चा बढ़ेगी, इतने बड़े सुधार के लिए जरूरी है कि जनता की भागीदारी और सहमति बनाई जाए. यह काम संविधान की भावना के अनुसार होना चाहिए, क्योंकि इसमें संघीय संतुलन, राज्यों की स्वायत्तता और भारत के लोकतंत्र की दिशा जैसे अहम सवाल जुड़े हुए हैं.
तारिक़ मंसूर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व वाइस चांसलर और उत्तर प्रदेश विधान परिषद के मनोनीत सदस्य हैं. वे X पर @ProfTariqManso1 पर पोस्ट करते हैं. विचार निजी हैं.
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