पिछले दो हफ्तों से ज्यादा समय से, अमेरिका और इज़रायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद यह संघर्ष करीब 20 देशों तक फैल चुका है. इसके कारण न सिर्फ हज़ारों लोगों की जान गई है, बल्कि तेल और गैस के बड़े भंडार भी नष्ट हो गए हैं और भारी संपत्ति का नुकसान हुआ है.
इसके अलावा, समुद्री शिपिंग के अहम रास्तों में रुकावट के कारण पूरी दुनिया में तेल और गैस की कीमतें तेज़ी से बढ़ रही हैं. वैश्विक एजेंसियों के अनुसार, यह युद्ध दुनिया में महंगाई, गरीबी और खाद्य असुरक्षा को तेज़ी से बढ़ा सकता है. सप्लाई चेन में लगातार रुकावट, शिपिंग लागत बढ़ना और ज़रूरी सामान की कमी से दुनिया में सप्लाई शॉक आ सकता है, जिससे अर्थव्यवस्थाएं अस्थिर होकर मंदी में जा सकती हैं और देशों के बीच युद्ध का सबसे बड़ा नुकसान दुनिया के आम लोगों को ही होता है.
ऐसा माना जाता है कि मौजूदा संघर्ष के पीछे तेल भंडार पर नियंत्रण हासिल करने की अमेरिका की महत्वाकांक्षा है. शुरुआत में यह कहा गया था कि ईरान परमाणु हथियार बना रहा था, जिससे अमेरिका और दुनिया की शांति को खतरा हो सकता था, लेकिन अब अमेरिका प्रशासन के कुछ सदस्य कह रहे हैं कि अमेरिका ने बिना उचित कारण के यह युद्ध शुरू किया.
वे दरअसल इस संघर्ष को भड़काने के लिए इजराइल को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. हालांकि यह समझना जरूरी है कि पहले वेनेजुएला के राष्ट्रपति की गिरफ्तारी और उन्हें अमेरिका भेजना, और अब ईरान पर हमला—विशेषज्ञ इन घटनाओं को दुनिया के तेल भंडार पर नियंत्रण पाने की अमेरिका की कोशिश के रूप में देखते हैं. अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, इससे पहले अमेरिका इराक में शासन परिवर्तन के बाद वहां के तेल संसाधनों पर प्रभावी नियंत्रण हासिल कर चुका है. इस तरह वैश्विक स्तर पर दबदबा बनाने के लिए युद्ध करना उचित नहीं माना जाता.
महंगाई का खतरा
आमतौर पर हर युद्ध महंगाई बढ़ाने का कारण बनता है, लेकिन इस संघर्ष में खाड़ी देश शामिल हैं, जो दुनिया की ज्यादातर कच्चे तेल और गैस की जरूरत पूरी करते हैं, इसलिए ऊर्जा की कीमतें बढ़ने से महंगाई और तेजी से बढ़ती है. इसके अलावा समुद्री व्यापार के रास्तों में रुकावट के कारण सामान और कच्चे माल की कमी भी महंगाई बढ़ाती है.
जैसे-जैसे युद्ध लंबा खिंचता है, यह समस्या और गंभीर होती जाती है. महंगाई से लोगों की खरीदने की क्षमता कम हो जाती है, ज़रूरी सामान की कमी होती है और सरकारों की इन खर्चों को संभालने की क्षमता भी कम हो जाती है, जिससे सामाजिक अशांति का खतरा बढ़ता है.
यह साफ है कि युद्ध की वजह से बढ़ती महंगाई और जरूरी सामान की कमी का सीधा असर आम आदमी पर पड़ता है. इसके अलावा सामाजिक अशांति भी होगी, जिसका असर आम लोगों पर ही पड़ेगा.
वित्तीय बाजार में उथल-पुथल
युद्ध के समय निवेशक सुरक्षित निवेश को प्राथमिकता देते हैं. कारोबार को लेकर भरोसा कम हो जाता है और अनिश्चितता बढ़ जाती है. इसलिए लोग शेयर और बॉन्ड में निवेश करने की बजाय सोना जैसी कीमती धातुएं ज्यादा खरीदने लगते हैं. इससे शेयर बाजार गिरने लगते हैं.
भारत के संदर्भ में, संघर्ष शुरू होने के बाद से बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) का सेंसेक्स 7 प्रतिशत से ज्यादा गिर चुका है. इसी तरह की स्थिति वैश्विक बाज़ारों में भी देखी जा रही है. शेयर बाजार में गिरावट का सीधा असर आम लोगों पर पड़ता है. एक तरफ उनके निवेश की कीमत कम हो जाती है, दूसरी तरफ बाजार में लगे पेंशन फंड की वैल्यू भी घट जाती है.
अर्थव्यवस्था पर युद्ध का असर
युद्ध का असर भारत जैसे विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था पर इस तरह पड़ता है. सबसे पहले, तेल की कीमत बढ़ने से विदेशी मुद्रा का ज्यादा खर्च होता है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार कम होता है.
दूसरा, आयात बिल बढ़ने और विदेशी निवेशकों द्वारा पूंजी निकालने से स्थानीय मुद्रा की कीमत गिरती है. ध्यान देने वाली बात है कि पिछले तीन हफ्तों के संघर्ष के दौरान भारतीय मुद्रा की कीमत अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 3.0 प्रतिशत गिर चुकी है और यह गिरावट जारी है.
तीसरा, महंगाई को कम करने के लिए सरकार को ऊर्जा, खाद्य पदार्थ और उर्वरक पर ज्यादा सब्सिडी देनी पड़ती है या टैक्स कम करना पड़ता है. इससे सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ता है, जिसका असर अंततः महंगाई पर पड़ता है और इसका भार नागरिकों को उठाना पड़ता है.
इसका असर सिर्फ विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर ही नहीं पड़ेगा, बल्कि कोई भी देश इससे अछूता नहीं रहेगा. अमेरिका में भी निकट भविष्य में गंभीर आर्थिक मंदी की आशंका जताई जा रही है. अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडीज के अनुसार, अगले 12 महीनों में अमेरिका में मंदी आने की 49 प्रतिशत संभावना है और इसे टालना मुश्किल होगा.
इस अनुमान के पीछे तेल की बढ़ती कीमतें और युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों में आई रुकावट को कारण बताया गया है. एक तरफ रोजगार के बिना आर्थिक विकास और दूसरी तरफ युद्ध के कारण बढ़ती कीमतें — इन हालात में अमेरिका में मंदी लगभग तय मानी जा रही है.
खाद्य सुरक्षा पर खतरा
दुनिया में खाद्य उत्पादन सभी देशों में समान नहीं है—हर देश अपनी खाद्य जरूरतें खुद पूरी नहीं कर सकता. ऐसे देशों को खाद्य निर्यात करने वाले देशों से आयात पर निर्भर रहना पड़ता है. युद्ध के कारण सामान की आवाजाही रुकती है, जिससे ऐसे देशों में खाद्य संकट पैदा हो सकता है.
हालांकि भारत अपनी खाद्य जरूरतों के मामले में काफी हद तक आत्मनिर्भर है, लेकिन फिर भी कुछ चीजों, खासकर खाने के तेल और दालों के लिए आयात पर निर्भर है. इन चीजों की कीमत बढ़ने से आम लोगों के जीवन पर नकारात्मक असर पड़ सकता है.
विकास पर नकारात्मक असर
लंबे समय में युद्ध से व्यापार में रुकावट आती है और अनिश्चितता बढ़ती है, जिससे निवेश कम होता है और दुनिया की जीडीपी वृद्धि धीमी पड़ जाती है. दूसरा, युद्ध और युद्ध के बाद दोबारा निर्माण पर ज्यादा खर्च होने के कारण सरकारों को ज्यादा कर्ज लेना पड़ता है, जिससे सरकारी कर्ज बढ़ता है और भविष्य में वित्तीय दबाव पैदा होता है.
तीसरा, युद्ध तकनीकी विकास की दिशा को रक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों की तरफ मोड़ देता है. इससे इन क्षेत्रों में नवाचार बढ़ सकता है, लेकिन साथ ही सामाजिक और विकास से जुड़े क्षेत्रों से संसाधन हटाने पड़ते हैं. कुल मिलाकर, आर्थिक प्राथमिकताएं बदलने से युद्ध संतुलित और टिकाऊ वैश्विक विकास की संभावनाओं को कमजोर कर सकता है.
आज जरूरत है कि दुनिया में शांति बहाल की जाए और विकास को रुकने न दिया जाए. कोविड के बाद दुनिया की आर्थिक वृद्धि दर लगभग 2.5 प्रतिशत से 3.0 प्रतिशत के आसपास है, जो कोविड से पहले के 3.5 प्रतिशत से 4.0 प्रतिशत के स्तर तक नहीं पहुंच पाई है.
अनुमान है कि जारी संघर्षों के कारण वैश्विक आर्थिक वृद्धि दर में 0.2 प्रतिशत से 1.0 प्रतिशत तक और गिरावट आ सकती है.
युद्ध के गंभीर नुकसान — एक तरफ जान और संपत्ति का नुकसान, और दूसरी तरफ आम लोगों के लिए घटती विकास दर, महंगाई, बेरोजगारी और खाद्य असुरक्षा — इन सबको देखते हुए यह स्थिति किसी भी तरह दुनिया के लिए अच्छी नहीं मानी जा सकती. दुनिया के सभी देशों को इन संघर्षों को खत्म करने के लिए और ज्यादा प्रयास करने चाहिए.
अश्वनी महाजन दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजीडीएवी कॉलेज में प्रोफेसर हैं. उनका एक्स हैंडल @ashvani_mahajan है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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