ravi kishan
रवि किशन के साथ योगी आदित्यनाथ/ रवि किशन फेसबुक
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लखनऊ/गोरखपुर: यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ का गढ़ कही जाने वाली गोरखपुर सीट पर बीजेपी ने इस बार किसी नेता को टिकट देने के बजाए अभिनेता पर दांव लगाया है. अभिनेता रवि किशन बीजेपी के टिकट पर गोरखपुर से ताल ठोकेंगे. इस सीट पर उम्मीदवार फाइनल करने को लेकर पिछले काफी दिनों से कयास लगाए जा रहे थे, जिन पर अब जाकर ब्रेक लगा है.

यूपी के सियासी गलियारों में अब चर्चा ये है कि आखिर इतनी माथापच्ची के बाद बीजेपी ने रवि किशन पर दांव क्यों लगाया. इसके कई अहम कारण सामने आ रहे हैं. भाजपा से जुड़े सूत्रों की मानें तो गोरखपुर संगठन में बिखराव न हो इस कारण बाहर के कैंडिडेट को टिकट दिया गया. पिछले साल उपचुनाव में मिली हार का कारण संगठन में बिखराव बताया जा रहा था .इसी कारण इस बार पार्टी किसी हाई प्रोफाइल चेहरे पर ही दांव लगाना चाहती थी. उपचुनाव में उम्मीदवार के चयन को लेकर काफी गुटबाजी हुई थी जिसे दूर रखने के लिए बीजेपी ने रवि किशन पर दांव लगाया है.

योगी को भी मिला था दोबारा लड़ने का ऑफर

सूत्रों की मानें तो सीएम योगी को गोरखपुर से चुनाव लड़ने का ऑफर था लेकिन अभी वह सीएम की गद्दी छोड़ने के पक्ष में नहीं हैं. उन्होंने आलाकमान तक अपना यही संदेश पहुंचा दिया. वहीं रवि किशन बीजेपी ज्वाइन करने बाद टिकट की जुगाड़ में लगे हुए थे. पिछले साल गोरखपुर से समाजवादी पार्टी के टिकट पर गोरखपुर सीट से लोकसभा उपचुनाव जीतने वाले प्रवीण निषाद हाल ही में बीजेपी में शामिल हुए थे. लेकिन बीजेपी ने उन्हें गोरखपुर से टिकट ना देकर भोजपुरी स्टार रवि किशन को टिकट दिया.

रवि किशन के लिए राजनीति नई नहीं

रवि किशन का सियासत से पुराना नाता रहा है. 2014 लोकसभा चुनाव में रवि किशन कांग्रेस के टिकट पर अपने गृह जनपद जौनपुर की लोकसभा सीट से चुनाव लड़ चुके हैं. हालांकि, तब वह हार गए थे. फिर, रवि किशन ने 2017 में कांग्रेस का हाथ छोड़ कर भाजपा का कमल हाथ में थाम लिया. बता दें कि रवि किशन का पूरा नाम रवि किशन शुक्ला है. उनका जन्म 17 जुलाई 1969 को हुआ था. रवि किशन भोजपुरी फिल्मों के अलावा बॉलीवुड और साउथ की फिल्मों में भी नज़र आते हैं.

क्या हैं जातीय समीकरण

गोरखपुर लोकसभा सीट में सबसे ज्यादा निषाद मतदाता हैं. इनकी संख्या लगभग 4 लाख है. इस सीट पर करीब 1 लाख 50 हजार मुस्लिम मतदाता हैं. ब्राह्मण मतदाता इस सीट पर 1 लाख 50 हजार हैं और राजपूत मतदाओं की संख्या 1 लाख 30 हजार हैं. यादव 1 लाख 60 हजार और 1 लाख 40 हजार सैंथवार मतदाता हैं. वैश्य और भूमिहार मतदाताओं की संख्या यहां 1 लाख के आस-पास है. निषाद पार्टी के समर्थन के ऐलान के बाद जातिगत समीकरणों को ध्यान में रखते हुए बीजेपी ने रवि किशन को उतारा है.

इस सीट पर मठ का दबदबा

इस सीट पर गोरक्षपीठ का हमेशा से दबदबा रहा है. 65 सालों में गोरखनाथ मंदिर से जुड़े 3 लोगों ने 32 साल तक लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व किया है. 1962 के लोकसभा चुनाव में ही गोरखनाथ मंदिर ने चुनावी अखाड़े में अपनी दस्तक दी और तब से इस सीट पर गोरखनाथ मंदिर के तीन महंत 10 बार सांसद बन चुके हैं. इस सीट पर महंत दिग्विजय नाथ 1 बार, महंत अवैद्यनाथ 4 बार और योगी आदित्यनाथ 5 बार सांसद रह चुके हैं. पहली बार 1967 में गोरक्षपीठ के महंत दिग्विजय नाथ ने निर्दलीय चुनाव लड़कर इस सीट से कांग्रेस का सफाया कर दिया था.

1969 में दिग्विजय नाथ का निधन हो गया और 1970 में यहां उपचुनाव हुए. इस उपचुनाव में दिग्विजय नाथ के उत्तराधिकारी और गोरक्षपीठ के तत्कालीन महंत अवैद्यनाथ ने निर्दलीय चुनाव लड़ा और सांसद चुने गए. हिंदू महसभा के टिकट पर अवैद्यनाथ दूसरी बार भी सांसद बनें.

इसके बाद अवैद्यनाथ 1989, 1991 और 1996 में भी गोरखपुर से बीजेपी के टिकट पर जीते. साल 1998 में अवैद्यनाथ के उत्तराधिकारी युवा योगी आदित्यनाथ पहली बार सांसद बनें. तब योगी सबसे कम उम्र के सासंद थें. 1999, 2004, 2009 और 2014 में लगातार पांच बार योगी गोरखपुर के बीजेपी के टिकट पर सांसद चुने गए.

रवि किशन की राह नहीं आसान

जौनपुर के रहने वाले रवि किशन की राह गोरखपुर में इतनी भी आसान नहीं दिखती. उन्हें वहां निषाद पार्टी का समर्थन तो मिलेगा लेकिन विपक्ष की तैयारियां भी मजबूत दिखती हैं. सपा-बसपा गठबंधन ने रामभुआल निषाद को टिकट दिया है. वहीं कांग्रेस ने अभी टिकट की घोषणा नहीं की है. कांग्रेस बीजेपी के वोट बैंक में सेंधमारी के प्रयास में है. इसी को ध्यान में रखते हुए अपना कैंडिडेट उतारेगी. रवि किशन का अभिनेता होना उनकी लोकप्रियता को तो बढ़ाता लेकिन चुनावी अखाड़े में नेता बनकर ही लड़ी जाती है. इसका अंदाजा रवि किशन को भी होगा.

योगी ने एक तीर से साधे कई निशाने

रवि किशन को टिकट मिलने से योगी ने भी एक तीर से कई निशाने साधे हैं. भाजपा से जुड़े सूत्रों की मानें तो अभिनेता को टिकट दिलाने में सीएम योगी आदित्यनाथ का अहम रोल रहा है. वह जीतें या हारें योगी की अपने गढ़ में पकड़ मजबूत रहेगी. रवि किशन जीतेंगे तो भी योगी की मदद से जीतेंगे और हारेंगे तो दोष योगी पर नहीं आएगा. कह दिया जाएगा की रवि किशन को लड़ाने का फैसला गलत साबित हुआ. वहीं इससे कोई दूसरा लोकल लीडर भी नहीं उभर पाएगा.


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