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Saturday, 30 May, 2026
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चीन, सुरक्षा और कनेक्टिविटी: क्यों भारत म्यांमार को नजरअंदाज नहीं कर सकता

सत्ता संभालने के बाद मिन आंग ह्लाइंग अपनी पहली विदेश यात्रा पर निकले हैं. विश्लेषकों का कहना है कि भारत की म्यांमार नीति सुरक्षा, कनेक्टिविटी और चीन से जुड़ी चिंताओं, आदि पर आधारित है.

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नई दिल्ली: म्यांमार के सेना प्रमुख से राष्ट्रपति बने मिन आंग ह्लाइंग शनिवार को राष्ट्रपति बनने के बाद अपनी पहली आधिकारिक विदेश यात्रा पर भारत पहुंचे. यह दौरा उस हकीकत को दिखाता है जिसने दशकों से म्यांमार को लेकर नई दिल्ली की नीति को आकार दिया है. भारत के लिए राजनीतिक व्यवस्था से ज्यादा रणनीतिक भूगोल मायने रखता है.

कई पश्चिमी देशों के लिए मिन आंग ह्लाइंग अब भी एक विवादित नेता हैं. पूर्व सेना प्रमुख ने 2021 में तख्तापलट कर सत्ता पर कब्जा किया था, इसके बाद देश में भीषण गृह संघर्ष हुआ. अब वह ऐसी सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं, जिसके तहत अप्रैल में हुए चुनावों पर विपक्षी समूहों और अंतरराष्ट्रीय आलोचकों ने गंभीर सवाल उठाए हैं.

इसके बावजूद दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत ने उनके नए राष्ट्रपति पद संभालने के बाद सबसे पहले उन्हें आधिकारिक मेजबानी देने का फैसला किया है.

विश्लेषकों और विशेषज्ञों के मुताबिक, पांच दिन के इस दौरे में बोधगया की तीर्थ यात्रा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ प्रस्तावित बातचीत शामिल है. यह म्यांमार को लेकर भारत की लंबे समय से चली आ रही नीति को दर्शाता है. यानी नेपीडॉ में चाहे जो भी सरकार हो, भारत उससे संबंध बनाए रखता है, अंतरराष्ट्रीय राय चाहे जो भी हो.

म्यांमार में भारत के पूर्व राजदूत और गेटवे हाउस के विशिष्ट फेलो राजीव भाटिया ने दिप्रिंट से कहा, “यह म्यांमार के लिए बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि है. विवादित परिस्थितियों में चुने गए नए राष्ट्रपति की यह पहली द्विपक्षीय विदेश यात्रा है. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और हमारे लोकप्रिय तथा करिश्माई प्रधानमंत्री द्वारा उनका स्वागत किया जाना म्यांमार और पूरे क्षेत्र में सकारात्मक रूप से देखा जाएगा. उम्मीद है कि इससे भविष्य में दूसरे देशों के म्यांमार के साथ संबंधों को लेकर फैसलों पर भी असर पड़ेगा.”

उन्होंने कहा कि भारत म्यांमार के लिए महत्वपूर्ण है और म्यांमार भारत के लिए महत्वपूर्ण है.

उन्होंने कहा, “यह एकतरफा रिश्ता नहीं है, बल्कि पारस्परिक लाभ पर आधारित संबंध है.”

सैन्य सरकार के साथ भारत के सावधानीपूर्ण संबंधों के कारण 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वरिष्ठ जनरल मिन आंग ह्लाइंग के बीच कम से कम दो द्विपक्षीय मुलाकातें हो चुकी हैं. ये मुलाकातें BIMSTEC (बे ऑफ बंगाल इनिशिएटिव फॉर मल्टी-सेक्टोरल टेक्निकल एंड इकोनॉमिक कोऑपरेशन) और SCO (शंघाई सहयोग संगठन) शिखर सम्मेलनों के दौरान हुई थीं.

कुछ अन्य विशेषज्ञों ने कहा कि भारत और म्यांमार के बीच कूटनीतिक संपर्क हमेशा से जारी रहे हैं.

भारत के विदेश मंत्रालय में पूर्व सचिव (पूर्व) रहे जयदीप मजूमदार ने इस यात्रा को “एक साहसिक कूटनीतिक कदम” बताया.

सबसे बड़ी डेमोक्रेसी और हमारे प्रधानमंत्री जैसे पॉपुलर, करिश्माई लीडर का स्वागत म्यांमार और इलाके में अच्छा होगा
—राजीव भाटिया, म्यांमार में भारत के पूर्व राजदूत

उन्होंने कहा, “म्यांमार में हालिया चुनावों से पहले भी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और विदेश मंत्री स्तर पर बातचीत होती रही है. राष्ट्रपति की यह यात्रा निश्चित रूप से एक साहसिक कूटनीतिक कदम है, जिस पर अंतरराष्ट्रीय ध्यान जाएगा. मेरे विचार से इससे दूसरे देशों के लिए भी म्यांमार सरकार के साथ संबंध फिर से शुरू करना आसान हो जाएगा.”

राजीव भाटिया ने कहा, “दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और हमारे लोकप्रिय, करिश्माई प्रधानमंत्री द्वारा उनका स्वागत किया जाना म्यांमार और पूरे क्षेत्र में सकारात्मक रूप से देखा जाएगा.”

मजूमदार ने कहा, “ऐसा नहीं है कि हमने अपने पड़ोस में उन सैन्य नेताओं से संबंध नहीं रखे, जो बाद में राष्ट्रपति बने. कम से कम म्यांमार के मामले में उन्होंने हमारे प्रति कभी शत्रुतापूर्ण रवैया नहीं अपनाया.”

भारत-म्यांमार संबंध

भाटिया के मुताबिक, भारत के लिए इस नीति के पीछे तीन प्रमुख कारण हैं. पूर्वोत्तर क्षेत्र में स्थिरता, दक्षिण-पूर्व एशिया से जुड़ी संपर्क परियोजनाओं का भविष्य और म्यांमार में चीन का बढ़ता प्रभाव.

उन्होंने कहा, “भारत के लिए तीन वजहें बिल्कुल स्पष्ट हैं. पहली, म्यांमार की अस्थिरता हमारे पूर्वोत्तर क्षेत्र को प्रभावित कर रही है. इसलिए हम चाहते हैं कि म्यांमार में स्थिरता आए, ताकि हमारे पूर्वोत्तर में भी स्थिति बेहतर हो.”

उन्होंने कहा कि दूसरा कारण भारत की एक्ट ईस्ट नीति है.

उन्होंने कहा, “अगर म्यांमार अशांत बना रहता है और सामान्य स्थिति में नहीं लौटता, तो हमारी एक्ट ईस्ट नीति में एक बड़ी कमी रह जाएगी. इसलिए हम इसे ठीक करना चाहते हैं.”

उन्होंने आगे कहा, “तीसरा कारण स्पष्ट रूप से चीन है. जो लोग कहते हैं कि भारत-म्यांमार संबंधों में चीन का कोई महत्व नहीं है, वे गलत हैं. म्यांमार में चीन का प्रभाव बढ़ रहा है और भारत को अपने हितों की रक्षा के लिए पहले से बेहतर प्रदर्शन करना होगा.”

ये चिंताएं नई नहीं हैं. भारत और म्यांमार ने स्वतंत्रता के बाद से घनिष्ठ संबंध बनाए रखे हैं और नई दिल्ली ने कई बार वैचारिक समानता से ज्यादा रणनीतिक हितों को प्राथमिकता दी है.

1962 में जनरल ने विन के तख्तापलट के बाद भारत म्यांमार की सैन्य सरकार को मान्यता देने वाला पहला देश बना था. इसके पीछे मुख्य वजह चीन के प्रभाव और पूर्वोत्तर सीमा पर सक्रिय विद्रोही समूहों को लेकर चिंता थी.

यह दौरा निश्चित रूप से एक बड़ा डिप्लोमैटिक कदम है जो इंटरनेशनल ध्यान खींचेगा. मेरी राय में, इससे दूसरों के लिए म्यांमार सरकार के साथ संबंध फिर से शुरू करना आसान हो जाएगा.
— जयदीप मजूमदार, पूर्व सचिव (पूर्व), MEA

जयदीप मजूमदार ने कहा, “यह यात्रा निश्चित रूप से एक साहसिक कूटनीतिक कदम है, जो अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकर्षित करेगी. मेरे विचार से इससे दूसरे देशों के लिए भी म्यांमार सरकार के साथ संबंध फिर से शुरू करना आसान होगा.”

1988 में सेना द्वारा लोकतंत्र समर्थक आंदोलन के दमन के बाद भारत ने कुछ समय के लिए लोकतंत्र समर्थक ताकतों का समर्थन किया था. लेकिन 1990 के दशक की शुरुआत में उसने अपनी नीति बदल ली और लुक ईस्ट नीति के तहत सैन्य सरकार से संबंध फिर से मजबूत कर लिए.

2021 के बाद नेपीडॉ की स्थिति में चीन की भूमिका काफी दिखाई दी है, लेकिन भारत ने भी मौजूदा संकट के लिए “म्यांमार के नेतृत्व वाले” समाधान का लगातार समर्थन किया है.

आज भारत की रणनीतिक सोच में म्यांमार की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है.

म्यांमार ASEAN का एकमात्र देश है जिसकी भारत के साथ जमीनी सीमा लगती है. यह भारत की नेबरहुड फर्स्ट, एक्ट ईस्ट और MAHASAGAR (म्यूचुअल एंड होलिस्टिक एडवांसमेंट फॉर सिक्योरिटी एंड ग्रोथ अक्रॉस रीजन) नीतियों के केंद्र में है.

मजूमदार ने कहा, “कालादान मल्टी-मोडल ट्रांसपोर्ट नेटवर्क, भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग और सित्तवे बंदरगाह हमारे लिए बेहद जरूरी हैं. हमें नेपीडॉ की सरकार के साथ-साथ उन जातीय सशस्त्र संगठनों के साथ भी अच्छे कामकाजी संबंध रखने होंगे, जिनका इन इलाकों तक पहुंच पर नियंत्रण है. आगे चलकर मुझे म्यांमार के सभी महत्वपूर्ण पक्षों के साथ और अधिक संपर्क बढ़ने की संभावना दिखती है.”

म्यांमार का रणनीतिक महत्व सिर्फ संपर्क परियोजनाओं तक सीमित नहीं है. बंगाल की खाड़ी और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की व्यापक समुद्री महत्वाकांक्षाओं के लिए भी यह देश तेजी से महत्वपूर्ण होता जा रहा है.

ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर श्रबाना बरुआ ने कहा कि अब म्यांमार का महत्व नेबरहुड फर्स्ट और एक्ट ईस्ट जैसी पारंपरिक नीतियों से भी आगे बढ़ चुका है.

मई की शुरुआत में भारत की बढ़ती रणनीतिक रुचि तब भी दिखाई दी, जब नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी ने नेपीडॉ और यांगून का दौरा किया. उन्होंने म्यांमार रक्षा सेवाओं के कमांडर-इन-चीफ सीनियर जनरल ये विन ऊ और म्यांमार नौसेना प्रमुख एडमिरल ह्तेन विन से मुलाकात की.

इन बैठकों में बंगाल की खाड़ी में समुद्री सुरक्षा, सैन्य प्रशिक्षण आदान-प्रदान, क्षमता निर्माण और रक्षा सहयोग को और मजबूत करने पर चर्चा हुई.

बरुआ ने कहा, “यह म्यांमार को लेकर भारत की रणनीतिक प्राथमिकताओं को स्पष्ट रूप से दिखाता है.”

हमारी 1,643 किलोमीटर की एक-दूसरे से जुड़ी सीमा है, और इसका सीधा-सा जवाब यह है कि हम इसे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते—फिर चाहे राजधानी में किसी भी पार्टी की सरकार क्यों न हो.
— श्रबाना बरुआ, एसोसिएट प्रोफेसर, ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी

चीन का पहलू

हालांकि चीन इस पूरे समीकरण का एक अहम हिस्सा बना हुआ है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की म्यांमार नीति को सिर्फ चीन का मुकाबला करने की कोशिश के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए.

जयदीप मजूमदार ने कहा, “म्यांमार के साथ हमारे संबंधों को चीन के खिलाफ संतुलन बनाने या चीन की भूमिका का मुकाबला करने की कोशिश के तौर पर देखना उचित नहीं होगा.”

उन्होंने कहा कि भारत और म्यांमार के संबंध वहां चीन की मौजूदगी से बहुत पहले के हैं.

उन्होंने कहा, “हम सिर्फ उस सभ्यतागत और परस्पर लाभ वाले रिश्ते को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे आजादी के बाद के अलग-अलग दौर में झटके जरूर लगे, लेकिन वह कभी पूरी तरह टूटा नहीं.”

साथ ही उन्होंने यह भी माना कि म्यांमार में चीन की स्थिति काफी मजबूत है.

उन्होंने कहा, “कुछ जातीय समूहों पर प्रभाव होने के कारण चीन की म्यांमार में मजबूत मौजूदगी और प्रभाव है. उसने वहां के प्राकृतिक संसाधनों के दोहन में भी बड़े आर्थिक हित बना लिए हैं. यह ऐसी हकीकत है जिसे नकारा नहीं जा सकता. इसके लिए चीन ने जमीनी हालात के मुताबिक काम किया है. भारत चीन की तरह संबंध बनाने के तरीके में उससे प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता और न ही करना चाहता है.”

राजीव भाटिया ने भी कहा कि म्यांमार की लगातार आने वाली सरकारों ने ऐतिहासिक रूप से चीन के साथ करीबी संबंध बनाए रखे हैं.

उन्होंने कहा, “इतिहास बताता है कि म्यांमार की राजधानी में रही हर सरकार, चाहे पहले रंगून में रही हो या अब नेपीडॉ में, चीन के साथ अच्छे, दोस्ताना और सहयोगपूर्ण संबंध रखना चाहती है. यह एक ऐसा तथ्य है जो न कभी बदला है और न ही जिस पर कोई सवाल है.”

लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि म्यांमार पारंपरिक रूप से किसी एक ताकत पर निर्भर रहने से बचना चाहता है.

भाटिया ने कहा, “म्यांमार में यह सोच रही है कि उसे स्वतंत्र विदेश नीति चलानी चाहिए और सिर्फ एक शक्ति पर निर्भर नहीं होना चाहिए. इसलिए मौजूदा नेतृत्व भी दूसरे विकल्प खुले रखना चाहता है. साफ तौर पर भारत एक अधिक स्वतंत्र म्यांमार देखना चाहता है और यह यात्रा उस दिशा को और मजबूत करेगी.”

रणनीतिक हित और सीमा की हकीकत

भारत के सामने चुनौती यह है कि 2021 के तख्तापलट के बाद म्यांमार में हालात काफी बदल गए हैं. सेना अब भारत से लगने वाली सीमा के बड़े हिस्सों पर नियंत्रण नहीं रखती.

अब सीमा के कई इलाकों में जातीय सशस्त्र संगठन और प्रतिरोधी समूह प्रभावी हैं. इससे भारत को नई परिस्थितियों के मुताबिक अपनी नीति ढालनी पड़ रही है.

मजूमदार ने कहा, “यह हकीकत है कि म्यांमार की सेना का भारत से लगने वाली पूरी सीमा पर नियंत्रण नहीं है. जातीय सशस्त्र संगठनों (EAOs) का अस्तित्व भी एक सच्चाई है.”

उन्होंने कहा, “हाल ही में मिजोरम में कुछ विदेशी नागरिकों की गिरफ्तारी, जो सीमा पार ड्रोन युद्ध तकनीक की तस्करी कर रहे थे, यह दिखाती है कि सीमा क्षेत्रों में सुरक्षा जोखिम काफी ज्यादा है. नशीले पदार्थों की तस्करी, हथियारों की तस्करी, साइबर अपराध जैसे मामलों पर नियंत्रण हमारी सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है.”

इसी वजह से भारत ने धीरे-धीरे ऐसी नीति अपनाई है जिसे विशेषज्ञ ‘दोहरी रणनीति’ बताते हैं.

इसके तहत भारत एक तरफ नेपीडॉ की सरकार के साथ औपचारिक संबंध बनाए रखता है, वहीं दूसरी तरफ सीमा के इलाकों पर नियंत्रण रखने वाले जातीय सशस्त्र संगठनों से भी संपर्क बढ़ा रहा है.

श्रबाना बरुआ ने कहा, “हम नेपीडॉ में सत्ता में मौजूद सरकार के साथ संबंध बनाए रखते हैं. साथ ही हम EAOs के साथ भी संपर्क रखना चाहते हैं, क्योंकि भारत-म्यांमार सीमा के अधिकांश इलाके उनके नियंत्रण में हैं.”

सुरक्षा चिंताओं ने भारत के सीमा नियमों को सख्त करने और कुछ हिस्सों में बाड़ लगाने के फैसले को भी प्रभावित किया है.

राजीव भाटिया ने कहा, “अब सिर्फ म्यांमार ही नहीं, बल्कि सभी पड़ोसी देशों की सीमाओं पर भारत की कोशिश है कि सामान, लोगों और अन्य चीजों की आवाजाही की बेहतर निगरानी और नियंत्रण किया जाए. भारत अपनी सीमाओं और अपने हितों की रक्षा कर रहा है. इसमें किसी को आपत्ति कैसे हो सकती है?”

यात्रा को लेकर चिंताएं

हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि भारत का यह कदम मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोपों का सामना कर रहे सैन्य नेतृत्व को वैधता देने जैसा हो सकता है.

म्यांमार के निर्वासित समूहों और लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ताओं ने पहले ही मिन आंग ह्लाइंग की यात्रा के विरोध की घोषणा कर दी है.

स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, म्यांमार की समानांतर राष्ट्रीय एकता सरकार (NUG), दिल्ली में रह रहे निर्वासित समुदाय और शरणार्थी समूहों ने विरोध प्रदर्शन की योजना बनाई है.

इंडिया फॉर म्यांमार समूह ने कहा कि उसने प्रदर्शन की अनुमति के लिए भारतीय अधिकारियों को आवेदन दिया है.

वहीं शरणार्थियों ने अन्य लोगों से भी प्रदर्शन में शामिल होने की अपील की. उनका कहना है कि मिन आंग ह्लाइंग के “अन्यायपूर्ण दमन और क्रूर कार्रवाइयों” के कारण उन्हें अपने घर छोड़ने पड़े.

भाटिया ने इन विरोध प्रदर्शनों को भारत की कूटनीतिक पहल पर बड़ा असर डालने वाला नहीं माना.

उन्होंने कहा, “इन विरोध प्रदर्शनों को लेकर गंभीर चिंता की जरूरत नहीं है. मेरा मानना है कि जो लोग विरोध कर रहे हैं, वे भारत के हितों और इस मुद्दे की गंभीरता को पूरी तरह नहीं समझते. सही संवाद रणनीति के जरिए इस स्थिति को संभाला जा सकता है.”

विशेषज्ञों का कहना है कि इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह उस सोच को दर्शाती है जिसने पिछले आधी सदी से भी अधिक समय से भारत की म्यांमार नीति को दिशा दी है.

नेपीडॉ की सरकारें बदल सकती हैं, लेकिन भूगोल नहीं बदलता.

श्रबाना बरुआ ने कहा, “भारत के म्यांमार के साथ हमेशा से संबंध रहे हैं. दोनों देशों के बीच 1,643 किलोमीटर लंबी साझा सीमा है. सीधी सी बात है कि राजधानी में चाहे कोई भी सरकार हो, हम म्यांमार को नजरअंदाज नहीं कर सकते.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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