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Wednesday, 4 November, 2026
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बांग्लादेश में शेख हसीना के खिलाफ विद्रोह को हवा देने में यूनिवर्सिटीज़ की क्या भूमिका रही?

बांग्लादेश के 2024 के विद्रोह पर येल के रिसर्चर्स की एक स्टडी में पाया गया है कि कैंपस में विरोध प्रदर्शन सड़कों पर होने वाले प्रदर्शनों से पहले हुए, और स्टूडेंट नेटवर्क ने यूनिवर्सिटी शहरों से बाहर विरोध को ले जाने में मदद की.

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नई दिल्ली: बांग्लादेश में 2024 में छात्रों के नेतृत्व में हुए उस आंदोलन पर एक नए एकेडमिक रिसर्च पेपर में यह देखा गया है कि कैसे देशभर के विश्वविद्यालयों ने एक सीमित मांग को देशव्यापी विद्रोह में बदलने में मदद की. इस आंदोलन ने शेख हसीना को सत्ता से हटा दिया था. शोध के मुताबिक, विश्वविद्यालयों ने युवाओं को नेटवर्क, पहचान और सामूहिक ताकत दी, जिससे वे सरकार को चुनौती दे सके. इस तरह विश्वविद्यालयों ने देशव्यापी आंदोलन के लिए ‘नर्सरी’ का काम किया.

अर्थशास्त्रियों सुल्तान महमूद और अअहमद मुशफिक मुबारक का यह अध्ययन ‘यूनिवर्सिटीज ऐज इन्क्यूबेटर्स ऑफ मास अपराइजिंग’ सितंबर 2026 में येल यूनिवर्सिटी, कनेक्टिकट के रिसर्च संस्थान काउल्स फाउंडेशन के डिस्कशन पेपर के रूप में प्रकाशित हुआ. इसमें बांग्लादेश के 2024 के विद्रोह, जिसे ‘मानसून क्रांति’ कहा गया, के भौगोलिक स्थानों से जुड़े विस्तृत विरोध प्रदर्शन के आंकड़ों के साथ फेसबुक गतिविधियों, सामाजिक संपर्क के आंकड़ों, विश्वविद्यालयों में दाखिले और जनसांख्यिकीय जानकारियों का विश्लेषण किया गया है.

तीन अहम पैटर्न

रिसर्चर्स ने तीन अहम पैटर्न की पहचान की है. पहला, विश्वविद्यालय परिसरों में विरोध प्रदर्शन शुरू हुए और उसके बाद वे परिसर के बाहर फैले. दूसरा, जिन जिलों में छात्रों की आबादी ज्यादा थी, वहां परिसर के अंदर और बाहर दोनों जगह विरोध प्रदर्शन ज्यादा हुए. हालांकि, यही संबंध गैर-छात्र युवाओं, शिक्षित वयस्कों, शहरी आबादी या ऐसे इलाकों में नहीं दिखा, जहां विश्वविद्यालयों को मंजूरी तो मिली थी, लेकिन वे शुरू नहीं हुए थे. तीसरा, जिन जिलों के लोगों के सामाजिक संपर्क उन जिलों से थे जहां परिसरों में विरोध प्रदर्शन हो रहे थे, वहां एक हफ्ते बाद प्रदर्शनों के फैलने की आशंका ज्यादा थी.

रिसर्च पेपर का मुख्य तर्क है कि विश्वविद्यालय केवल ऐसी जगहें नहीं हैं, जहां राजनीतिक असहमति पैदा होती है. वे बड़े पैमाने पर लोगों को एकजुट करने की शुरुआत भी कर सकते हैं. वे युवाओं को एक साथ लाते हैं, उनकी शिकायतों को सामने लाते हैं और ऐसे सामाजिक नेटवर्क उपलब्ध कराते हैं, जिनकी मदद से व्यक्तिगत नाराजगी सामूहिक कार्रवाई में बदल सकती है.

रिसर्च पेपर में कहा गया है, “विश्वविद्यालय राजनीतिक असहमति में इतनी खास भूमिका क्यों निभाते हैं और इस वजह से सरकारी दमन का निशाना क्यों बनते हैं? परिसर शिक्षित युवाओं को एक ही जगह लाते हैं, उनके बीच बार-बार बातचीत और मेलजोल का मौका देते हैं और सामाजिक व संगठनात्मक नेटवर्क को मजबूत बनाते हैं. इससे लोगों की शिकायतों को समझना और सामूहिक कार्रवाई की योजना बनाना आसान हो सकता है.”

विश्वविद्यालय परिसर क्यों अहम हैं

रिसर्च पेपर के मुताबिक, इस तरह विश्वविद्यालय किसी भी विरोध आंदोलन के सामने आने वाली एक बड़ी चुनौती को हल करने में मदद कर सकता है. यह चुनौती है सरकार से नाराज लोगों को यह भरोसा दिलाना कि वे अकेले नहीं हैं.

लेखकों का कहना है कि विश्वविद्यालय ऐसी कई सुविधाएं और स्थितियां एक साथ देते हैं, जिन्हें दूसरी जगहों पर तैयार करना मुश्किल है. वे बड़ी संख्या में युवाओं को नियमित रूप से एक-दूसरे के संपर्क में लाते हैं. छात्र बार-बार मिलते हैं, सूचनाएं साझा करते हैं और आपस में सामाजिक संबंध बनाते हैं. परिसरों में छात्र संगठन, राजनीतिक समूह और हॉस्टल जैसी व्यवस्थाएं भी होती हैं, जिनके जरिए सामूहिक कार्रवाई की योजना बनाई जा सकती है.

इतना ही अहम यह है कि विश्वविद्यालयों में विरोध प्रदर्शन में भागीदारी सबको दिखाई देती है. जब छात्र अपने साथियों को प्रदर्शन करते देखते हैं, तो विरोध में शामिल होने के जोखिम को लेकर उनकी सोच बदल सकती है. दूसरों की भागीदारी से उन्हें आंदोलन की ताकत और सत्ता को चुनौती देने के लिए लोगों की तैयारी का अंदाजा मिलता है.

रिसर्चर्स ने इस दावे की जांच के लिए 18 मार्च से 9 सितंबर 2024 के बीच 26 हफ्तों तक बांग्लादेश के 64 जिलों के विरोध प्रदर्शनों के आंकड़ों का इस्तेमाल किया. उनके विश्लेषण में आर्म्ड कॉन्फ्लिक्ट लोकेशन एंड इवेंट डेटा प्रोजेक्ट (ACLED) के आंकड़ों को बांग्लादेश ब्यूरो ऑफ एजुकेशनल इन्फॉर्मेशन एंड स्टैटिस्टिक्स के शिक्षा संबंधी आंकड़ों के साथ जोड़ा गया.

यह ब्यूरो किसी जिले की आबादी के मुकाबले वहां विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या के आधार पर छात्र आबादी का अनुपात तय करता है. बांग्लादेश में कॉलेज शब्द में उन संस्थानों को भी शामिल किया जाता है, जहां उच्च माध्यमिक स्तर यानी 11वीं और 12वीं कक्षा तक की पढ़ाई होती है.

औसतन हर 100 लोगों पर 3.54 छात्र हैं. रिसर्चर्स ने अलग-अलग छात्र आबादी वाले जिलों में विरोध प्रदर्शनों की संख्या में आए बदलाव की तुलना की. इस दौरान उन्होंने 2008 में अवामी लीग को मिले राजनीतिक समर्थन, आबादी के घनत्व, अल्पसंख्यकों की हिस्सेदारी और स्थानीय अर्थव्यवस्था की बनावट जैसे कारकों को भी ध्यान में रखा.

उन्होंने यह भी जांचा कि क्या इस संबंध को 15 से 24 साल के युवाओं की आबादी, वयस्कों की साक्षरता, शहरीकरण या वकीलों की मौजूदगी से समझाया जा सकता है. वकील भी अपेक्षाकृत शिक्षित और संगठित पेशेवर समूह होते हैं.

नतीजे बताते हैं कि छात्र आबादी का अनुपात अपने आप में एक अलग कारक है. जिन जिलों में छात्रों की आबादी ज्यादा थी, वहां आरक्षण संबंधी फैसले के बाद कुल विरोध प्रदर्शनों में ज्यादा बढ़ोतरी हुई. परिसर के अंदर और बाहर होने वाले प्रदर्शनों के मामले में यह संबंध सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण था.

इसके उलट, युवाओं की आबादी का अनुपात, साक्षरता दर और शहरी आबादी में मुख्य विश्लेषण के दौरान ऐसा कोई मिलता-जुलता पैटर्न नहीं दिखा.

हालांकि, वकीलों की मौजूदगी का भी विरोध प्रदर्शनों के साथ सकारात्मक संबंध पाया गया. यह नतीजा इस व्यापक तर्क को थोड़ा जटिल बनाता है कि विद्रोह के पीछे मुख्य संगठित समूह विश्वविद्यालय ही थे.

अध्ययन के नक्शों से पता चलता है कि शुरुआत में प्रदर्शन ढाका जैसे उन शहरों में केंद्रित थे, जहां बड़े सरकारी विश्वविद्यालय हैं. इसके बाद ये दूसरे शहरी केंद्रों तक फैल गए. करीब आठ हफ्तों के भीतर विरोध प्रदर्शन देशभर में फैल चुके थे.

परिसर से सड़कों तक फैला आंदोलन

अध्ययन के सबसे अहम निष्कर्षों में से एक यह है कि विरोध प्रदर्शन किस क्रम में फैले. रिसर्चर्स ने पाया कि पहले विश्वविद्यालय परिसरों में प्रदर्शन बढ़े. जुलाई में परिसर के अंदर होने वाले प्रदर्शनों की संख्या बढ़कर हर हफ्ते करीब 48 हो गई. इसके बाद अगस्त की शुरुआत में परिसर के बाहर होने वाले प्रदर्शनों की संख्या बढ़कर हर हफ्ते करीब 67 हो गई.

फेसबुक पर गतिविधियां भी इसी तरह बढ़ीं. छात्रों के विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी पोस्ट परिसर में आंदोलन के साथ तेजी से बढ़ीं. इसके बाद सामान्य रूप से विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी पोस्ट की संख्या में भी बढ़ोतरी हुई.

यह क्रम बताता है कि विश्वविद्यालयों से शुरू हुआ आंदोलन व्यापक स्तर पर फैलने से पहले सक्रिय हो चुका था. रिसर्चर्स ने आगे यह भी जांच की कि क्या अलग-अलग जिलों के बीच सामाजिक संपर्कों ने विरोध प्रदर्शनों को उनके शुरुआती केंद्रों से बाहर फैलने में मदद की.

फेसबुक के सोशल कनेक्टेडनेस इंडेक्स का इस्तेमाल करते हुए रिसर्चर्स ने यह पता लगाया कि अलग-अलग भौगोलिक इलाकों के बीच सामाजिक संबंध कितने मजबूत हैं. उन्होंने पाया कि जिन जिलों के लोगों के सामाजिक संबंध उन जगहों से ज्यादा मजबूत थे, जहां पिछले हफ्ते विश्वविद्यालय परिसरों में प्रदर्शन हुए थे, वहां बाद में परिसर के बाहर ज्यादा प्रदर्शन दर्ज किए गए.

हालांकि, जब रिसर्चर्स ने दो हफ्ते के अंतराल के बाद के आंकड़ों की जांच की, तो यह संबंध महत्वपूर्ण नहीं पाया गया. ये निष्कर्ष बताते हैं कि विरोध आंदोलन केवल एक मोहल्ले से दूसरे मोहल्ले तक फैलने के बजाय पहले से मौजूद सामाजिक नेटवर्क के जरिए भी आगे बढ़ सकते हैं. इस तरह बड़े विश्वविद्यालय वाले शहर दूसरे, भौगोलिक रूप से दूर स्थित केंद्रों में भी आंदोलन की शुरुआत कर सकते हैं.

बांग्लादेश के बाहर भी दिखा यही पैटर्न

यह जांचने के लिए कि विश्वविद्यालयों और विरोध प्रदर्शनों के बीच का संबंध बांग्लादेश के बाहर भी दिखता है या नहीं, लेखकों ने दो अन्य जगहों का अध्ययन किया.

पहला उदाहरण वियतनाम युद्ध के दौरान अमेरिका का है.

1963 से 1969 तक के काउंटी स्तर के आंकड़ों का इस्तेमाल करते हुए रिसर्चर्स ने पाया कि 1960 में जिन इलाकों में कॉलेजों में दाखिले की दर ज्यादा थी, वहां अगले दशक में युद्ध विरोधी प्रदर्शन भी ज्यादा हुए. हालांकि, 1950 में किसी काउंटी में युवाओं की आबादी का अनुपात इस तरह के संबंध को नहीं दिखाता था.

दूसरे विश्लेषण में 1997 से 2025 के बीच 226 देशों के आंकड़े शामिल किए गए. इसमें रिसर्चर्स को उच्च शिक्षा में दाखिले और विरोध प्रदर्शनों के बीच सकारात्मक संबंध मिला. उनके अनुमान के मुताबिक, उच्च शिक्षा में कुल दाखिले की दर में 10 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी के साथ विरोध प्रदर्शनों में करीब 12.7 फीसदी की बढ़ोतरी जुड़ी थी.

लेखकों ने अलग-अलग देशों के इन निष्कर्षों को पक्का सबूत नहीं, बल्कि शुरुआती संकेत बताया है. कुल मिलाकर, तीनों उदाहरण उनके व्यापक तर्क का समर्थन करते हैं: विश्वविद्यालय ऐसे संगठनात्मक और सामाजिक हालात तैयार कर सकते हैं, जिनसे सामूहिक राजनीतिक कार्रवाई की संभावना बढ़ती है.

यह तर्क इस बात की एक संभावित वजह भी बताता है कि सत्तावादी रुझान वाली सरकारें अक्सर विश्वविद्यालयों को अपने नियंत्रण में रखने, छात्र संगठनों पर रोक लगाने या परिसरों में होने वाली राजनीतिक गतिविधियों को सीमित करने की कोशिश क्यों करती हैं.

रिसर्च पेपर में तुर्की, हंगरी, ईरान, भारत, रूस और इजरायल सहित कई देशों में उच्च शिक्षा संस्थानों को निशाना बनाए जाने की घटनाओं का जिक्र है. इसमें अमेरिका में ट्रंप प्रशासन की ओर से हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की फंडिंग रोकने का मामला भी शामिल है.

रिसर्चर्स के मुताबिक, इसकी मूल चिंता यह नहीं है कि विश्वविद्यालय अपने आप में असहमति पैदा करते हैं. बल्कि वे असहमति को संगठित करने और फैलाने के लिए जरूरी ढांचा उपलब्ध करा सकते हैं.

रिसर्च पेपर के अंत में कहा गया है, “यह नजरिया समझने में मदद करता है कि सरकारें विश्वविद्यालय परिसरों पर दमन के लिए इतने बड़े संसाधन क्यों लगाती हैं, जबकि विश्वविद्यालय के छात्र आबादी का एक छोटा हिस्सा हैं. राजनीतिक संकट के समय विश्वविद्यालय ऐसा संस्थागत माहौल दे सकते हैं, जिसके जरिए लोगों की शिकायतें व्यापक राजनीतिक रूप ले सकती हैं. यही बात उन्हें जोखिम भरा बनाती है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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