नई दिल्ली: विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सोमवार शाम एशिया सोसाइटी के एक कार्यक्रम में बोलते हुए कहा कि अमेरिका के साथ भारत के रिश्तों में ‘बंप’ यानी कुछ रुकावटें पिछले साल व्यापार समझौते को लेकर लंबे समय तक चली बातचीत और भारत की चिंताओं के प्रति दिखाई गई संवेदनशीलता की कमी के कारण आईं. खासकर पाकिस्तान से होने वाले सीमा पार आतंकवाद को लेकर भारत की चिंताओं को लेकर.
कार्यक्रम में जयशंकर ने कहा, “कम से कम कई देशों के लिए, खासकर बड़े देशों के लिए, रिश्तों में कुछ बहुत खास मुद्दे होते हैं. हमारे मामले में एक मुद्दा व्यापार वार्ता था. व्यापार समझौते के लिए इसे पूरा करने के लिए एक निश्चित मात्रा में धैर्य और बारीकी से बातचीत की जरूरत थी. यह उम्मीद कि यह तेजी से आगे बढ़ सकता है, एक ऐसी वास्तविक स्थिति से टकराई जो कहीं ज्यादा जटिल थी. हम अब ऐसी स्थिति में पहुंच गए हैं, जहां व्यापार समझौते को लेकर कमोबेश समझ बन गई है.”
हालांकि, जयशंकर ने कहा कि अमेरिकी पक्ष में हुए बदलावों के कारण अभी एक मुद्दा बना हुआ है. फरवरी में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने पारस्परिक टैरिफ को रद्द कर दिया था. इसके बाद टैरिफ लगाने का एक “नया आधार” बना है, जिस पर अभी काम चल रहा है. उन्होंने कहा कि भारत के लिए सवाल यह है कि “ऐसे समझौते को किस बिंदु पर अंतिम रूप दिया जाए, जो काफी आगे बढ़ चुका है.”
भारत के विदेश मंत्री ने कहा कि इस समझौते को अंतिम रूप देने से दोनों देशों के रिश्ते बेहतर होंगे.
जयशंकर ने कहा, “भारत के लिए आतंकवाद का मुद्दा खास तौर पर बहुत महत्वपूर्ण है. हमें लगता है कि बहुत कम ऐसे देश हैं, जिन्होंने अपने पड़ोसी देश की ओर से कई दशकों तक जानबूझकर और एक तय नीति के तहत उस तरह के आतंकवाद का सामना किया है, जैसा हमने किया है.”
उन्होंने आगे कहा, “अगर हमारे लिए इतनी महत्वपूर्ण किसी चीज को लेकर पर्याप्त समझ या सहानुभूति नहीं है, तो मुझे लगता है कि इससे भी एक समस्या पैदा होती है. अगर मेरी सबसे बड़ी चिंताओं में से एक को मेरा साझेदार पूरी तरह नहीं समझता है, तो इसका असर पूरे रिश्ते पर पड़ता है.”
यह टिप्पणी हाल के महीनों में ट्रंप प्रशासन और पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व के बीच बढ़ते संबंधों की ओर इशारा करती है. पिछले कुछ दशकों में, खासकर आतंकवाद के खिलाफ युद्ध के दौरान, अमेरिका पाकिस्तान के महत्वपूर्ण सैन्य साझेदारों में से एक रहा है.
पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर के बाद संघर्ष रुकने का श्रेय राष्ट्रपति डॉनल्ड जे. ट्रंप द्वारा लगातार खुद लेने से भी भारत-अमेरिका संबंधों को और झटका लगा. इससे दोनों देशों के रिश्तों में तनाव और बढ़ा.
जयशंकर ने अमेरिका में लोगों के एक जगह से दूसरी जगह जाने यानी mobility को लेकर बढ़ते विरोध का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि इसका भी दोनों देशों के रिश्तों पर असर पड़ा है. हजारों भारतीयों को अमेरिका की H1-B और छात्र वीजा व्यवस्था से फायदा मिला है. आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका द्वारा मंजूर किए जाने वाले हर तीन H-1B वीजा में से करीब दो भारतीय नागरिकों को मिलते हैं. ट्रंप प्रशासन ने इस प्रक्रिया को धीमा करने के लिए कई कदम उठाए हैं. 2025 में कई महीनों तक भारतीय नागरिकों को वीजा मिलने में कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ा.
दोनों देशों के रिश्तों की कुल दिशा में हाल के महीनों में कुछ स्थिरता आई है. इस साल की शुरुआत में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते के ढांचे की घोषणा के बाद यह स्थिरता देखने को मिली. इस साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने G7 शिखर सम्मेलन के दौरान ट्रंप से भी मुलाकात की.
हालांकि, हाल ही में अमेरिकी कांग्रेस ने ऐसा कानून पास किया है, जिससे ट्रंप को रूस और ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर प्रतिबंध और टैरिफ लगाने का अधिकार मिलता है. इसके बाद भारत ने कड़ी चेतावनी दी है कि ऐसी किसी भी कार्रवाई का दोनों देशों के रिश्तों पर “संभावित असर” पड़ सकता है.
जयशंकर ने अपनी बात में खुलकर कहा कि आज की कूटनीति में एक बड़ा विरोधाभास आर्थिक आपसी निर्भरता और दुनिया भर में लगभग “जुनूनी” तरीके से चल रही प्रतिस्पर्धा के बीच है. उन्होंने किसी देश का नाम लिए बिना उन वैश्विक शक्तियों का जिक्र किया, जिनकी आर्थिक स्थिति कमजोर हो रही हो सकती है और जो अपनी आर्थिक स्थिति को फिर से मजबूत करने के लिए वैश्विक व्यापार व्यवस्था को बदलने की कोशिश कर रही हैं. इससे मौजूदा आर्थिक व्यवस्थाओं को नुकसान पहुंच रहा है.
उन्होंने अमेरिका और चीन के राष्ट्रपतियों के बीच हुई मुलाकात का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि कुछ क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच “सहमति” के मुद्दे मिल सकते हैं, लेकिन दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच कुल रिश्ता अब भी “प्रतिस्पर्धा” का है.
चीन के साथ भारत के रिश्तों पर बात करते हुए जयशंकर ने कहा कि 2020 की गर्मियों में पूर्वी लद्दाख में हुई सैन्य झड़पों के बाद नई दिल्ली और बीजिंग के बीच जारी गतिरोध को लंबे समय तक बनाए रखना “किसी के हित में नहीं” है.
उन्होंने कहा कि अगर यह गतिरोध जारी रहता है तो “तीसरे देश” इस खाली जगह को भर सकते हैं. उन्होंने कहा कि भारत-चीन संबंधों में “संरचनात्मक रूप से बहुत ज्यादा बदलाव नहीं हुआ है”, लेकिन सीमा पर लगातार बनी शांति से दोनों देशों के कुल रिश्तों को स्थिर करने में मदद मिली है.
पिछले सप्ताह जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र की उच्च स्तरीय बैठकों के लिए भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया. उन्होंने महासभा में भारत का राष्ट्रीय बयान भी दिया.
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