Saturday, 25 June, 2022
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रूस-यूक्रेन संकट के बीच पहले भारत-अमेरिका 2+2 वार्ता में कठिन बातचीत होने की उम्मीद

दोनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्रियों के बीच 11 अप्रैल को होने वाली यह बैठक रूस-यूक्रेन युद्ध की छाया में हो रही है और मॉस्को द्वारा दिखाई गई आक्रामकता की प्रतिक्रिया में नई दिल्ली और वॉशिंगटन पूरी तरह से एकसमान रुख वाले नहीं हैं.

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नई दिल्ली: बाइडन प्रशासन के तहत भारत और अमेरिका के बीच हाई-प्रोफाइल 2+2 मंत्रियों की पहली बैठक अगले सप्ताह वॉशिंगटन में होने वाली है और इस बार इसके अपने पिछले संस्करणों की तरह सहज रूप से संपन्न होने की संभावना नहीं है.

दोनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्रियों के बीच 11 अप्रैल को होने वाली यह बैठक रूस-यूक्रेन युद्ध की छाया में हो रही है और मॉस्को द्वारा दिखाई गई आक्रामकता की प्रतिक्रिया में नई दिल्ली और वॉशिंगटन पूरी तरह से एकसमान रुख वाले नहीं हैं.

राजनयिक सूत्रों और विश्लेषकों ने दिप्रिंट को बताया कि जहां द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत के आसान होने की उम्मीद है, वहीं रूस पर मतभेदों के कारण वार्तालाप की मेज पर थोड़ा सा अटपटापन भी हो सकता है.

अब तक, नई दिल्ली और वाशिंगटन के बीच वार्षिक तौर पर होने वाली 2+2 वार्ता के तीन दौर हो चुके हैं. पिछला दौर अक्टूबर 2020 में नई दिल्ली में तत्कालीन ट्रम्प प्रशासन के तहत आयोजित किया गया था.

सूत्रों के अनुसार, जो बाइडन द्वारा आधिकारिक तौर पर लगभग 13 महीने पहले व्हाइट हाउस में प्रवेश करने के बाद से भारत और अमेरिका ने 2+2 वार्ता आयोजित करने के कई प्रयास किए.

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मगर, अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी, कोविड के घरेलू स्तर पर प्रबंधन तथा पहले चीन और अब रूस के साथ गहरी रणनीतिक खींचतान ने अमेरिका को व्यस्त रखा हुआ था, जिससे इस वार्ता में देरी होती रही.

भारत में नए अमेरिकी राजदूत की नियुक्ति में देरी ने भी 2+2 मंत्रिस्तरीय वार्ता – जो भारत और अमेरिका के बीच एक महत्वपूर्ण रणनीतिक वार्ता है – को एक वर्ष से अधिक समय तक पीछे कर दिया.

बाइडन प्रशासन ने भारत में अमेरिकी राजदूत के पद के लिए लॉस एंजिल्स के मेयर एरिक गार्सेटी को नामांकित किया था, लेकिन अब ऐसा लगता है कि वह सीनेट में पर्याप्त वोट नहीं जुटा पाएंगे क्योंकि रिपब्लिकन पार्टी ने उनके पूर्व सहयोगियों में से एक खिलाफ यौन दुराचार के मामले को लेकर उनका विरोध किया है.

वॉशिंगटन में होने वाली 2+2 बैठक विदेश मंत्री एस. जयशंकर और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह तथा उनके अमेरिकी समकक्षों अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन और रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन के बीच होगी.

सूत्रों का कहना है कि यह वार्ता अंततः ऐसे समय में हो रही है जब यूक्रेन युद्ध को लेकर दोनों देशों के बीच ‘सख्त और व्यापक मतभेद’ सामने आए हैं, अमेरिका ने नई दिल्ली पर न केवल रूस को चेताने के लिए, बल्कि मॉस्को के साथ व्यापार करना बंद करने के लिए भी दबाव डाला हुआ है.

सूत्रों के अनुसार, 2+2 वार्ता के दौरान, बाइडन प्रशासन संभवतः भारत को यूक्रेन में रूस द्वारा कथित रूप से किए जा रहे कुछ युद्ध अपराधों के बारे में समझाने की कोशिश करेगा, खासकर यूक्रेन के बुचा शहर से आ रही काफी अधिक यातना और हिंसा की जानकारी के बाद.


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बातचीत के मुख्य मुद्दे

कुछ राजनयिक सूत्रों ने उनका नाम न छापने का अनुरोध करते हुए दिप्रिंट को बताया कि 2+2 वार्ता के दौरान, अमेरिका भारत को यह भी बताने की कोशिश कर सकता है कि मास्को पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंध कितने कठिन होने जा रहे हैं और कैसे यह रूस को दुनिया के साथ व्यापार करने में पूरी तरह से अक्षम बना देंगें.

इस बीच, भारत रूस से एस-400 मिसाइल सिस्टम की खरीद पर काउंटरिंग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रू सेंक्शंस एक्ट (सीएएटीएसए) के तहत प्रतिबन्ध न लगाए जाने को लेकर अमेरिका से आश्वासन मांगेगा.

मंगलवार को, यूक्रेन मसले पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के एक और सत्र – जो कि बुचा में कथित तौर पर हुए नरसंहार के बाद हुआ था – को संबोधित करते हुए न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि, टी.एस. तिरुमूर्ति ने इसे ‘बहुत अधिक परेशान करने वाला मामला’ कहा और एक बार फिर रूस की खुलकर आलोचना करने से परहेज किया.

पिछले एक महीने में, इस मसले पर भारत के रुख को समझने और उसका आकलन करने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल और विदेश मंत्री एस जयशंकर से मिलने के उद्देश्य से यूरोपीय देशों के राजनयिकों द्वारा भारत दौरे का तांता लगा हुआ है.

भारत ने रूस-यूक्रेन युद्ध, जो अब अपने दूसरे महीने में प्रवेश कर गया है, के मामले में आगे बढ़ने हेतु संवाद और कूटनीति के ही एकमात्र रास्ता होने पर जोर दिया है. माना जा रह है कि इस युद्ध ने अब तक सैकड़ों नागरिकों की जान ले ली है, जबकि एक करोड़ से अधिक यूक्रेनियों को शरणार्थियों का जीवन जीने के लिए मजबूर कर दिया है.

इस बीच, भारत इस संघर्ष के मद्देनजर रूस के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र में हुए कई मतदानों से अनुपस्थित रहा है. इन्हीं में गुरुवार को एक ऐसे प्रस्ताव के संबंध में हुआ मतदान भी शामिल है जिसमें रूस को मानवाधिकार परिषद (ह्यूमन राइट्स काउंसिल) से निलंबित करने की मांग की गयी थी.

तिरुमूर्ति ने एक स्पष्टीकरण में कहा कि ‘भारत आज संयुक्त राष्ट्र महासभा में मानवाधिकार परिषद से रूसी संघ के निलंबन के संबंध में पारित प्रस्ताव पर वोट से अनुपस्थित रहा है.’ उन्होंने कहा, ‘हमने ऐसा इसके तात्पर्य (सब्सटांस) और प्रक्रिया दोनों की वजह से किया है.’

पिछले महीने के अंत में भारत का जल्दबाजी में किए गए दौरे में अंतर्राष्ट्रीय अर्थशास्त्र के लिए अमेरिकी डिप्टी एनएसए दलीप सिंह ने भारत को मास्को के साथ व्यापारिक संबंध बढ़ाने, चाहे वह हथियार खरीदने के बारे में हो या रूसी तेल की खरीद में मिल रही छूट के बारे में हो, के खिलाफ चेतावनी दी थी.

व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव जेन साकी ने इस सप्ताह की शुरुआत में कहा, ‘इस यात्रा के दौरान दलीप ने अपने (भारतीय) समकक्षों को यह स्पष्ट कर दिया था कि हम रूसी ऊर्जा उत्पादों और अन्य वस्तुओं के आयात में तेजी लाने या इसे बढ़ाने को भारत के हित में नहीं मानते हैं.’

व्हाइट हाउस ने भारत को क्रेमलिन पर अपनी निर्भरता कम करने में मदद का भरोसा भी दिलाया है.

सूत्रों के अनुसार बाइडन प्रशासन ने भारत को स्पष्ट कर दिया है कि वह भारत और रूस के बीच किसी भी तरह की व्यापारिक व्यवस्था के खिलाफ है, चाहे वह पारंपरिक ‘रुपया-रूबल’ व्यापार तंत्र हो या राष्ट्रीय मुद्राओं में होने वाला व्यापार.

दोनों देशों की राष्ट्रीय मुद्राओं में एक-दूसरे के साथ व्यापार करने वाली बात एक ऐसा मामला है जिसकी रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने 1 अप्रैल को अपनी भारत यात्रा के दौरान जोरदार वकालत की थी.


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‘आसान बातचीत और कठिन बातचीत

वॉशिंगटन स्थित विल्सन सेंटर के माइकल कुगेलमैन ने कहा कि इस बार के 2+2 में ‘आसान बातचीत और कठिन बातचीत दोनों शामिल होगी’.

उन्होंने कहा, ‘आसान बातचीत के तहत सुरक्षा साझेदारी के निर्माण पर और विशेष रूप से पिछले कुछ वर्षों में संपन्न हुए मूलभूत रक्षा समझौतों को लागू करने पर ध्यान केंद्रित किया जायेगा. कठिन बातचीत रूस वाले मुद्दे पर होगी.’

कुगेलमैन ने कहा, ‘मुझे लगता है कि अमेरिकी मंत्री अपने भारतीय समकक्षों को यह समझाने की कोशिश करेंगे कि एक सुरक्षा भागीदार के रूप में रूस की उपयोगिता तेजी से कम हो रही है,’ उन्होंने कहा, ‘वह एक प्रतिबंधित, नकदी के आभाव वाला और हथियारों के निर्माण एवं आपूर्ति की कम क्षमता वाला देश होगा और जब भारत अगली बार चीन से किसी उकसावे का सामना करेगा तो वह (रूस) निश्चित रूप से उसका (भारत का) समर्थन करने के लिए कुछ भी नहीं करेगा. हो सकता है कि भारतीय पक्ष इस तरह के तर्क के प्रति अच्छी तरह प्रतिकिया न करें, जो एक अटपटा सा पल पैदा कर सकता है.’

कुगेलमैन ने यह भी कहा कि अमेरिकी पक्ष यह सुझाव दे सकता है कि वह कात्सा को एक ‘लीवरेज’ के रूप में इस्तेमाल कर सकता है और बातचीत के दौरान यह स्पष्ट कर सकता है कि अगर भारत रूस से अपने हथियारों के आयात में बहुत अधिक कटौती (पहले से हो रही कटौती की तुलना में काफी अधिक तेजी से साथ) करने का इरादा दिखाता है, तो इससे छूट मिलने की ‘कहीं ज्यादा संभावना’ है.‘

सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज, यूएस-इंडिया पॉलिसी स्टडीज में वाधवानी चेयर रिचर्ड एम रोसो ने कहा, ‘भारत-अमेरिका 2 + 2 वार्ता का आयोजित होना लम्बे समय से लंबित था.‘

रोसो ने कहा, ‘हमारी सबसे महत्वपूर्ण द्विपक्षीय वार्ता होने से पहले बाइडन प्रशासन में लगभग 1.5 साल का अरसा बीत चुका है. दोनों पक्षों के दिमाग में तीन उद्देश्य होने चाहिए: पहला, महत्वपूर्ण, फिर भी निष्क्रिय पड़े, सहयोग के क्षेत्रों को फिर से शुरू करें. दूसरा, सहयोग के नए और शायद साधारण क्षेत्र खोजें और तीसरा, रूस और कात्सा प्रतिबंधों पर एक मत होने की तलाश के साथ संकट से बचें.‘

उन्होंने कहा, ‘मुझे पूरा विश्वास है कि पहले दो को तो सुलझा लिया जायेगा, लेकिन तीसरा – तेजी से बढ़ते हुए संकट से बचना – बहुत कठिन है.’


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जयशंकर ने यूक्रेन पर पश्चिमी आलोचकों की खिंचाई की

पिछले हफ्ते, यूके की विदेश मंत्री एलिजाबेथ ट्रस, जिन्होंने रूस को चेताने के लिए भारत के ऊपर एक और ‘राजनयिक जोर’ लगाने की कोशिश की थी, के साथ एक सेमिनार को संबोधित करते हुए जयशंकर ने कहा कि मॉस्को के प्रति अपना रुख बदलने के लिए नई दिल्ली के खिलाफ एक ‘अभियान’ चलाया जा रहा है.

उन्होंने इस बात को भी रेखांकित किया कि यूरोपीय संघ अभी भी रूस से तेल और गैस खरीद रहा है.

पिछले महीने भारत का दौरा करते हुए, जर्मनी के एनएसए येंस प्लॉटनर ने कहा था कि बर्लिन 2022 के अंत तक रूस से तेल और गैस की अपनी खरीद को समाप्त कर देगा, ट्रस ने भी कुछ ऐसे ही स्वर में बात की.

मंगलवार को, यूक्रेन युद्ध पर भारत के रुख के बारे में भारतीय संसद को संबोधित करते हुए जयशंकर ने कहा, ‘भारत यूक्रेन में किस बात की वकालत कर रहा है? हम सबसे पहले और सबसे अहम तौर पर इस संघर्ष के सख्त खिलाफ हैं. हमारा मानना है कि किसी का खून बहाकर और मासूमों की जान की कीमत पर कोई समाधान नहीं निकाला जा सकता है. आज के जमाने में संवाद और कूटनीति ही किसी भी विवाद का सही हल है.’

उन्होंने कहा, ‘अगर भारत ने कोई पक्ष चुना है, तो वह है शांति का पक्ष और यह हिंसा को तत्काल समाप्त करने के पक्ष में है. यह हमारा सैद्धांतिक रुख है और इसी ने संयुक्त राष्ट्र सहित सभी अंतरराष्ट्रीय मंचों और बहसों में लगातार हमारे रुख का मार्गदर्शन किया है.’

बुचा में कथित तौर पर रूसी सेना द्वारा की गई हत्याओं के मुद्दे पर विदेश मंत्री ने कहा, ‘हम वहां हुई हत्याओं की कड़ी निंदा करते हैं. यह बेहद गंभीर मामला है और हम इसकी स्वतंत्र जांच की मांग का समर्थन करते हैं.’

इस बीच, गुरुवार को 2+2 वार्ता की घोषणा करते हुए विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा कि दोनों पक्ष विदेश नीति, रक्षा और सुरक्षा से संबंधित मुद्दों पर चर्चा करेंगे.

उन्होंने कहा कि इस यात्रा के दौरान जयशंकर बाइडन प्रशासन के अन्य वरिष्ठ सदस्यों के अलावा अपने अमेरिकी समकक्ष एंटनी जे. ब्लिंकन से भी अलग से मुलाकात करेंगे.

यूएस डिप्टी एनएसए सिंह की टिप्पणी के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, ‘रूस के साथ हमारे पहल से स्थापित आर्थिक संबंध हैं. हमारा ध्यान मौजूदा परिस्थितियों में इस स्थापित आर्थिक संबंध को स्थिर करने पर है और हम इसके बारे में खुले हैं…यूरोप में (रुसी) ऊर्जा का प्रवाह जारी है, उर्वरकों की खरीद को प्रतिबंधों से परे रखा गया है… अमेरिका के साथ हमारे सुदृढ़, मजबूत एवं विविध संबंध हैं और 2+2 वार्ता इसी संदर्भ में हो रही है.’

अमेरिका में पूर्व भारतीय राजदूत अरुण के सिंह ने कहा, ‘निस्संदेह तौर पर यूक्रेन से जुड़े मुद्दों पर 2+2 बैठक में चर्चा की जाएगी, मगर ऐसे अन्य प्रमुख मुद्दे भी हैं जिन पर दोनों पक्ष लाभकारी ढंग से ध्यान केंद्रित करेंगे.’

सिंह ने कहा, ‘चीन की ओर से लगातार चुनौती मिल रही है और अमेरिका तथा उसके सहयोगियों एवं भागीदारों की तरफ से रूसी कार्रवाई पर प्रतिक्रिया के आधार पर चीन अपनी रणनीतियों और कार्रवाइयों के लिए जो सबक सीख रहा है, उसे बेहतर ढंग से समझने की जरूरत है.’

उन्होंने कहा, ‘इसके अलावा, यह बैठक आपसी लाभ के लिए रक्षा सहयोग को बढ़ाने हेतु अतिरिक्त तरीके तलाशने का एक अवसर भी है. यह नकारात्मक आवाजों, खासकर अमेरिका में उठने वाली का प्रभावी प्रतिउत्तर होगा.’


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अमेरिका और अधिक रक्षा सौदों एवं करों में कमी पर जोर दे सकता है

अमेरिका द्वारा मास्को पर अभूतपूर्व प्रतिबंध लगाए जाने के साथ ही वह भारत को अपने हथियार बेचने की तगड़ी कोशिश भी करेगा, जिसमें भारतीय नौसेना के विमान वाहक पोत के लिए बोइंग का एफ/ए -18 ब्लॉक III सुपर हॉर्नेट और जनरल एटॉमिक्स से 30 सशस्त्र एम क्यू 9बी ड्रोन की खरीद भी शामिल है.

सूत्रों ने कहा, अमेरिका भारत के रक्षा प्लेटफॉर्म्स को रूसी से अमेरिकी में बदलने का इरादा रखता है और वॉशिंगटन भारत को अपना ‘प्रमुख रक्षा भागीदार’ मानता है.

दो-तरफा व्यापार के मुद्दे पर, अमेरिका भारत में व्यापार करने वाली अमेरिकी फर्मों के लिए एक समान अवसर का आग्रह करते हुए सभी तरह के करों को कम करने हेतु भारत पर दबाव डालना जारी रख सकता है.

रोसो ने कहा: ‘मैं हिंद महासागर क्षेत्र में नए सहयोग के बारे में घोषणा होते देखना चाहता हूं. इसमें हमारे तीनों सेनाओं की भागीदारी वाले युद्ध अभ्यास ‘एक्सरसाइज टाइगर ट्रायम्फ’ का फिर से शुरू करना और भारत के खिलाफ कात्सा प्रतिबंधों से बचने की एक राह खोजना शामिल हैं.’

उन्होंने कहा, ‘भारत को कई सारे अमेरिकी रक्षा उत्पादों – सशस्त्र ड्रोन और वाहक द्वारा लॉन्च किए गए लड़ाकू विमान – की बिक्री भी लंबित हैं. दोनों में से किसी एक या फिर दोनों पर ही समझौता करने से रिश्ते को मजबूती मिलेगी.

दिप्रिंट को पहले दिए एक साक्षात्कार में, पूर्व अमेरिकी राजनयिक और यूएस-इंडिया बिजनेस काउंसिल के अध्यक्ष अतुल केशप ने कहा था कि अमेरिका और भारत को बढ़ते भू-राजनीतिक खतरों से अपने आर्थिक संबंधों की सुरक्षित रखना चाहिए.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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