कोलंबो, तीन नवंबर (भाषा) श्रीलंका के विवादित संगठित अपराध रोकथाम विधेयक की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय में 20 याचिकाएं दायर की गईं। संसद के उपाध्यक्ष रिजवी सलीह ने मंगलवार को संसद में यह जानकारी दी।
सलीह ने बताया कि अध्यक्ष को संविधान के अनुच्छेद 121(1) के तहत दायर इन याचिकाओं की प्रतियां प्राप्त हुई हैं।
उन्होंने बताया कि यह अनुच्छेद नागरिकों को संसद में किसी विधेयक को पेश किए जाने के एक सप्ताह के भीतर उसकी संवैधानिक वैधता को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देने का अधिकार देता है।
उपाध्यक्ष ने कहा कि याचिकाओं पर सुनवाई के बाद उच्चतम न्यायालय संविधान में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अपना फैसला अध्यक्ष को भेजेगा।
यह विधेयक 20 अक्टूबर को संसद में पेश किया गया था और इसे लेकर स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने आलोचना की।
संगठनों ने आशंका जताई कि विधेयक के प्रावधान मौलिक अधिकारों को कमजोर कर सकते हैं और अधिकारियों को व्यापक अधिकार दे सकते हैं।
न्यूयॉर्क स्थित मानवाधिकार संगठन ‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ ने पिछले सप्ताह कहा था कि प्रस्तावित विधेयक मनमाने ढंग से हिरासत में लेने, यातना देने और मानवाधिकारों के अन्य उल्लंघनों को बढ़ावा दे सकता है।
संगठन ने कहा कि यह विधेयक और आतंकवाद से देश की सुरक्षा संबंधी विधेयक, दोनों पिछले महीने पेश किए गए थे तथा इनमें मौजूदा आतंकवाद विरोधी कानूनों के उन प्रावधानों को दोहराया गया, जिनका दुरुपयोग होता रहा है।
संगठन ने चेतावनी दी कि प्रस्तावित कानून उन ज्यादतियों को जारी रख सकता है, जिन्हें समाप्त करने का सरकार ने वादा किया था।
एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी विधेयक वापस लेने की मांग की।
संगठन का कहना है कि यह विधेयक संगठित अपराध से निपटने के नाम पर अधिकारियों को व्यापक अधिकार देता है, जबकि आरोपियों के अधिकारों को कमजोर करता है।
आलोचकों ने अदालतों के किसी व्यक्ति की संगठित आपराधिक गिरोह की कथित सदस्यता का आकलन कुछ आधारों पर करने संबंधी विधेयक के प्रावधानों पर चिंता जताई।
इनमें गिरोह के ज्ञात सदस्यों के साथ प्रत्यक्ष या ऑनलाइन मुलाकात करना, पहनावा, हाथों के इशारे, भाषा, शरीर पर बने टैटू, गिरोह के सदस्यों के साथ मेलजोल और गिरोह से जुड़े ठिकानों पर बार-बार जाना शामिल है।
मानवाधिकार संगठनों ने चेतावनी दी कि ऐसे प्रावधानों से किसी व्यक्ति को उसके विशिष्ट आपराधिक कृत्य के बजाय केवल किसी समूह से जुड़ाव के आधार पर अपराधी ठहराया जा सकता है और इससे गलत काम के सबूत के बिना भी लोगों को हिरासत में लेने का रास्ता खुल सकता है।
भाषा जितेंद्र नरेश
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