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Tuesday, 3 November, 2026
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दिल्ली रैली में राहुल-अखिलेश की गर्मजोशी, यूपी में सपा-मौर्य को लेकर कांग्रेस से बढ़ा तनाव

कुछ दिन पहले स्वामी प्रसाद मौर्य ने दिल्ली में राहुल और प्रियंका से मुलाकात की थी. इसके बाद उन्होंने कहा था कि उनकी पार्टी इंडिया गठबंधन में शामिल होना चाहती है.

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लखनऊ: रविवार को दिल्ली के रामलीला मैदान में राहुल गांधी और अखिलेश यादव के बीच दिखी गर्मजोशी की काफी चर्चा हुई, लेकिन उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दोनों पार्टियों के बीच तनाव बढ़ रहा है. यूपी के पूर्व कैबिनेट मंत्री और ओबीसी नेता स्वामी प्रसाद मौर्य के इंडिया गठबंधन में शामिल होने की कोशिश कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (सपा) के बीच मतभेद की वजह बन गई है.

कुछ दिन पहले मौर्य ने दिल्ली में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा से मुलाकात की थी. इसके बाद उन्होंने कहा था कि उनकी राष्ट्रीय शोषित समाज पार्टी इंडिया गठबंधन में शामिल होना चाहती है. हालांकि, सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने उन्हें गठबंधन में जगह देने की संभावना को खारिज कर दिया.

इसके बाद से कांग्रेस के उत्तर प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने मौर्य के साथ कई बैठकें की हैं और विपक्षी गठबंधन में उन्हें शामिल करने का समर्थन किया है. सोमवार को मौर्य ने सोशल मीडिया पर गौतम के साथ एक तस्वीर साझा की और कहा कि दोनों ने 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए रणनीति पर चर्चा की.

तस्वीर पोस्ट किए जाने से पहले गौतम ने रविवार को मीडिया से कहा था कि मौर्य इंडिया गठबंधन का हिस्सा हैं. उन्होंने यह भी कहा कि मौर्य को लेकर अखिलेश की बातें उनकी निजी राय हो सकती हैं, लेकिन इससे इंडिया गठबंधन की दिशा या भविष्य तय नहीं होगा.

कांग्रेस मौर्य को उत्तर प्रदेश में अपने सामाजिक आधार को बढ़ाने वाले एक प्रभावशाली ओबीसी नेता के तौर पर देखती है. पार्टी ओबीसी मतदाताओं तक अपनी पहुंच मजबूत करने के लिए उन्हें गठबंधन में लाना चाहती है. वहीं, मौर्य चाहते हैं कि उनकी पार्टी इंडिया गठबंधन के तहत कुछ सीटों पर चुनाव लड़े, न कि किसी दूसरी पार्टी में उसका विलय हो.

मौर्य जनवरी 2024 तक समाजवादी पार्टी से जुड़े हुए थे. हालांकि, रामचरितमानस और हिंदू देवी-देवताओं को लेकर उनके विवादित बयानों के बाद पार्टी ने उनसे दूरी बना ली. इसके बाद उन्होंने पार्टी से इस्तीफा दे दिया.

अखिलेश मौर्य के गठबंधन में आने के सख्त खिलाफ हैं. जब मौर्य के बारे में पूछा गया तो यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री ने साफ तौर पर उनके इंडिया गठबंधन में शामिल होने की संभावना को खारिज कर दिया था.

पिछले शुक्रवार को लखनऊ में सपा मुख्यालय में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा था, “स्वामी प्रसाद मौर्य हमारे गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं. उन्हें नज़रअंदाज करें, उनसे दूरी रखें. उन्हें हमारी सीटों के हिसाब में नहीं गिना जा सकता.”

दूसरी ओर, मौर्य ने सपा प्रमुख पर तीखा हमला किया है. उन्होंने यहां तक कहा कि वह पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के “नंबर एक दुश्मन” हैं.

अखिलेश की पीडीए के प्रति प्रतिबद्धता पर सवाल उठाते हुए मौर्य ने कहा, “जो नेता पिछड़े वर्गों, दलितों और अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करता है, वह इन समुदायों के नेताओं के साथ ऐसा व्यवहार कैसे कर सकता है. जब अखिलेश यादव आजम खान के साथ खड़े नहीं हुए, तो उनसे मेरे साथ खड़े होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है?”

मौर्य ने आगे आरोप लगाया कि अखिलेश को न तो वह पसंद हैं और न ही चंद्रशेखर आजाद, लेकिन वह धनराज परिमल नाथवानी जैसे नेताओं को पसंद करते हैं, जिन्हें सपा ने राज्यसभा के लिए चुना है. उन्होंने यह भी दावा किया कि यही रवैया उन कारणों में से एक था, जिसकी वजह से उन्होंने सपा के राष्ट्रीय महासचिव पद से इस्तीफा दिया.

सपा ने मौर्य तक कांग्रेस की पहुंच पर सवाल उठाए

मतभेदों के बाद दोनों गठबंधन सहयोगियों के नेताओं के बीच बयानबाजी भी शुरू हो गई है.

दिप्रिंट से बात करते हुए सपा के वरिष्ठ नेता उदयवीर सिंह ने सवाल उठाया कि अखिलेश यादव के पार्टी का रुख साफ करने के बावजूद कांग्रेस मौर्य से बातचीत क्यों कर रही है. उन्होंने कहा, “जब हमारी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने साफ कह दिया है कि स्वामी प्रसाद मौर्य गठबंधन का हिस्सा नहीं होंगे, तो कांग्रेस उन्हें तवज्जो क्यों दे रही है? कांग्रेस प्रभारी ऐसे बयान क्यों दे रहे हैं? इससे पहले उन्होंने 200 सीटों की सूची भेजने का भी गलत दावा किया था. उन्होंने यह मांग किससे की थी? उन्होंने न तो हमारी पार्टी के हाई कमान से मुलाकात की है और न ही किसी वरिष्ठ नेता से.”

उन्होंने आगे कहा कि कांग्रेस नेतृत्व को दखल देना चाहिए और अपने नेताओं को ऐसे बयान देने से रोकना चाहिए, जिनसे गठबंधन के सहयोगियों के बीच भ्रम पैदा हो सकता है. उन्होंने कहा, “कांग्रेस हाई कमान को पहले दखल देना चाहिए और गलत बयान देने वाले नेताओं को रोकना चाहिए. उसे उत्तर प्रदेश से जुड़े फैसलों पर अखिलेश यादव से सलाह करनी चाहिए. यह दो पार्टियों का गठबंधन है और राज्य में कौन इसका हिस्सा बनेगा, यह तय करने में अखिलेश यादव की अहम भूमिका होगी.”

हालांकि, कांग्रेस के यूपी प्रभारी गौतम ने मौर्य के साथ पार्टी की बातचीत का बचाव किया. उन्होंने कहा, “स्वामी प्रसाद मौर्य इंडिया गठबंधन का हिस्सा बनना चाहते हैं. वह अपनी पार्टी का विलय नहीं करना चाहते. वह गठबंधन के तहत सीटें चाहते हैं. वह उत्तर प्रदेश की ओबीसी राजनीति में एक प्रमुख नाम हैं. उन्हें शामिल करने पर आपत्ति क्यों होनी चाहिए?”

मौर्य का दिलचस्प राजनीतिक सफर

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में जन्मे 72 वर्षीय मौर्य का राजनीतिक करियर काफी उतार-चढ़ाव वाला रहा है. पिछले कई दशकों में वह कई पार्टियों में रहे हैं.

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पढ़ाई करने के बाद उन्होंने 1980 में सक्रिय राजनीति में कदम रखा. इसी साल वह इलाहाबाद युवा लोकदल की राज्य कार्यकारिणी समिति के सदस्य बने. जून 1981 से 1989 तक उन्होंने इसके महासचिव के रूप में काम किया. 1989 से 1991 के बीच वह यूपी लोकदल के महासचिव रहे. इसके बाद 1991 से 1995 तक उन्होंने जनता दल की यूपी इकाई के महासचिव के रूप में काम किया.

1996 में मौर्य बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) में शामिल हुए और इसके प्रदेश महासचिव बने. वह बीएसपी के टिकट पर रायबरेली की डलमऊ सीट से विधायक चुने गए और बाद में चार बार विधायक बने.

2002 में उन्हें मंत्री की जिम्मेदारी दी गई. अगस्त से सितंबर 2003 के बीच वह नेता प्रतिपक्ष रहे. 2007 से 2009 के बीच वह मायावती सरकार में मंत्री भी रहे. जनवरी 2008 में उन्हें बीएसपी का उत्तर प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया. 2016 में मौर्य ने मायावती के खिलाफ बगावत की और बीजेपी में शामिल हो गए. 2017 के विधानसभा चुनाव में जीत के बाद वह पहली योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री बने.

2022 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने बीजेपी छोड़ दी और सपा में शामिल हो गए. हालांकि, जनवरी 2024 में उन्होंने सपा भी छोड़ दी और बाद में अपनी राजनीतिक पार्टी बनाई. उनकी बेटी संघमित्रा मौर्य, जो बदायूं से पूर्व सांसद हैं, अभी भी बीजेपी के साथ हैं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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