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Tuesday, 3 November, 2026
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महिला कामगार दोगुनी, पर कम सैलरी वाले कामों में बढ़ी हिस्सेदारी: ICRIER रिपोर्ट

ग्रामीण महिलाएं पुरुषों की कमाई का सिर्फ 45 प्रतिशत कमाती हैं, जबकि काम नहीं करने वाली 60 प्रतिशत महिलाएं घर की जिम्मेदारियों को इसकी वजह बताती हैं.

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नई दिल्ली: इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस (आईसीआरआईईआर) की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की महिला कामगारों की संख्या 2017-18 में 10.4 करोड़ से बढ़कर 2025 में करीब दोगुनी यानी 20.1 करोड़ हो गई है. लेकिन इस बढ़ोतरी का बड़ा हिस्सा उन महिलाओं का है जो खेती, स्वरोजगार और बिना वेतन वाले पारिवारिक काम में आई हैं, न कि बेहतर वेतन वाली नियमित नौकरियों में.

आईसीआरआईईआर एक स्वतंत्र आर्थिक नीति पर काम करने वाला थिंक टैंक है.

रिपोर्ट में कहा गया, “इसलिए कामगारों में शामिल हुई अतिरिक्त महिलाओं ने मुख्य रूप से स्वरोजगार और बिना वेतन वाले पारिवारिक काम के जरिए काम शुरू किया है. ये सबसे ज्यादा असुरक्षित और सबसे कम वेतन वाली श्रेणियां हैं. इसके बजाय वे औपचारिक, नियमित वेतन वाली नौकरियों में नहीं आई हैं, जो महिलाओं के काम की स्थिति में वास्तविक सुधार का संकेत देतीं.”

पिछले सप्ताह जारी हुई ‘द पार्टिसिपेशन पैराडॉक्स: वुमेन्स वर्क एंड टाइम-यूज इन इंडिया, 2017-18 टू 2025’ नाम की रिपोर्ट बताती है कि महिलाओं की काम में भागीदारी में तेज बढ़ोतरी उनकी बेहतर कमाई, ज्यादा सुरक्षित रोजगार या बिना वेतन वाले घरेलू काम के असमान बोझ में कमी में नहीं बदली है.

रिपोर्ट में कहा गया, “महिलाओं के रोजगार की मात्रा और उसकी गुणवत्ता विपरीत दिशाओं में गई है.”

बिना वेतन वाले पारिवारिक कामगार वे लोग होते हैं जो घर के किसी सदस्य द्वारा चलाए जा रहे आर्थिक काम, जैसे खेत या पारिवारिक कारोबार में मदद करते हैं, लेकिन उन्हें नियमित वेतन नहीं मिलता. इसे रोजगार माना जाता है और यह खाना बनाने, सफाई करने और बच्चों की देखभाल जैसे बिना वेतन वाले घरेलू काम से अलग है.

महिला कामगार जनसंख्या अनुपात (डब्ल्यूपीआर), जो बताता है कि काम करने की उम्र वाली आबादी में कितने लोग रोजगार में हैं, 2017-18 में 22 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 38 प्रतिशत हो गया.

हालांकि, यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से ग्रामीण भारत में हुई है, जहां महिलाओं की काम में भागीदारी 23.7 प्रतिशत से बढ़कर 44.9 प्रतिशत हो गई. शहरी इलाकों में यह बढ़ोतरी धीमी रही और 18.2 प्रतिशत से बढ़कर 25.9 प्रतिशत हुई.

रिपोर्ट में ग्रामीण महिलाओं की काम में भागीदारी बढ़ने की दो वजहें बताई गई हैं.

एक वजह आर्थिक परेशानी को बताया गया है. इसके तहत वेतन में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं होने और काम के घंटे कम होने के बीच महिलाओं ने परिवार की आय बढ़ाने के लिए कम उत्पादकता वाले काम शुरू किए. दूसरी वजह बेहतर अवसरों को माना गया है. इसमें खेती से जुड़ी दूसरी गतिविधियों का बढ़ना, ग्रामीण बुनियादी ढांचे में सुधार, डिजिटल पहुंच और दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) जैसी सरकारी योजनाएं शामिल हैं.

रिपोर्ट में पाया गया कि 2025 में रोजगार में शामिल 73.3 प्रतिशत ग्रामीण महिलाएं प्राथमिक क्षेत्र यानी कृषि से जुड़ी गतिविधियों में काम कर रही थीं. 2017-18 में यह आंकड़ा 70.7 प्रतिशत था. कुल संख्या की बात करें तो फसल और पशु उत्पादन से जुड़े काम में महिलाओं की संख्या इस दौरान दोगुने से भी ज्यादा हो गई. यह करीब 5.4 करोड़ से बढ़कर 10 करोड़ से ज्यादा हो गई. ये जनगणना के हिसाब से बदले गए आंकड़े हैं.

इस बढ़ोतरी में स्वरोजगार और बिना वेतन वाले पारिवारिक काम का भी बड़ा योगदान रहा. अपने खाते पर काम करने वाली यानी स्वरोजगार वाली ग्रामीण महिलाओं की संख्या 2017-18 में 1.39 करोड़ से बढ़कर 2025 में 5.6 करोड़ हो गई. वहीं बिना वेतन वाले पारिवारिक कामगारों की संख्या 2.88 करोड़ से बढ़कर 4.93 करोड़ हो गई.

इसके उलट, नियमित वेतन वाली नौकरियों में ग्रामीण महिलाओं की संख्या 79 लाख से बढ़कर 1.39 करोड़ हुई. हालांकि, कुल महिला रोजगार में उनका हिस्सा 10.5 प्रतिशत से घटकर 9.3 प्रतिशत हो गया.

शहरी इलाकों में भी ऐसा ही बदलाव देखने को मिला. अपने खाते पर काम करने वाली महिलाओं की संख्या 69 लाख से बढ़कर 1.38 करोड़ हो गई, जबकि बिना वेतन वाले पारिवारिक कामगारों की संख्या 33 लाख से बढ़कर 60 लाख हो गई. वहीं नियमित वेतन वाली नौकरियों का हिस्सा 52.2 प्रतिशत से थोड़ा घटकर 50.9 प्रतिशत रह गया.

इस अध्ययन में रोजगार, वेतन और काम के घंटों का आकलन करने के लिए 2017-18 और 2025 के आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है. वहीं वेतन वाले और बिना वेतन वाले काम को समझने के लिए 2019 और 2024 के टाइम यूज सर्वे के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया. आबादी के आंकड़ों को 2020 में तकनीकी समूह की ओर से जारी जनसंख्या अनुमान के आधार पर बदला गया है.

वेतन का अंतर बढ़ा, काम के घंटे घटे

रोजगार की गुणवत्ता में गिरावट महिलाओं की कमाई में भी दिखाई देती है. 2025 में ग्रामीण महिलाओं की औसत मासिक कमाई 6,596 रुपये थी, जबकि ग्रामीण पुरुषों की कमाई 14,632 रुपये थी. इसका मतलब है कि महिलाओं ने पुरुषों की कमाई का सिर्फ 45 प्रतिशत कमाया. 2017-18 में यह करीब 53 प्रतिशत था.

कुल रकम के हिसाब से ग्रामीण महिलाओं और पुरुषों के वेतन का अंतर इस दौरान करीब दोगुना हो गया. यह करीब 4,200 रुपये से बढ़कर हर महीने 8,000 रुपये से ज्यादा हो गया.

शहरी इलाकों में भी वेतन का अंतर बढ़ा. 2025 में शहरी महिलाओं की मासिक कमाई 15,646 रुपये थी, जबकि पुरुषों की कमाई 25,565 रुपये थी.

इन्फोग्राफिक: मान्या अग्रवाल/दिप्रिंट
इन्फोग्राफिक: मान्या अग्रवाल/दिप्रिंट

रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि ग्रामीण महिलाओं के औसत साप्ताहिक काम के घंटे 2017-18 में करीब 40 घंटे से घटकर 2025 में 34 घंटे रह गए. ऐसा तब हुआ जब काम में महिलाओं की भागीदारी काफी बढ़ी. ग्रामीण पुरुषों के औसत साप्ताहिक काम के घंटे 50 से घटकर 47 घंटे रह गए.

ग्रामीण महिलाओं के काम के घंटों में गिरावट ग्रामीण पुरुषों और शहरी कामगारों की तुलना में ज्यादा रही. इन दोनों समूहों के साप्ताहिक काम के घंटे करीब दो घंटे घटे. रिपोर्ट के आंकड़ों से पता चलता है कि महिलाओं के रोजगार में बढ़ोतरी का मतलब जरूरी नहीं है कि उन्हें ज्यादा लंबे समय तक या बेहतर वेतन वाला काम मिल रहा है.

बिना वेतन वाला घरेलू काम बड़ी बाधा बना हुआ है

रिपोर्ट में घरेलू जिम्मेदारियों और देखभाल के काम को महिलाओं के काम में आने या बेहतर रोजगार पाने में बड़ी बाधा बताया गया है.

लेखकों की ओर से विश्लेषण किए गए पीएलएफएस के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में काम नहीं करने वाली 60 प्रतिशत महिलाओं ने बच्चों की देखभाल और घर की निजी जिम्मेदारियों को काम नहीं करने की मुख्य वजह बताया. 2021-22 में यह आंकड़ा 59 प्रतिशत था. इसके मुकाबले, सिर्फ करीब 1 प्रतिशत पुरुषों ने काम नहीं करने की वजह घर की जिम्मेदारियों को बताया.

इन नतीजों की पुष्टि इंडिया टाइम यूज सर्वे से भी होती है. यह सर्वे बताता है कि 24 घंटे के दौरान लोग अपना समय अलग-अलग कामों में कैसे बिताते हैं.

2019 और 2024 के सर्वे के विश्लेषण में पाया गया कि महिलाएं हर दिन खाना बनाने, सफाई और घर के रखरखाव जैसे बिना वेतन वाले घरेलू कामों में करीब 320 मिनट बिताती थीं. पुरुष इन कामों में 97 मिनट बिताते थे. महिलाएं बच्चों, बुजुर्गों और परिवार के दूसरे सदस्यों की देखभाल जैसे बिना वेतन वाले देखभाल के काम में भी 144 मिनट बिताती थीं, जबकि पुरुष 81 मिनट बिताते थे.

रिपोर्ट का कहना है कि महिलाओं की वेतन वाले काम में भागीदारी बढ़ी है, लेकिन इसके साथ घरेलू और देखभाल की जिम्मेदारियों को बांटने में वैसा बदलाव नहीं आया है.

नतीजे एक बड़ी चुनौती की ओर इशारा करते हैं: कामगारों में महिलाओं की संख्या बढ़ाना इस पूरी समस्या का सिर्फ एक हिस्सा है. महिलाओं को सुरक्षित और बेहतर वेतन वाली नौकरियां दिलाना और साथ ही घर में बिना वेतन वाले काम का असमान बोझ कम करना जरूरी है. तभी महिलाओं के रोजगार की गुणवत्ता में सुधार हो सकेगा.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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