नई दिल्ली: पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और सेना के नेतृत्व वाली राजनीतिक व्यवस्था देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं. इमरान खान की सरकार में पूर्व जवाबदेही मंत्री शहजाद अकबर ने यह कहा है. उन्होंने आरोप लगाया कि सेना खैबर पख्तूनख्वा में आपातकाल का इस्तेमाल अपनी ताकत बढ़ाने और प्रांत की स्वायत्तता को कमजोर करने के लिए कर रही है.
दिप्रिंट को दिए एक इंटरव्यू में अकबर ने खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) द्वारा शासित प्रांत में आपातकाल लगाए जाने को तानाशाही वाली कार्रवाई बताया. उन्होंने कहा कि सेना के समर्थन वाली सरकार के जरिए चुनी हुई सरकार को हटाया जा रहा है.
अकबर ने कहा, “पाकिस्तान की राष्ट्रीय सुरक्षा का असली मुद्दा असीम मुनीर और मौजूदा सैन्य शासन है. यही राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए असली खतरा है.”
अकबर ने 2020 में जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के सलाहकार के तौर पर गृह मामलों और जवाबदेही का काम संभाला था. इस पद पर आने से पहले अकबर ने नेशनल अकाउंटेबिलिटी ब्यूरो (NAB) में डिप्टी प्रॉसिक्यूटर के तौर पर काम किया था. उन्होंने 2022 में प्रधानमंत्री के सलाहकार पद से इस्तीफा दे दिया था.
दिप्रिंट से बातचीत में उन्होंने कहा कि प्रांतों की सीमाओं को फिर से तय करने और सरकारी संस्थानों में बदलाव करने का सेना का तरीका, साथ ही लोगों को राजनीति से बाहर करना, पाकिस्तान की स्थिरता के लिए बड़ा खतरा है. उन्होंने कहा, “यह नागरिकों को उनके अधिकारों से वंचित करने का मामला है. अगर आप आबादी को देखें, तो 25 करोड़ लोग बिना किसी राजनीतिक या आर्थिक अधिकार के हैं. मुझे लगता है कि यह पाकिस्तान के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा का असली मुद्दा है.”
पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने रविवार को खैबर पख्तूनख्वा में आपातकाल लगा दिया. इसके साथ ही PTI के नेतृत्व वाली प्रांतीय सरकार को निलंबित कर दिया गया. केंद्र सरकार ने कहा कि प्रांतीय सरकार इस्लामी उग्रवाद को रोकने में नाकाम रही है. यह कदम ऐसे समय में उठाया गया, जब पार्टी खान की रिहाई की मांग को लेकर अपने समर्थकों को जुटा रही थी. इसके साथ ही इस क्षेत्र में 13 साल से चल रही PTI की सरकार खत्म हो गई.
PTI ने इस कार्रवाई को “आपातकाल के नाम पर किया गया तख्तापलट” बताया है, जबकि सरकार का कहना है कि सुरक्षा की स्थिति से निपटने के लिए उसके पास कोई और रास्ता नहीं बचा था. अकबर ने सरकार की इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि सेना पिछले करीब 15 साल से प्रांत में आतंकवाद विरोधी अभियानों में बड़ी भूमिका निभाती रही है.
उन्होंने कहा, “पिछले करीब 15 साल से खैबर पख्तूनख्वा में आतंकवाद से लड़ने में सेना की बड़ी भूमिका रही है और अब यह कहना कि चुनी हुई सरकार सहयोग नहीं कर रही थी, बिल्कुल झूठ है.” उन्होंने आपातकाल को सेना के शासन को सीधे तौर पर लागू करना बताया, भले ही नागरिक अधिकारी अभी भी अपने पदों पर हैं.
अकबर ने कहा, “यह खैबर पख्तूनख्वा में मार्शल लॉ लागू करना है. इसे चलाने वाले चेहरे नागरिक हैं, लेकिन असल में पूरा काम सेना चला रही है.”
उन्होंने आरोप लगाया कि प्रांतीय विधानसभा के स्पीकर और मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों की हिरासत में हैं. इससे यह सवाल उठता है कि क्या राज्यपाल और उनकी सरकार को मिली शक्तियों पर कोई प्रभावी संस्थागत रोक बाकी रहेगी.
मुनीर का प्रांतीय सौदा
अकबर ने इसके बाद आपातकाल को पाकिस्तान के प्रांतों को छोटे प्रशासनिक हिस्सों में बांटने के प्रस्तावों से जोड़ते हुए कहा कि दोनों घटनाओं का एक ही मकसद हो सकता है: देश की राजनीतिक और वित्तीय संस्थाओं पर सैन्य प्रतिष्ठान का नियंत्रण मजबूत करना.
उन्होंने आरोप लगाया कि खैबर पख्तूनख्वा में PTI की सरकार सेना की योजनाओं के रास्ते में रुकावट बन गई थी, क्योंकि वह केंद्र सरकार से ज्यादा आजादी चाहती थी और प्रांत में सैन्य अभियानों के मकसद पर सवाल उठाती थी. उन्होंने कहा, “PTI उस प्रक्रिया में एक रुकावट थी और वह सैन्य प्रतिष्ठान से अलग अपनी आजादी दिखाना चाहती थी.”
पूर्व मंत्री ने यह भी आरोप लगाया कि प्रांतीय सरकार खदानों, खनिजों और रेयर अर्थ तत्वों को निकालने से जुड़े प्रस्तावों का विरोध कर रही थी. उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार इन मुद्दों पर अमेरिका के साथ बातचीत कर रही थी.
अकबर ने कहा कि प्रांतों की सीमाओं में प्रस्तावित बदलाव से सैन्य प्रतिष्ठान के लिए संसाधनों पर नियंत्रण रखना आसान हो सकता है और प्रांतों को दी गई वित्तीय शक्तियां वापस ली जा सकती हैं. उन्होंने कहा, “यह उनके लिए ज्यादा सुविधा की बात है.”
उन्होंने छोटे प्रांत बनाने में सेना की कथित दिलचस्पी का ज़िक्र करते हुए कहा. “प्रांतों को तोड़ने के पीछे असली बात यह है कि वे नेशनल फाइनेंशियल अवॉर्ड के तहत संसाधनों के बंटवारे को वापस बदलना चाहते हैं.”
नेशनल फाइनेंस कमीशन (NFC) अवॉर्ड पाकिस्तान की केंद्र सरकार और प्रांतों के बीच वित्तीय संसाधनों के बंटवारे को तय करता है. 2010 के 18वें संवैधानिक संशोधन ने प्रांतों की स्वायत्तता को काफी बढ़ा दिया था.
अकबर ने आरोप लगाया कि सेना का नेतृत्व इस व्यवस्था को वापस बदलना और संसाधनों के बंटवारे को केंद्र सरकार के ज्यादा नियंत्रण में लाना चाहता है. उन्होंने कहा, “एक बार जब वह पाकिस्तान की पूरी जनसांख्यिकी और भौगोलिक सीमाओं को फिर से तय कर देगा, तो संवैधानिक व्यवस्था के तहत वित्तीय संसाधनों के बंटवारे को बदलना आसान होगा.”
उन्होंने कहा कि आखिरी मकसद रावलपिंडी में सेना के मुख्यालय के आसपास सत्ता को केंद्रित करना है. नए प्रांत बनाने के केंद्र सरकार के प्रस्तावों ने पाकिस्तान में प्रशासनिक सीमाओं, जातीय पहचान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बीच संबंधों को लेकर सवाल खड़े किए हैं. सिंध और बलूचिस्तान में प्रांतों की सीमाएं खास तौर पर संवेदनशील हैं, जहां भाषा, जातीय पहचान और संसाधनों पर नियंत्रण के सवाल लंबे समय से राजनीति को प्रभावित करते रहे हैं.
अकबर ने चेतावनी दी कि सेना की अगुवाई में इन सीमाओं को फिर से तय करने की कोशिश से विरोध शुरू हो सकता है, खासकर सिंध में, जहां भुट्टो-जरदारी परिवार की अगुवाई वाली पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) को काफी राजनीतिक समर्थन मिलता है. उन्होंने कहा, “हम फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के रूप में एक और सर रैडक्लिफ नहीं चाहते, जो यह कहे कि मैं अपनी कलम से नई सीमाएं खींचने जा रहा हूं.” उन्होंने ब्रिटिश वकील सर रैडक्लिफ का जिक्र किया, जिन्होंने 1947 में ब्रिटिश भारत को बांटने वाली सीमा समितियों की अध्यक्षता की थी.
PTI का रुख
अकबर ने इसके बाद कहा कि खैबर पख्तूनख्वा में सैन्य अभियानों पर PTI सरकार की आपत्तियों का मतलब यह जरूरी नहीं था कि वह आतंकवाद विरोधी अभियानों के खिलाफ थी. उन्होंने कहा कि इसके बजाय प्रांतीय नेतृत्व इन अभियानों के मकसद और उनकी अवधि को लेकर स्पष्टता चाहता था.
उन्होंने कहा, “PTI जरूरी नहीं कि खैबर पख्तूनख्वा में आतंकवाद खत्म करने के लिए किसी भी सैन्य कार्रवाई के पूरी तरह खिलाफ हो, लेकिन वह लगातार यह सवाल पूछती रही है कि आखिरी मकसद क्या है? ये सैन्य अभियान कितने समय तक चलते रहेंगे?”
उन्होंने PPP की भी आलोचना की कि उसने आपातकाल का विरोध करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं किया. उन्होंने कहा कि पार्टी के इस फैसले से भविष्य में वह भी ऐसी ही कार्रवाई का निशाना बन सकती है. उन्होंने कहा, “मेरे आकलन में, यह PPP के लिए राजनीतिक आत्महत्या है.” उनका कहना था कि PTI के साथ मजबूती से खड़े न होकर पार्टी ने प्रांतों की स्वायत्तता की रक्षा करने का एक मौका गंवा दिया.
उन्होंने आरोप लगाया कि सेना ने राजनीतिक दलों पर दबाव बनाने और उन्हें अपनी मांगें मानने के लिए मजबूर करने के लिए भ्रष्टाचार की जांच का इस्तेमाल किया. उन्होंने कहा, “पाकिस्तान में भ्रष्टाचार विरोधी और जवाबदेही की पूरी कहानी सेना चलाती है, ताकि नेताओं को उसके इशारों पर नाचने के लिए मजबूर किया जा सके.”
PPP का रुख महत्वपूर्ण है क्योंकि सिंध को छोटे प्रांतों में बांटने की कोई भी कोशिश उसके राजनीतिक आधार के लिए खतरा बन सकती है, खासकर इसलिए क्योंकि इस प्रांत में सिंधी राष्ट्रवाद की मजबूत परंपरा रही है.
वहीं, PTI के लिए अकबर ने कहा कि चुनौती सिर्फ किसी चुनी हुई सरकार का विरोध करना नहीं है, बल्कि एक ताकतवर सैन्य प्रतिष्ठान का सामना करना है.
उन्होंने कहा, “अभी PTI के सामने चुनौती सैन्य ताकत से लड़ने की होगी. यह एक राजनीतिक ताकत है, यह किसी दमनकारी सरकार से लड़ सकती है, लेकिन यह दमनकारी सेना से कैसे लड़ेगी?”
उन्होंने कहा कि खान अब भी पार्टी की बड़ी संख्या में लोगों को जुटाने की क्षमता के केंद्र में हैं और तर्क दिया कि उनकी लगातार जेल में रहने की वजह से विपक्ष की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था को चुनौती देने की क्षमता सीमित हुई है. अकबर ने कहा, “PTI ही इमरान खान है. मुझे कहना होगा कि जन आंदोलन सिर्फ इमरान खान के साथ है.”
सेना के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव के बावजूद अकबर ने कहा कि आर्थिक ठहराव आखिरकार मौजूदा व्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित हो सकता है. उन्होंने कहा, “यह मौजूदा व्यवस्था जिस तरह चल रही है, उस तरह ज्यादा समय तक नहीं चल सकती, क्योंकि जिस समाज में आप किसी चीज को बढ़ने नहीं दे रहे हैं, वहां अर्थव्यवस्था भी नहीं बढ़ती और यही असीम मुनीर के लिए असली चुनौती है.”
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