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Thursday, 10 September, 2026
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लंदन का ‘फ्लाइंग कावड़ी’ चर्चा में, सदियों पुरानी तमिल मंदिर परंपरा ने खींचा दुनिया का ध्यान

वीडियो में लंदन की सड़कों पर सजे हुए रथ जैसी संरचनाओं से हवा में लटके हुए भक्त दिखाई दे रहे हैं, जिससे ऐसा लगता है कि वे उड़ रहे हैं.

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चेन्नई: लंदन की सड़कों पर भक्तों के “फ्लाइंग कावड़ी” नाम के एक नाटकीय अनुष्ठान करते हुए वायरल हुए वीडियो ने दुनियाभर का ध्यान खींचा है. यह सदियों पुरानी तमिल मंदिर परंपरा अब भारत की सीमाओं से बाहर भी जारी है.

वीडियो में भक्तों को सजे हुए रथ जैसे ढांचों से हवा में लटका हुआ दिखाया गया है, जिससे ऐसा लगता है जैसे वे उड़ रहे हों.

दर्शकों के मुताबिक, थेर थिरुविझा रथ उत्सव के दौरान कावड़ी आट्टम नृत्य अनुष्ठान में 30,000 से ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया. इसके चलते कई सड़कों को बंद करना पड़ा. इस कार्यक्रम का आयोजन वेस्ट ईलिंग में स्थित श्री कनगा थुर्क्कई अम्मन मंदिर ने किया था.

थेर थिरुविझा रथ उत्सव क्या है?

थेर थिरुविझा तमिलनाडु के मंदिरों में होने वाले सबसे ज्यादा इंतिजार किए जाने वाले सालाना आयोजनों में से एक है.

सदियों पुराने इस अनुष्ठान के दौरान मंदिर में मुख्य देवी-देवता के छोटे रूप की मूर्ति को लकड़ी से बने एक बड़े और खूबसूरती से नक्काशी किए गए रथ पर रखा जाता है. इस रथ को “थेर” कहा जाता है. इसके बाद भक्त मंदिर के पास बनी खास “थेर सड़कों” से इस रथ को खींचकर ले जाते हैं.

देवी-देवता को मंदिर से बाहर लाने और जुलूस निकालने को इस रूप में देखा जाता है कि देवी-देवता गर्भगृह से बाहर निकलकर लोगों के बीच आते हैं, उनकी प्रार्थनाएं स्वीकार करते हैं, उन्हें दर्शन देते हैं और समुदाय को आशीर्वाद देते हैं.

थेर थिरुविझा तमिलनाडु के कई हिंदू मंदिरों में मनाया जाता है. खासकर यह सालाना मंदिर उत्सवों या ब्रह्मोत्सवम के दौरान आयोजित होता है.

ऐसे कई जुलूसों और उनसे जुड़े उत्सवों की एक खास परंपरा कावड़ी आट्टम या “बोझ का नृत्य” है. इसमें सड़कें संगीत, रंगों और आतिशबाजी से भरे एक जीवंत मंच में बदल जाती हैं.

भक्त अपने कंधों पर एक “कावड़ी” रखते हैं. यह लकड़ी या धातु से बना अर्धचंद्राकार ढांचा होता है, जिसे फूलों, मोर के पंखों, कपड़े और धार्मिक प्रतीकों से सजाया जाता है. भक्त पारंपरिक ढोल और दूसरे वाद्य यंत्रों की धुन पर लय के साथ नाचते हुए इसे लेकर चलते हैं.

हर जुलूस में कावड़ी आट्टम नहीं किया जाता.

इस उत्सव में पारंपरिक वायु वाद्य यंत्र नादस्वरम और ढोल का संगीत भी होता है. इसके साथ धार्मिक चढ़ावे और लोगों की भागीदारी भी होती है.

मशहूर रथ जुलूसों में मदुरै का मीनाक्षी अम्मन मंदिर और तिरुवारुर का त्यागराज मंदिर शामिल हैं. तिरुवारुर मंदिर में एशिया के सबसे बड़े मंदिर रथों में से एक है.

इसके अलावा मायलापुर का कपालीश्वरर मंदिर, तिरुवन्नामलाई का अरुणाचलेश्वरर मंदिर और चिदंबरम का नटराज मंदिर भी इसके प्रमुख उदाहरण हैं. यह परंपरा दुनियाभर में रहने वाले तमिल समुदायों के बीच भी लोकप्रिय है.

‘फ्लाइंग कावड़ी’ के पीछे की कहानी

“कावड़ी” उठाने की परंपरा की जड़ें पौराणिक कथाओं में हैं. मान्यता के अनुसार, भगवान मुरुगन के भक्त इडुम्बन को ऋषि अगस्त्य ने दो पवित्र पहाड़ियों, शिवगिरि और शक्तिगिरि को दक्षिण भारत ले जाने के लिए कहा था. इडुम्बन ने दोनों पहाड़ियों को कावड़ी पर दोनों तरफ बांधकर अपने कंधों पर रखा और यात्रा शुरू की. लंबी यात्रा के बाद थककर वह उस जगह के पास रुक गया, जिसे आज पलानी कहा जाता है, और अपना बोझ नीचे रख दिया. लेकिन जब उसने दोबारा पहाड़ियों को उठाने की कोशिश की, तो वे नहीं हिलीं. एक युवा लड़का एक पहाड़ी के ऊपर खड़ा था और वहां से हटने से इनकार कर दिया. इसके बाद लड़के और इडुम्बन के बीच जोरदार संघर्ष हुआ, जिसमें इडुम्बन को मार दिया गया.

इडुम्बन की पत्नी और ऋषि के अनुरोध पर भगवान मुरुगन ने इडुम्बन को फिर से जीवित कर दिया. यह समझने के बाद कि वह लड़का कोई और नहीं बल्कि स्वयं भगवान थे, इडुम्बन ने माफी मांगी. इडुम्बन की कर्तव्य के प्रति अटूट निष्ठा और आस्था से प्रभावित होकर मुरुगन ने कहा कि जो भी व्यक्ति इसी भक्ति की भावना के साथ कावड़ी लेकर उनके मंदिर आएगा, उसे उनका आशीर्वाद मिलेगा.

अब प्रसिद्ध पलानी मुरुगन मंदिर इसी जगह पर बना है. इसके बाद इडुम्बन को पहाड़ी के नीचे मंदिर का रक्षक बनाया गया और कावड़ी को पवित्र बोझ के रूप में उठाने की परंपरा शुरू हुई. मुरुगन मंदिरों के बाहर भी इडुम्बन की मूर्तियां रखी जाती हैं.

थेर थिरुविझा में शामिल पुजारी और भक्त इसके ज्यादा कठिन रूप को परकुम कावड़ी या “फ्लाइंग कावड़ी” बताते हैं. इसे ऐसी पूजा माना जाता है जो पूरी तरह खुद को भगवान के सामने समर्पित करने का प्रतीक है. इस अनुष्ठान में भक्तों को सजे हुए ढांचे या वाहन से जुड़े कांटों पर लटकाया जाता है, जिससे वे हवा में उड़ते हुए दिखाई देते हैं.

कई भक्त बताते हैं कि यह मुद्रा मोर की याद दिलाती है. मोर भगवान मुरुगन का दिव्य वाहन है, जो स्वतंत्र रूप से उड़ता है. हालांकि, हवा में लटकने की स्थिति को पूरी तरह असहाय होकर भगवान के सामने समर्पण करने के रूप में भी देखा जाता है. यह सामान्य भौतिक दुनिया को छोड़ने की एक जानबूझकर की गई कोशिश होती है, जिसमें आस्था के अलावा पकड़ने के लिए कुछ नहीं बचता.

चेन्नई के एक अम्मन मंदिर में जुलूस में शामिल भक्तों ने बताया कि समय के साथ “कावड़ी” उठाना आध्यात्मिक बोझ को अपनी इच्छा से स्वीकार करने, किसी मन्नत को पूरा करने, मिले आशीर्वाद के लिए आभार जताने या भगवान से मदद मांगने का प्रतीक बन गया है.

कुछ भक्त अपने सिर पर दूध से भरे बर्तन भी लेकर चलते हैं या कुछ समय के लिए अपने शरीर में वेल यानी पतली धातु की छड़ें चुभवाते हैं.

कुछ मंदिरों में भक्तों के लिए मंदिर के अंदर एक खास जगह पर आग पर चलने की भी परंपरा है. इस दौरान वे सिर पर बर्तन या “कावड़ी” लेकर चलते हैं.

हालांकि कावड़ी आट्टम का सबसे ज्यादा संबंध थाइपुसम जैसे मुरुगन उत्सवों से है, लेकिन दूसरे देवी-देवताओं के सम्मान में निकाले जाने वाले जुलूसों में भी कावड़ी आट्टम अक्सर देखने को मिलता है.

यह उत्सव कई देवी-देवताओं के लिए मनाया जाता है. इनमें सबसे आम तौर पर मंदिर के मुख्य देवी या देवता शामिल होते हैं. इनमें भगवान शिव के त्यागराज, कपालीश्वरर या नटराज जैसे रूप, देवी मीनाक्षी, पार्वती, दुर्गा, भगवान विष्णु और भगवान मुरुगन शामिल हैं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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